नैतिक पारोडे ने 10 वीं में हासिल किए 66.80% अंक

आठ ऑपरेशन, व्हीलचेयर और दर्द से जंग, फिर भी हौसले की मिसाल

* दिव्यांग छात्र नैतिक पारोडे की सफलता ने समाज को दिया संदेश, कमजोरी नहीं, हौसला बड़ा होता है
अमरावती/दि.11- जिंदगी ने कदम-कदम पर कठिन परीक्षाएं लीं. शरीर ने साथ नहीं दिया, बीमारी ने बार-बार रोका, आठ से अधिक बड़े ऑपरेशन हुए, लेकिन हौसले की उड़ान कभी नहीं रुकी. इसी अदम्य इच्छाशक्ति का परिणाम है कि शारीरिक रूप से पूरी तरह दिव्यांग होने के बावजूद कक्षा 10वीं के छात्र नैतिक पारोडे ने बोर्ड परीक्षा में 66.80 प्रतिशत अंक प्राप्त कर सफलता का ऐसा अध्याय लिखा, जिसने पूरे शहर को भावुक कर दिया.
नैतिक ने यह साबित कर दिया कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका आत्मविश्वास और संघर्ष करने का जज्बा होता है. लगातार शारीरिक पीड़ा, अस्पतालों के चक्कर और ऑपरेशनों के बावजूद उसने पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया. हालात चाहे जितने कठिन रहे हों, लेकिन उसने हार मानने के बजाय अपनी कमियों को ही अपनी ताकत बना लिया.
अपनी इस सफलता का श्रेय नैतिक ने अपने माता-पिता और सेंट फ्रान्सिस स्कूल को दिया है. उसने कहा कि परिवार और स्कूल के सहयोग ने ही उसे कभी टूटने नहीं दिया. माता-पिता ने हर मुश्किल घड़ी में उसका हौसला बढ़ाया, जबकि शिक्षकों ने उसे सामान्य विद्यार्थियों की तरह आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. नैतिक की इस उपलब्धि ने यह भी साबित कर दिया कि यदि समाज और शासन ऐसे प्रतिभाशाली दिव्यांग विद्यार्थियों को सही सहयोग दे, तो वे देश का भविष्य बदल सकते हैं. आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, सामाजिक संस्थाएं और सक्षम नागरिक आगे आकर नैतिक जैसे होनहार छात्रों की शिक्षा, उपचार और भविष्य निर्माण में मदद करें, ताकि आर्थिक या शारीरिक बाधाएं उनकी प्रतिभा को रोक न सकें.
रविवार को वननेस मुक्तांगण संस्था एवं विदर्भ स्वाभिमान के पदाधिकारियों ने नैतिक के निवास पहुंचकर उसका सत्कार किया. इस अवसर पर सहकार विभाग के अमित बनारसे, संपादक सुभाष दुबे, अधिकारी गोपाल चिखलकर तथा समाजसेवी प्रकाश पाण्डेय उपस्थित थे. सभी ने नैतिक के संघर्ष और उसके परिवार की सकारात्मकता की सराहना करते हुए उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं.
नैतिक पारोडे की कहानी केवल एक छात्र की सफलता नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो परिस्थितियों के सामने जल्दी हार मान लेते हैं. दर्द, बीमारी और संघर्ष के बीच भी मुस्कराकर आगे बढ़ना क्या होता है, यह नैतिक और उसके परिवार ने समाज को सीखा दिया है.

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