शंकरबाबा पापलकर के दिव्यांग बच्चों के शिल्पों की मुंबई में प्रदर्शनी

15 से 21 मई तक पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी में आयोजन

* दिव्यांगों द्वारा बनाए गए विभिन्न आकारों के काष्ठशिल्पों का समावेश
अमरावती/दि.13 पद्मश्री शंकरबाबा पापलकर के वझ्झर स्थित स्व. अंबादासपंत वैद्य दिव्यांग-बेवारस बालगृह में रहनेवाले दिव्यांग बच्चों द्वारा लकडी से विभिन्न आकारों में अत्यंत कल्पनाशिलता के साथ तैयार किए गए मानवाकृतियों एवं पशु-पक्षियों के अद्भूूत काष्ठशिल्पों की प्रदर्शनी मुंबई में आयोजित की जा रही है. यह प्रदर्शनी 15 से 21 मई के दौरान मुंबई स्थित पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी के सभागृह में संपन्न होगी.
उल्लेखनीय है कि, लावारिस, मतिमंद एवं दिव्यांग बच्चों के पुनर्वसन के लिए पद्मश्री शंकरबाबा पापलकर ने परतवाडा के समीप मेलघाट की तलहटी में स्थित वझ्झर गांव में यह बालगृह शुरु किया है. इस बालगृह के माध्यम से दिव्यांग एवं लावारिस बच्चों की शिक्षा और पुनर्वसन की पूरी जिम्मेदारी स्वयं शंकरबाबा ने स्वीकारी है. उनके मार्गदर्शन में बच्चों ने विविध प्रकार के काष्ठशिल्प तैयार किए है. इन शिल्पों की प्रदर्शनी पहली बार मुंबई में आयोजित की जा रही है.

* वझ्झर मॉडल हैं देश में पहला पुनर्वसन प्रयोग
शंकरबाबा ने अनाथ दिव्यांग 125 से अधिक बच्चों के पालन-पोषण के साथ-साथ पुनर्वसन के अंतर्गत 30 से अधिक बच्चों के विवाह समारोह आयोजित कर उनका पुनर्वसन किया है. भारत में इस प्रकार का पुनर्वसन का पहला प्रयोग वझ्झर मॉडल के अंतर्गत सफलतापूर्वक लागू किया गया है. इसके अलावा कुछ बच्चों को निजी संस्थानों में नौकरी तथा कुछ को प्रतियोगी परिक्षाओं और प्रशासकीय सेवाओं के माध्यम से प्रशासनिक सेवाओं में रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाए गए है. इस बालगृह में मतिमंद बच्चों ने लगभग 25 एकड परिसर में 15 हजार से अधिक विभिन्न प्रजातियों के वृक्ष लगाकर उनका संरक्षण किया है. आज इस पूरी टेकडी को हराभरा बनाने का श्रेय इन्हीं दिव्यांग बच्चों को जाता है.

* 100 से अधिक काष्ठशिल्प किए तैयार
वझ्झर क्षेत्र में बन रहे सिंचन प्रकल्प के लिए काटे गए विभिन्न प्रजातियों के वृक्षों की लकडी को शंकरबाबा ने वझ्झर आश्रम में लाकर उनसे काष्ठशिल्प तैयार करवाए. दिव्यांग बच्चों ने 100 से अधिक लकडियों को काष्ठशिल्पों में रुपांतरित किया है. इन काष्ठशिल्पों में कहू के वृक्ष से बनाई गई श्री गणेश की अत्यंत सुंदर मूर्ति विशेष आकर्षण का केंद्र है, जिसे तैयार करने में लगभग तीन वर्षों का समय लगा है. उसी प्रकार सागवान के लकडी से निर्मित संभोग से समाधि तक नामक काष्ठशिल्प को प्रकृति का अद्भूत चमत्कार बताया जा रहा है.
काष्ठशिल्प निर्माण की प्रेरणा के बारे में शंकरबाबा ने बताया कि, मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में काष्ठशिल्प प्रदर्शनी का उद्घाटन अभिनेत्री स्व. नर्गिस दत्त के हाथों हुआ था. यह काष्ठशिल्प लामा नामक कलाकार द्वारा तैयार किए गए थे, जिन्होंने ऐसे शिल्प बनाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया, इसके बाद वझ्झर बालगृह में काष्ठशिल्प निर्माण की शुरुआत हुई. प्रत्येक काष्ठशिल्प को तैयार करने में लगभग 2 से 5 वर्षों का समय लगा था. इन शिल्पों में येशू मसीह को क्रूस पर किलों से लटकाए जाने का दृष्य भी हुबहू काष्ठशिल्प के माध्यम से साकार किया गया है.

* आचार्य रजनीश से मिली प्रेरणा
शंकरबाबा पापलकर ने बताया कि, इस प्रकार की कलाकृति के निर्माण में एकाग्रता और साधना की आवश्यकता होती है. इसके लिए उन्हें आचार्य रजनीश से प्रेरणा मिली है. उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय आचार्य रजनीश के साथ बिताया, जिससे यह प्रेरणा प्राप्त हुई है.

* 18 वर्ष के बाद बच्चों को बालगृह में रखने का कानून बनाने के प्रयास जारी
प्रदर्शनी में 30 से अधिक चयनित काष्ठशिल्प की प्रदर्शनी लगाई जाएगी. इन काष्ठशिल्पों की विक्री से प्राप्त निधि का उपयोग दिव्यांग लावारिस बच्चों के आजीवन पुनर्वसन के लिए किया जाएगा. शंकरबाबा ने बताया कि, दिव्यांग, बेवारस और मतिमंद बच्चों को 18 वर्ष की आयु के बाद बालगृह में रखने पर प्रतिबंध है. ऐसे बच्चों को स्थायी पुनर्वसन के लिए केंद्र और राज्य शासन द्वारा कानून बनाकर व्यवस्था किए जाने की मांग की जा रही है. जब तक यह कानून मंजूर नहीं होता, तब तक इन बच्चों को बेसहारा न छोडते हुए अंबादासपंत वैद्य बेवारस-दिव्यांग बालगृह के माध्यम से उनके पालन-पोषण और पुनर्वसन के प्रयास जारी है. शंकरबाबा ने कहा कि, भारत सरकार ने उनके इस कार्य को मान्यता देते हुए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. साथ ही उनकी यह निरंतर मांग है कि, दिव्यांग-बेवारस बच्चों के स्थायी पुनर्वसन हेतु कानून बनाया जाए. उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि, वे इस प्रदर्शनी को अवश्य भेंट दें और दिव्यांग-बेवारस बच्चों द्वारा बनाए गए काष्ठशिल्प खरीदकर उनके पुनर्वसन में सहयोग करें.

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