कल हाईकोर्ट में हुई दलीलें और जज के निर्णय का पूरा ब्यौरा
अमरावती विधान परिषद चुनाव

* विप्लव बाजोरिया को क्यों नहीं मिली राहत
* कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ही दो मामलों का दिया उदाहरण
* वादी की वकील डॉ. रेणुका शिरपुरकर ने दी थी ढेर सारी दलीलें
* अनेक पूर्व केसेस की मिसाल भी न आई काम
अमरावती /दि.4- अमरावती प्राधिकार विधान परिषद सीट के 18 जून को होने जा रहे प्रतिष्ठापूर्वक चुनाव में अपना नामांकन चुनाव अधिकारी द्वारा खारिज कर दिए जाने को उच्च न्यायालय में विप्लव राधाकिसन बाजोरिया द्वारा चुनौती देने की याचिका पर बुधवार को हुई सुनवाई में कोई राहत देने से जज प्रफुल्ल एस. खुबालकर ने मना कर दिया. कोर्ट में हुई संपूर्ण कार्यवाही, दोनों पक्षों के तर्क-वितर्क सुनने के बाद न्यायमूर्ति ने भी सर्वोच्च न्यायालय के आशीष गडकरी और प्रियंका गव्हाने केसेस में दिए गए उदाहरणों को प्रस्तुत कर राहत देने से मना कर दिया और अगली सुनवाई 17 जून को रखने की घोषणा कर दी. इलेक्शन का मतदान 18 जून को होना है. बहरहाल कोर्ट की दलीलें और जज के संपूर्ण निर्णय का ब्यौरा ‘अमरावती मंडल’ देने का प्रयास कर रहा है.
वादी विप्लव बाजोरिया की ओर से डॉ. शिरपुरकर ने पैरवी की. उन्होंने जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों से लेकर पूर्व में दिए गए निर्णयों का हवाला दिया. इस मामले में अमरावती के जिलाधीश और विधान परिषद चुनाव के चुनाव अधिकारी को प्रतिवादी बनाया गया. उसी प्रकार चुनाव के अन्य प्रतिस्पर्धी प्रवीण पोटे, हर्षजीत देशमुख, डॉ. नीलेश विश्वकर्मा और प्रशांत महल्ले को प्रतिवादी बनाया गया था. चारों ही प्रत्याशियों ने विप्लव बाजोरिया के नामांकन पर आक्षेप लिया था.
ऐसे में डॉ. शिरपुरकर ने चुनाव अधिकारी द्वारा बाजोरिया का नामांकन रिजेक्ट करने का विरोध कर जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 36 अंतर्गत उपधारा 4 का उल्लेख किया. उन्होंने दलील दी कि, उनके पक्षकार को चुनाव अधिकारी ने नामांकन के एनेक्चर ए से लेकर ए-9 तक और बी-1 से बी-6 तक एफीडेविट में ही समाहित रहने की जानकारी स्वीकार नहीं की. उसी प्रकार उनके वादी अर्थात विप्लव बाजोरिया को अवसर नहीं दिया गया कि, वे अपना नया शपथपत्र दाखिल कर सके. जबकि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को प्रमुख सचिव ने 6 मार्च 2024 को निर्देश जारी किए थे. जिसमें फॉर्म 26 को चुनाव अधिकारी द्वारा चेक करने और उम्मीदवार को अपने नामांकन की खामियां दूर करने का अवसर देने का उल्लेख था.
डॉ. शिरपुरकर ने नामांकन के साथ बाजोरिया द्वारा दिए गए 27 पेज का अनेक्चर और सभी दस्तावेज चुनाव अधिकारी द्वारा स्वीकार किए जाने की आवश्यकता बतलाई. यह भी दावा किया कि, याचिकाकर्ता ने अपने विशेष उल्लेख के जरिए अपनी चल संपत्ति का ब्यौरा नोट-1 से लेकर नोट-6 तक जोडा था. अनेक अनेक्चर के डिटेल का भी उल्लेख किया था. इसीलिए अनेक्चर को संपूर्ण शपथपत्र माना जाना चाहिए था. एड. रेणुका शिरपुरकर ने आशीष किशोर गडकरी विरुद्ध निर्वाचन आयोग भारत की 6 नवंबर 2024 की जनहित याचिका का उल्लेख कर इसी अदालत की खंडपीठ द्वारा दिए गए निर्णय का जिक्र किया. जिसमें अनुच्छेद 226 अंतर्गत परिस्थिति को देखते हुए कोर्ट के दखल को मान्य माना गया था. उन्होंने प्रियंका योगेश गव्हाने विरुद्ध महाराष्ट्र शासन प्रकरण में भी सहकारी खंडपीठ द्वारा दिए गए फैसले का उल्लेख किया.
उनकी दलीलों का सरकारी अभियोक्ता एड. डी. वी. चव्हाण ने चुनाव अधिकारी अर्थात जिलाधीश की ओर से प्रस्तुत होते हुए याचिका का पूरी तरह विरोध किया. उन्होंने संक्षेप में अपनी बात रखी. एड. चव्हाण ने कोर्ट को बताया कि, संबंधित कानूनों के प्रावधानों के अंतर्गत चुनाव संबंधी याचिका की जरुरत नहीं है. उन्होंने कहा कि, चुनाव अधिकारी ने नामांकन रद्द करने का कारण बता दिया है. जिससे कोर्ट को इस मामले में दखल की जरुरत नहीं है. याचिका को डिसमिस करने की मांग उन्होंने रखी. एड. चव्हाण ने कहा कि, चुनाव प्रक्रिया में कोर्ट दखल नहीं दे सकता.
एड. चव्हाण ने सर्वोच्च न्यायालय के रिसर्जन्स इंडिया विरुद्ध चुनाव आयोग प्रकरण का भी उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि, उम्मीदवार को अपनी संपूर्ण जानकारी दिए गए फॉर्म नं. 26 में देना जरुरी था और वह नहीं दी गई. इसलिए नामांकन का ठुकराया जाना न्यायसंगत है. कोर्ट के दखल की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने कोर्ट को बताया कि, चुनाव प्रक्रिया शुरु की जा चुकी है. नामांकन पत्रों की जांच 2 जून को पूर्ण कर ली गई. 4 जून को नाम पीछे लिए जाने है.
प्रतिवादी क्रमांक 4 की ओर से वरिष्ठ एड. एम. जी. भांगडे पेश हुए और उन्होंने अंतरिम राहत देने के विरोध में तर्क रखे. उन्होंने याचिकाकर्ता को नामांकन में सुधार करने के अवसर देने का विरोध किया और कहा कि, 6 मार्च 2024 का आदेश इस विषय में लागू नहीं होता. उन्होंने याचिकाकर्ता के अनेक्चर का संदर्भ देने की बात पर भी आपत्ति की. एक बार अनिवार्य रुप से प्रस्तुत हलफनामा देने के बाद अनेक्चर निरर्थक रहने की बात कही. उन्होंने चुनाव अधिकारी के फैसले को सही बताया. फॉर्म 26 में याचिकाकर्ता आवश्यक विवरण प्रस्तुत करने में असफल रहने की बात कही. प्रतिवादी क्रमांक 4 की ओर से एड. ए. एस. मनोहर प्रस्तुत हुए और उन्होंने दावा किया कि, केवल चेक लिस्ट प्रस्तुत कर देने से ही चुनाव अधिकारी के अधिकार दूर नहीं होते. उम्मीदवारों की आपत्तियों पर चुनाव अधिकारी को निर्णय करना पडता है.
न्यायाधीश ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि, चुनाव अधिकारी ने पाया कि, याचिकाकर्ता उम्मीदवार ने प्रपत्र 26 में आवश्यक जानकारी नहीं दी है. अनेक्चर का उल्लेख किया है. यह एक बहस का मुद्दा हो सकता है. किंतु याचिकाकर्ता द्वारा सभी जानकारी फॉर्म 26 के स्तंभो के अनुसार नहीं दिए जाने की बात ठीक है. याचिकाकर्ता इस बारे में कोई कानूनन प्रक्रिया सिद्ध नहीं कर पाए है. उसी प्रकार चुनाव अधिकारी को चुनाव कानून 1961 के नियम 4-ए अंतर्गत अदालत में प्रस्तुत होने की भी आवश्यकता नहीं है. कोर्ट ने कहा कि, फॉर्म 26 अनेक्चर 2 अंतर्गत हलफनामा पेज 11 पर पूर्ण हो जाता है. वहां इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि, शपथपत्र पेज 27 तक पूर्ण होगा. उसी प्रकार पेज 11 के बॉटम में दस्तखत से सिद्ध होता है कि, शपथपत्र पेज 1 से 11 तक ही है. पेज 12 से 27 को लेकर विवाद उठाया गया है. जिससे चुनाव अधिकारी द्वारा फॉर्म 26 अंतर्गत अनेक्चर को हिस्सा न मानना गलत नहीं लग रहा.
न्यायमूर्ति ने कहा कि, चुनाव प्रक्रिया की स्थिति को देखते हुए उन्हें लगता है कि, याचिकाकर्ता के नामांकन स्वीकार करने के निर्देश देने की आवश्यकता उन्हें नहीं दिखाई पडती.





