ऑटो डीलिंग के कारोबार से साइबर ठगी की दुनिया तक पहुंचा राकेश जामनानी
गरीब मजदूरों के खातों का होता था इस्तेमाल

* तीन माह खाते और एटीएम का इस्तेमाल कर किया जाता था उसे नष्ट
* गिरफ्तार सभी आरोपी थे प्रतिमाह वेतन पर, नहीं हैं उन्हें मुख्य सूत्रधार की ज्यादा जानकारी
अमरावती/दि.24 – अमरावती ग्रामीण साइबर पुलिस द्वारा हाल ही में उजागर किए गए साइबर ठगी नेटवर्क की जांच में चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं. प्रारंभिक जांच के अनुसार, ऑटो डीलिंग के व्यवसाय से जुड़ा रहा कथित मास्टरमाइंड राकेश जामनानी धीरे-धीरे साइबर ठगी के संगठित नेटवर्क का संचालन करने लगा और उसने अपने करीबी लोगों के माध्यम से एक बड़ा जाल खड़ा कर लिया.
पुलिस सूत्रों के अनुसार, जामनानी ने एक करीबी महिला तथा अन्य परिचितों की मदद से लोगों को अपने नेटवर्क से जोड़ना शुरू किया. गिरोह के प्रत्येक सदस्य को अलग-अलग क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. उनका काम आर्थिक रूप से कमजोर लोगों, विशेषकर मजदूरों और बेरोजगार युवकों को प्रलोभन देकर बैंक खाते खुलवाने के लिए तैयार करना था.
* मजदूरों को दिए जाते थे 5 हजार रुपये
जांच में सामने आया है कि मजदूरों को बैंक खाता खुलवाने के बदले करीब 5 हजार रुपये दिए जाते थे. खाता खुलने के बाद लगभग तीन महीने तक उसका उपयोग विभिन्न ऑनलाइन लेन-देन के लिए किया जाता था. इसके बाद संबंधित खाते की पासबुक, एटीएम कार्ड और अन्य बैंकिंग दस्तावेज नष्ट कर दिए जाते थे, ताकि भविष्य में कोई सबूत न बच सके.
पुलिस को आशंका है कि इन खातों का उपयोग मुख्य रूप से ऑनलाइन गेमिंग और साइबर ठगी से जुड़े वित्तीय लेन-देन के लिए किया जाता था. गरीब मजदूरों के नाम पर खुले खातों के जरिए करोड़ों रुपये के ट्रांजेक्शन किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है.
* समुदाय के लोगों को फंसाने का दिया जाता था निर्देश
जांच अधिकारियों के मुताबिक गिरोह के सदस्यों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे अपने-अपने समुदाय और परिचित लोगों को लालच देकर नेटवर्क में शामिल करें. इससे पुलिस की नजर से बचते हुए तेजी से नए खाते और नए लोग जोड़े जा सकें.
* गिरोह के सदस्यों को मिलता था वेतन
सूत्रों के अनुसार, राकेश जामनानी अपने गिरोह के सक्रिय सदस्यों को नियमित मासिक वेतन भी देता था. इसके अलावा उनके रहने, खाने-पीने और अन्य आवश्यक खर्चों की व्यवस्था भी की जाती थी. इससे नेटवर्क में जुड़े लोग लंबे समय तक उसके लिए काम करते रहे.
* लगातार बदलते थे ठिकाने
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह के सदस्य बार-बार अपना ठिकाना बदलते रहते थे. इससे उनकी गतिविधियों का पता लगाना मुश्किल हो जाता था और पुलिस को उनके खिलाफ ठोस जानकारी जुटाने में कठिनाई होती थी. सुरक्षित स्थान पर जाने के बाद कुछ दिनों तक ही वहां डेरा जमाया जाता था. ऐसा करते-करते यह गिरोह गोवा तक पहुंच गया था. यह भी जांच में सामने आया है.
* पैसे का अब भी रहस्य
ग्रामीण साइबर पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि विभिन्न बैंक खातों में जमा होने वाले पैसे आखिरकार कहां पहुंचते थे. जांच में यह जानकारी मिली है कि फर्जीवाड़े से प्राप्त रकम पहले उन खातों में ट्रांसफर की जाती थी, जिनकी व्यवस्था राकेश जामनानी द्वारा की गई थी. हालांकि, रकम उसके पास पहुंचने के बाद उसका अंतिम ट्रांजेक्शन कहां और किस माध्यम से किया जाता था, इस बारे में पुलिस को अभी तक स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है. यही वजह है कि जांच एजेंसियां वित्तीय लेन-देन की पूरी श्रृंखला खंगालने में जुटी हुई हैं.
* रामपुरी कैंप में छापा, लेकिन हाथ नहीं लगी बड़ी जानकारी
पुलिस ने राकेश जामनानी से जुड़े संभावित ठिकानों पर छापेमारी भी की. रामपुरी कैंप स्थित उसके निवास पर की गई कार्रवाई में पुलिस को कोई विशेष दस्तावेज या महत्वपूर्ण सुराग हाथ नहीं लगा. आश्चर्य की बात यह रही कि क्षेत्र के कई नागरिक भी उसकी कथित गतिविधियों से अनजान बताए गए.
* मास्टरमाइंड की तलाश तेज
ग्रामीण साइबर पुलिस ने राकेश जामनानी की गिरफ्तारी के लिए विशेष टीमों को सक्रिय कर दिया है. पुलिस का दावा है कि साइबर ठगी के इस कथित मास्टरमाइंड को जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा. साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि उसके संबंध राज्य के बाहर या किसी बड़े साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े हुए तो नहीं हैं. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच कई स्तरों पर जारी है और आने वाले दिनों में इस साइबर ठगी नेटवर्क से जुड़े और भी बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं. फिलहाल फरार आरोपी राकेश जामनानी की तलाश सरगर्मी से की जा रही है और उसके वित्तीय नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.





