27 सप्ताह की गर्भवती नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को हाईकोर्ट से बड़ी राहत
नागपुर हाईकोर्ट ने मेडिकल गर्भसमापन की दी अनुमति, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को माना आधार

* अभिभावकों की सहमति के बाद विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में होगी प्रक्रिया
नागपुर/दि.8- दुष्कर्म की शिकार 16 वर्षीय नाबालिग किशोरी को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ से बड़ी राहत मिली है. अदालत ने 27 सप्ताह की गर्भवती पीड़िता को चिकित्सकीय प्रक्रिया के माध्यम से गर्भसमापन (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी) की अनुमति प्रदान कर दी है. न्यायालय ने यह फैसला अमरावती स्थित जिला सरकारी सामान्य अस्पताल (इरविन अस्पताल) के मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर विचार करने के बाद सुनाया. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल एस. किलोर तथा राज डी. वाकोडे की खंडपीठ के समक्ष हुई. अदालत ने स्पष्ट किया कि गर्भसमापन की प्रक्रिया शुरू करने से पहले पीड़िता के माता-पिता को विधिवत सहमति पत्र प्रस्तुत करना होगा. इसके बाद संपूर्ण प्रक्रिया विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में कानून के प्रावधानों के अनुसार संपन्न की जाएगी.
* पिता के माध्यम से हाईकोर्ट पहुंची पीड़िता
प्राप्त जानकारी के अनुसार पीड़िता की उम्र 16 वर्ष 8 माह है. वह दुष्कर्म की शिकार हुई थी और वर्तमान में उसकी गर्भावस्था 27 सप्ताह तक पहुंच चुकी थी. गर्भावस्था की अवधि कानूनी रूप से निर्धारित सामान्य सीमा से अधिक होने के कारण चिकित्सकीय गर्भसमापन के लिए न्यायालय की अनुमति आवश्यक थी. इसी कारण पीड़िता ने अपने पिता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गर्भसमापन की अनुमति मांगी थी. याचिका में कहा गया था कि नाबालिग की शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए गर्भावस्था को जारी रखना उसके स्वास्थ्य और भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है. इसलिए मानवीय आधार पर गर्भसमापन की अनुमति दी जाए.
* हाईकोर्ट ने तत्काल मांगी मेडिकल बोर्ड की राय
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने सोमवार को अमरावती के जिला सामान्य अस्पताल में गठित मेडिकल बोर्ड को तत्काल पीड़िता का परीक्षण करने और बिना विलंब रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था. अदालत ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम, 1971 के प्रावधानों के तहत विशेषज्ञ चिकित्सकों से यह स्पष्ट राय मांगी थी कि गर्भसमापन पीड़िता के लिए चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित है या नहीं. निर्देश के बाद मेडिकल बोर्ड ने नाबालिग का विस्तृत परीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी. रिपोर्ट में बताया गया कि गर्भसमापन की प्रक्रिया संभव है तथा इसमें केवल सीमित चिकित्सकीय जोखिम है. बोर्ड ने यह भी कहा कि आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञों की निगरानी में प्रक्रिया सुरक्षित रूप से की जा सकती है.
* मेडिकल रिपोर्ट के बाद अदालत ने दी अनुमति
मंगलवार को मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद हाईकोर्ट ने उस पर विचार किया और पाया कि गर्भसमापन से पीड़िता के स्वास्थ्य पर कोई असामान्य जोखिम नहीं है. इसके बाद अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए गर्भसमापन की अनुमति प्रदान कर दी. खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि पूरी प्रक्रिया चिकित्सकीय मानकों और कानूनी प्रावधानों का पालन करते हुए की जाए तथा पीड़िता की निजता, सुरक्षा और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जाए. अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि प्रक्रिया के दौरान सभी आवश्यक सावधानियां बरती जाएं.
* मानसिक और सामाजिक परिस्थितियों को भी माना महत्वपूर्ण
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में अदालत केवल गर्भावस्था की अवधि को ही नहीं देखती, बल्कि पीड़िता की आयु, मानसिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियों और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं का भी मूल्यांकन करती है. चूंकि इस मामले में पीड़िता नाबालिग है और दुष्कर्म का शिकार हुई है, इसलिए न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की सकारात्मक रिपोर्ट के साथ-साथ उसके मानसिक एवं भावनात्मक हितों को भी महत्व दिया.
* दोनों पक्षों की ओर से हुई पैरवी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एस.एच. भाटिया ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी अधिवक्ता एच. डी. मराठे उपस्थित रहे. मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अदालत ने अंतिम आदेश पारित किया.
* संवेदनशील मामलों में मानवीय दृष्टिकोण का उदाहरण
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के अधिकारों और स्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है. अदालत ने कानून और चिकित्सा विशेषज्ञों की राय के साथ मानवीय संवेदनाओं को भी महत्व देते हुए निर्णय दिया है. इस आदेश से यह संदेश जाता है कि विशेष परिस्थितियों में न्यायालय पीड़ित के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए आवश्यक राहत प्रदान कर सकता है. मामले को लेकर अब संबंधित अस्पताल प्रशासन आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर गर्भसमापन की प्रक्रिया शुरू करेगा. पूरे प्रकरण में पीड़िता की पहचान और निजता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश भी लागू रहेंगे.





