आपराधिक मामले में बरी होने से नौकरी में बहाली का अधिकार नहीं मिलता

नागपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे को बताया अलग प्रक्रियाएं

नागपुर/दि.14- बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी का आपराधिक मामले में बरी हो जाना उसे स्वतः नौकरी में बहाली या पुनर्नियुक्ति का अधिकार नहीं देता. अदालत ने कहा कि यदि कर्मचारी को विभागीय जांच में दोषी पाए जाने के बाद सेवा से हटाया गया है, तो बाद में आपराधिक मुकदमे में बरी होने के आधार पर वह बहाली की मांग नहीं कर सकता. न्यायमूर्ति रोहित डब्ल्यू. जोशी की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए एक सहायक शिक्षक द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं तथा दोनों में साक्ष्य और निर्णय के मानदंड भी अलग होते हैं.
मामले के अनुसार, वासुदेव वी. मलकापुर शिक्षण समिति द्वारा संचालित एक निजी विद्यालय में कार्यरत सहायक शिक्षक को विभागीय जांच में दोषी पाए जाने के बाद वर्ष 2001 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. हालांकि संबंधित शिक्षक को वर्ष 2004 में आपराधिक मामले में अदालत से बरी कर दिया गया. इसके बाद लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. सितंबर 2016 में विद्यालय प्रबंधन ने शिक्षक को नई नियुक्ति देने का आदेश जारी किया और शिक्षा अधिकारियों को उसकी सेवा में आए अंतराल को माफ करने का प्रस्ताव भेजा. लेकिन यह प्रस्ताव मंजूर नहीं हो सका और मामला लंबित रहा. इसके बाद शिक्षक ने वर्ष 2021 में स्कूल ट्रिब्यूनल में याचिका दायर कर सेवा में पुनः लिए जाने की मांग की. ट्रिब्यूनल ने याचिका में हुई देरी को देखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षक की बर्खास्तगी विभागीय जांच के निष्कर्षों के आधार पर की गई थी. इसलिए आपराधिक मुकदमे में बाद में मिली दोषमुक्ति का विभागीय कार्रवाई पर कोई स्वतः प्रभाव नहीं पड़ता. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि, विभागीय जांच में दोषसिद्धि और आपराधिक मुकदमे में बरी होना दो अलग-अलग विषय हैं. आपराधिक मामले में बरी होने को नौकरी में बहाली का आधार नहीं बनाया जा सकता. बरी होने के बाद जारी की गई नई नियुक्ति भी कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं मानी जा सकती. याचिकाकर्ता ने पांच वर्ष से अधिक की देरी से ट्रिब्यूनल का रुख किया, जबकि देरी का कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया.
हाईकोर्ट ने स्कूल ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि केवल आपराधिक मामले में बरी हो जाने से विभागीय जांच में दी गई सजा या सेवा समाप्ति स्वतः समाप्त नहीं हो जाती. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वी. ए. कोठले ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता ए. पी. चावरे तथा सहायक सरकारी अभिभाषक ए. एस. फुलझेले ने पैरवी की.

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