मेलघाट के कई किसानों की जमीनें ‘सरकारजमा’ दर्ज

ऑनलाइन 7/12 रिकॉर्ड में गड़बड़ी से आदिवासी किसान परेशान

चिखलदरा/दि.23- मेलघाट क्षेत्र के चिखलदरा तहसील अंतर्गत मौजा कारादा-कालापांढरी गांव में ऑनलाइन 7/12 रिकॉर्ड के संगणकीकरण के दौरान हुई कथित त्रुटियों ने आदिवासी और स्थानीय किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. किसानों का आरोप है कि भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण में भारी लापरवाही के कारण कई खेतों के सर्वे नंबर आपस में बदल गए, जबकि वर्षों से उनके कब्जे और खेती वाली जमीनें सरकारी रिकॉर्ड में ‘सरकारजमा’ दिखने लगी हैं. इस गड़बड़ी के कारण गांव में भ्रम और विवाद की स्थिति पैदा हो गई है. प्रभावित किसानों ने तहसील प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर तत्काल सुधार की मांग की है.
* पीढ़ियों से जोत रहे जमीन, रिकॉर्ड में बदल गए नाम
ग्रामीणों के अनुसार उनके परिवार कई पीढ़ियों से संबंधित जमीनों पर खेती कर आजीविका चला रहे हैं. लेकिन ऑनलाइन 7/12 रिकॉर्ड तैयार करते समय सर्वे नंबरों की अदला-बदली हो गई. परिणामस्वरूप जमीन पर वास्तविक कब्जा रखने वाले किसान का नाम रिकॉर्ड से गायब हो गया और कई मामलों में दूसरे व्यक्तियों के नाम दर्ज हो गए. किसानों का कहना है कि वास्तविक स्थिति और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज जानकारी में भारी अंतर आ गया है, जिससे भविष्य में कानूनी विवाद और बढ़ सकते हैं.
* ‘सरकारजमा’ दर्ज होने से बढ़ी चिंता
सबसे गंभीर समस्या उन किसानों के सामने आई है जिनकी पुश्तैनी और वर्षों से खेती की जा रही जमीनें राजस्व रिकॉर्ड में ‘सरकारजमा’ (सरकारी भूमि) के रूप में दर्ज हो गई हैं. किसानों का कहना है कि यदि समय रहते यह त्रुटि नहीं सुधारी गई तो उनके भूमि अधिकारों पर संकट खड़ा हो सकता है. इससे कृषि ऋण, सरकारी योजनाओं का लाभ और भविष्य में जमीन के स्वामित्व संबंधी दावों पर भी असर पड़ सकता है.
* जिलाधिकारी से हस्तक्षेप की मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि जो किसान जिस भूमि पर वर्षों से खेती और वास्तविक कब्जा रखता है, उसी के नाम संबंधित सर्वे नंबर कायम रखा जाए. साथ ही गलत तरीके से बदले गए सर्वे नंबरों और अन्य त्रुटियों को तत्काल दुरुस्त किया जाए. किसानों ने इस मामले में जिलाधिकारी से सीधे हस्तक्षेप कर न्याय दिलाने की अपील की है.
* तहसील प्रशासन को सौंपा ज्ञापन
इस संबंध में प्रभावित किसानों ने तहसील प्रशासन को ज्ञापन देकर समस्या से अवगत कराया है. ज्ञापन सौंपने वालों में मेराल धुर्वे, मनाजी मावस्कर, मुका जामुनकर, श्यामलाल जामुनकर, साबूलाल बेठेकर, जयसिंग उईके, मोहन उईके, मुंगेली मावस्कर सहित अनेक किसान शामिल हैं. वहीं ‘सरकारजमा’ दर्ज की गई जमीनों को पुनः किसानों के नाम दर्ज करने की मांग करने वालों में भुन्या मावस्कर, काल्या जामुनकर, जाजू भुसुम, सोमा भुसुम, केंडे भुसुम, गणाजी मावस्कर, रावजी जामुनकर, मुंगाजी मावस्कर, लाबु सावलकर और रामाजी भुसुम समेत अन्य किसान शामिल हैं.
* प्रशासनिक जांच की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि ऑनलाइन रिकॉर्ड तैयार करने के दौरान हुई त्रुटियों की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए. उनका आरोप है कि तकनीकी या मानवीय गलती का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है. फिलहाल किसान प्रशासन से त्वरित कार्रवाई और भूमि अभिलेखों में सुधार की उम्मीद लगाए बैठे हैं. यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो प्रभावित किसान आंदोलन का रास्ता अपनाने की चेतावनी भी दे रहे हैं.

 

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