क्या यही ‘अमृतकाल’ का आर्थिक सच है?

भारत दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. सरकार लगातार दावा करती है कि देश आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य, रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह, शेयर बाजार की नई ऊंचाइयां और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को विकास की सफलता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन संसद में हाल ही में प्रस्तुत एक सरकारी जानकारी ने इस चमकदार तस्वीर के पीछे छिपे एक ऐसे सच को उजागर किया है, जिस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है.
सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार देश में 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक की आय अथवा संपत्ति रखने वाले अरबपतियों की संख्या वर्ष 2021-22 में जहां 142 थी, वहीं अब यह बढ़कर 576 तक पहुंच गई है, अर्थात मात्र चार-पांच वर्षों में अरबपतियों की संख्या में लगभग 400 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. पहली नजर में यह आंकड़ा किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए उपलब्धि जैसा दिखाई देता है. लेकिन जब इसी देश में 82 करोड़ लोगों को आज भी मुफ्त राशन देने की आवश्यकता पड़ रही हो, तब यह आंकड़ा उपलब्धि से अधिक चिंता का विषय बन जाता है.
किसी भी देश में धनवान लोगों की संख्या बढ़ना अपने आप में गलत नहीं है. उद्योगों का विस्तार होगा, नए उद्यम खड़े होंगे, निवेश बढ़ेगा तो संपत्ति भी बनेगी और नए धनकुबेर भी पैदा होंगे. वास्तव में संपत्ति निर्माण आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण संकेतक है. लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विकास का लाभ समाज के एक छोटे से वर्ग तक सीमित रह जाता है और बहुसंख्यक आबादी आर्थिक संघर्षों से जूझती रहती है.
आज भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती गरीबी नहीं, बल्कि बढ़ती आर्थिक असमानता है. गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार अनेक योजनाएं चला सकती है, लेकिन आर्थिक विषमता का बढ़ना सामाजिक और आर्थिक स्थिरता दोनों के लिए खतरा बन जाता है. जब देश की अधिकांश संपत्ति कुछ हाथों में सिमटने लगे और करोड़ों लोग बुनियादी आवश्यकताओं के लिए सरकारी सहायता पर निर्भर रहें, तब विकास का मॉडल सवालों के घेरे में आ जाता है.
विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें लगातार यह संकेत देती रही हैं कि भारत दुनिया के सबसे अधिक आर्थिक विषमता वाले देशों में शामिल होता जा रहा है. ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी रिपोर्ट’ के अनुसार देश की कुल आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के नियंत्रण में है. इनमें भी सबसे ऊपर के एक प्रतिशत लोगों के पास राष्ट्रीय संपदा का अत्यधिक हिस्सा केंद्रित है. इसका अर्थ यह है कि आर्थिक विकास का अधिकांश लाभ समाज के ऊपरी तबके तक ही सीमित है.
आर्थिक सिद्धांत कहता है कि जब उद्योगपति और बड़े कारोबारी समृद्ध होते हैं तो उनका लाभ रोजगार, निवेश और उपभोग के माध्यम से समाज के निचले वर्गों तक भी पहुंचता है. इसे ‘ट्रिकल डाउन इफेक्ट’ कहा जाता है. लेकिन भारत में यह सिद्धांत अपेक्षित रूप से प्रभावी दिखाई नहीं देता. यदि ऐसा होता, तो देश में बेरोजगारी की समस्या इतनी गंभीर नहीं होती, युवाओं को रोजगार के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता और करोड़ों लोगों को मुफ्त खाद्यान्न पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. आज स्थिति यह है कि एक ओर शेयर बाजार नई ऊंचाइयों को छू रहा है, बड़ी कंपनियों के मुनाफे बढ़ रहे हैं और अरबपतियों की सूची लंबी होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर गांवों में खेती संकट से जूझ रही है, छोटे उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं और शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं. यह विरोधाभास केवल आर्थिक आंकड़ों का नहीं, बल्कि विकास की दिशा का प्रश्न है.
वास्तव में पिछले एक दशक की आर्थिक नीतियों का प्रभाव भी इस संदर्भ में विचारणीय है. वर्ष 2016 की नोटबंदी और उसके बाद लागू हुई जीएसटी व्यवस्था को अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था. लेकिन इसका सबसे अधिक प्रभाव असंगठित क्षेत्र, छोटे व्यापारियों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों पर पड़ा. अनेक छोटे व्यवसाय बंद हुए, लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई और रोजगार के अवसर कम हुए. इसके बाद कोरोना महामारी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया. महामारी के दौरान जहां करोड़ों लोग आर्थिक संकट में फंस गए, वहीं कई बड़े कॉर्पोरेट समूहों की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी भी विकसित देशों की तुलना में काफी कम है. देश की बड़ी आबादी निम्न और निम्न-मध्यम आय वर्ग में आती है. ग्रामीण क्षेत्रों में आय वृद्धि की गति धीमी है और कृषि क्षेत्र की चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं. ऐसे में केवल अरबपतियों की संख्या बढ़ने को आर्थिक सफलता का पर्याय नहीं माना जा सकता. किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसके कुछ सौ अरबपतियों में नहीं, बल्कि उसके करोड़ों नागरिकों की आर्थिक स्थिति में निहित होती है. यदि मध्यम वर्ग कमजोर हो रहा हो, यदि युवाओं के हाथों में रोजगार न हो, यदि किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य न मिल रहा हो और यदि गरीबों को जीवनयापन के लिए सरकारी सहायता की आवश्यकता पड़ रही हो, तो आर्थिक विकास के दावों की पुनः समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है.
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत में संपत्ति निर्माण के साथ-साथ अवसरों का भी समान वितरण हो रहा है? क्या आर्थिक विकास का लाभ गांवों, किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों और युवाओं तक पहुंच रहा है? क्या रोजगार सृजन की गति आर्थिक वृद्धि के अनुरूप है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर संतोषजनक नहीं है, तो अरबपतियों की बढ़ती संख्या उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है. भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है जो केवल कुछ लोगों को अत्यधिक समृद्ध बनाने के बजाय व्यापक जनसमूह को आर्थिक रूप से सशक्त बनाए. विकास का असली अर्थ तभी है जब देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ गरीबों की संख्या घटे, बेरोजगारी कम हो, किसानों की आय बढ़े और मध्यम वर्ग मजबूत बने. अन्यथा आर्थिक प्रगति के तमाम दावों के बावजूद बढ़ती अरबपति आबादी देश में गहराती असमानता की एक कठोर याद दिलाती रहेगी.
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम अरबपतियों की बढ़ती संख्या पर तालियां बजाएं, बल्कि ज्यादा जरूरत इस बात की है कि हम यह पूछें कि देश की संपत्ति का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कब पहुंचेगा. क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की सफलता का पैमाना कुछ सौ अमीरों की समृद्धि नहीं, बल्कि करोड़ों आम नागरिकों की खुशहाली होती है. ध्यान रखा जाना चाहिए कि जब विकास की चमक कुछ हाथों तक सीमित रह जाए और बहुसंख्यक आबादी संघर्ष करती रहे, तब आंकड़े उपलब्धि नहीं, चेतावनी बन जाते हैं.

Back to top button