क्या प्रवीण पोटे के तेवरों के पीछे छिपा है बड़ा राजनीतिक संदेश?

अमरावती भाजपा और राणा दम्पति के बीच में फिर उभरा शीतयुद्ध

* विधायक रवि राणा पर लगातार हमलावर हैं भाजपा नेता पोटे
* पोटे की आक्रामकता के पीछे संगठन की मौन सहमति के संकेत
* लोकसभा से लेकर विधान परिषद तक साथ-साथ, अब सार्वजनिक मंचों पर बढ़ी तल्खी
* राजनीतिक गलियारों में चर्चा – पोटे अकेले नहीं बोल रहे, पार्टी का संदेश भी दे रहे हैं
* त्वरित टिप्पणी/चंद्रप्रकाश दुबे
अमरावती/दि.8 – अमरावती की राजनीति में एक बार फिर भाजपा और विधायक रवि राणा के बीच तनाव खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है. तिवसा विधानसभा क्षेत्र की टिकट को लेकर विधायक रवि राणा के दावों के बाद भाजपा नेताओं ने जिस तरह एकजुट होकर जवाब दिया, उसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है. खासकर विधान परिषद सदस्य प्रवीण पोटे पाटिल के लगातार आक्रामक तेवरों ने इस सवाल को जन्म दिया है कि क्या यह केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है, या फिर इसके पीछे भाजपा संगठन का मौन समर्थन भी मौजूद है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा जैसे अनुशासित संगठन में कोई वरिष्ठ नेता लगातार इतने तीखे और व्यक्तिगत राजनीतिक हमले करे और पार्टी स्तर पर उसे रोका न जाए, तो इसे केवल व्यक्तिगत नाराजगी मानना कठिन है. यही कारण है कि अमरावती के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि विधायक प्रवीण पोटे के बयानों को संगठन के भीतर से कम से कम अप्रत्यक्ष समर्थन अवश्य प्राप्त है.
* कभी साथ, अब आमने-सामने
दिलचस्प बात यह है कि कुछ ही सप्ताह पहले विधान परिषद चुनाव के दौरान महायुति की एकजुटता का प्रदर्शन किया गया था. विधायक रवि राणा और पूर्व सांसद नवनीत राणा ने भी भाजपा उम्मीदवार प्रवीण पोटे के समर्थन की बात कही थी और महायुति नेतृत्व ने संयुक्त रणनीति बनाई थी. लेकिन अब वही विधायक प्रवीण पोटे सार्वजनिक मंचों से विधायक रवि राणा को निशाने पर ले रहे हैं. पहले उन्होंने अप्रत्यक्ष टिप्पणियां कीं, फिर हाल की पत्रकार परिषद में गारुड़ी की राजनीति और बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते जैसे तीखे राजनीतिक रूपकों का इस्तेमाल किया. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह केवल शब्दों की लड़ाई नहीं, बल्कि जिले में राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र तय करने की लड़ाई है.
* राणा के दावे ने भाजपा को क्यों किया असहज?
विवाद की जड़ विधायक रवि राणा का वह बयान बना, जिसमें उन्होंने कथित रूप से दावा किया कि पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने रविराज देशमुख की टिकट कटवाई थी और भविष्य में राजनीतिक बदलाव कर उन्हें विधायक बनाने का प्रयास करेंगे. इस बयान को भाजपा नेताओं ने सीधे-सीधे पार्टी की निर्णय प्रक्रिया पर दावा मान लिया. भाजपा नेताओं का तर्क है कि उम्मीदवारों का चयन संसदीय बोर्ड और शीर्ष नेतृत्व करता है, इसलिए किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा टिकट वितरण का श्रेय लेना पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं दोनों का अपमान है. यही कारण रहा कि विधायक राजेश वानखडे, प्रवीण पोटे और प्रताप अडसड एक मंच पर आकर जवाब देते दिखाई दिए.
* क्या भाजपा अपने राजनीतिक क्षेत्र की ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच रही है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा का वास्तविक संदेश केवल रवि राणा को जवाब देना नहीं था, बल्कि यह बताना था कि पार्टी अपने संगठनात्मक मामलों में किसी प्रकार का सार्वजनिक हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगी. अमरावती जिले में लंबे समय से यह धारणा रही है कि विधायक रवि राणा और पूर्व सांसद नवनीत राणा अपने जनाधार तथा राजनीतिक सक्रियता के कारण महायुति की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं. कई मौकों पर वे भाजपा से अलग पहचान रखते हुए भी सत्ता समीकरणों को प्रभावित करते रहे हैं. लेकिन भाजपा अब यह संकेत देती दिखाई दे रही है कि सहयोगी होना और संगठनात्मक निर्णयों पर प्रभाव का दावा करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.
* पोटे के तेवरों के पीछे संगठन?
राजनीतिक चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है. विधायक प्रवीण पोटे कोई साधारण नेता नहीं हैं. वे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं और हाल ही में अमरावती स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र से पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज कर चुके हैं. विश्लेषकों का कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व उनके बयानों से असहमत होता, तो अब तक उन्हें संयम बरतने की सलाह दी जा सकती थी. लेकिन इसके विपरीत, हाल की पत्रकार परिषद में उनके साथ विधायक राजेश वानखडे और प्रताप अडसड जैसे नेता भी मौजूद थे. इससे यह संदेश गया कि भाजपा इस मुद्दे पर सामूहिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहती है. यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल रही है कि विधायक प्रवीण पोटे भले ही सामने दिखाई दे रहे हों, लेकिन उनके पीछे संगठन की सहमति और समर्थन भी मौजूद हो सकता है.
* अब आगे क्या?
अमरावती में आगामी मनपा, जिला परिषद, पंचायत समिति और विधानसभा चुनावों की तैयारियां धीरे-धीरे शुरू हो रही हैं. ऐसे समय में भाजपा और रवि राणा के बीच बढ़ती सार्वजनिक तल्खी महायुति के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है. फिलहाल भाजपा नेताओं ने एक स्वर में यह संदेश दिया है कि टिकट वितरण, संगठनात्मक निर्णय और राजनीतिक नेतृत्व का अधिकार केवल पार्टी के पास है. वहीं रवि राणा की ओर से अब तक कोई विस्तृत प्रतिउत्तर सामने नहीं आया है. लेकिन इतना तय है कि तिवसा की टिकट को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल एक बयान का विवाद नहीं रह गया है. यह अमरावती जिले में राजनीतिक वर्चस्व, प्रभाव क्षेत्र और महायुति के भीतर शक्ति संतुलन की नई लड़ाई का संकेत बनता जा रहा है. और इस पूरे घटनाक्रम में प्रवीण पोटे की आक्रामक भूमिका ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या वे अकेले लड़ रहे हैं, या फिर भाजपा संगठन उनके पीछे मजबूती से खड़ा है?

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