मनपा के सफाई ठेका मामले की आखिर कब शुरू होगी जांच?
कोणार्क जांच पर सरकार की चुप्पी, आदिवासी छात्रावास मामले में फुर्ती!

* विधानसभा में एक ही विधायक के दो मुद्दों पर आखिर दोहरे मापदंड क्यों?
* एक पर आदिवासी आयुक्त तुरंत अमरावती पहुंचे, दूसरे पर जांच समिति का जीआर अब तक गायब
अमरावती/दि.10 – महाराष्ट्र विधानसभा के हालिया पावसाळी अधिवेशन में उठे दो गंभीर मुद्दों को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं. खास बात यह है कि दोनों ही मुद्दे एक ही विधायक द्वारा यानी विधायक सुलभा खोडके की ओर से सदन में उठाए गए थे और दोनों मामलों में संबंधित मंत्रियों ने कार्रवाई व जांच का आश्वासन भी दिया था. लेकिन सरकार की सक्रियता और गंभीरता दोनों मामलों में अलग-अलग दिखाई दे रही है. क्योंकि एक ओर तो आदिवासी छात्रावासों और आदिवासी विकास विभाग से जुड़े मुद्दे पर मंत्री की घोषणा के बाद राज्य के आदिवासी आयुक्त स्वयं तत्काल अमरावती पहुंचकर जांच प्रक्रिया में जुट गए, वहीं दूसरी ओर अमरावती मनपा द्वारा साफसफाई द्वारा कोणार्क कंपनी को दिए गए ठेका प्रकरण में मंत्री द्वारा सदन में जांच का आश्वासन देने के बावजूद आज तक विभागीय आयुक्त की अध्यक्षता वाली जांच समिति गठित करने का शासन निर्णय (जीआर) जारी नहीं हो सका है.
* एक मामले में दौड़ी सरकार, दूसरे में क्यों ठिठकी?
राजनीतिक गलियारों में अब यही सवाल चर्चा का विषय बन गया है कि जब एक मामले में कुछ ही दिनों के भीतर प्रशासन हरकत में आ सकता है, तो कोणार्क ठेका प्रकरण की जांच को लेकर शासन आखिर किस बात का इंतजार कर रहा है? विधानसभा में कोणार्क ठेका मामले को लेकर उठे सवालों के बाद संबंधित मंत्री ने विभागीय आयुक्त स्तर की जांच कराने की घोषणा की थी. सदन में दिए गए आश्वासन के बाद यह माना जा रहा था कि जल्द ही शासन निर्णय जारी होगा और जांच समिति काम शुरू करेगी. लेकिन अधिवेशन समाप्त होने के कई दिन बाद भी न तो समिति गठित हुई और न ही कोई आधिकारिक आदेश सामने आया.
* कोणार्क प्रकरण को लेकर पहले भी उठते रहे हैं सवाल
बता दे कि, कोणार्क ठेका प्रकरण पिछले कई महीनों से अमरावती के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. ठेका प्रक्रिया, नियमों के पालन, आर्थिक पहलुओं तथा प्रशासनिक निर्णयों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है. इसी पृष्ठभूमि में विधानसभा में मामला पहुंचा और मंत्री ने जांच का भरोसा दिया था. अब शासन स्तर पर हो रही देरी को लेकर विपक्षी दलों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों में भी असंतोष बढ़ने लगा है.
* क्या दबाव में रुकी है जांच?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस तेजी से आदिवासी विभाग के मामले में कार्रवाई हुई, उसी तेजी से कोणार्क मामले में कदम नहीं उठाए जाने से कई तरह की चर्चाओं को बल मिल रहा है. विपक्षी नेताओं का आरोप है कि यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता चाहती है तो जांच समिति गठन में देरी का कोई कारण नहीं होना चाहिए. वहीं कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जांच समिति के गठन में हो रही देरी से यह संदेश जा रहा है कि कहीं न कहीं मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश हो रही है.
* सवालों के घेरे में प्रशासनिक इच्छाशक्ति
सरकारी आश्वासन और वास्तविक कार्रवाई के बीच बढ़ती दूरी अब प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है. यदि सदन में मंत्री द्वारा दिया गया आश्वासन केवल घोषणा बनकर रह जाए, तो विधानसभा की कार्यवाही और जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए मुद्दों की गंभीरता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है.
* अब निगाहें शासन के अगले कदम पर
अमरावती सहित पूरे विदर्भ में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर कोणार्क जांच समिति का शासन निर्णय कब जारी होगा. राजनीतिक हलकों का मानना है कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो यह मुद्दा आने वाले दिनों में और अधिक गरमा सकता है. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है-जब एक मामले में मंत्री के निर्देश के बाद आयुक्त तत्काल मैदान में उतर सकते हैं, तो कोणार्क प्रकरण की जांच के लिए विभागीय आयुक्त समिति का आदेश अब तक क्यों नहीं निकला? इस सवाल का जवाब अब शासन और संबंधित विभाग को ही देना होगा.