जिला सहकारी बैंक में 1132 नए सदस्यों की एंट्री का रास्ता साफ
सहकार मंत्री के फैसले से मचा राजनीतिक भूचाल, विभागीय सहनिबंधक का आदेश रद्द

* तीन साल पुराने सदस्यता विवाद में आवेदकों को बड़ी राहत, चुनावी समीकरण बदलने के संकेत
अमरावती/दि.10 – अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक (एडीसीसी बैंक) में सदस्यता को लेकर पिछले लगभग तीन वर्षों से चल रहे कानूनी और राजनीतिक संघर्ष में बड़ा मोड़ आ गया है. राज्य के सहकार मंत्री बाबासाहेब पाटील ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए विभागीय सहनिबंधक के आदेश को रद्द कर दिया है तथा सदस्यता के लिए आवेदन करने वाले 1132 आवेदकों को उनके मूल आवेदन की तारीख से ही बैंक का मानीव (डीम्ड) सदस्य मानने के निर्देश दिए हैं. इस फैसले के बाद न केवल 1132 आवेदकों को सदस्यता का अधिकार मिल गया है, बल्कि आगामी बैंक चुनावों में मतदाता बनने का उनका रास्ता भी लगभग साफ हो गया है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस निर्णय का सीधा असर बैंक की सत्ता और भविष्य के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है.

* सत्ताधारी पैनल ने जताई नाराजगी
बैंक के उपाध्यक्ष अभिजित ढेपे ने इस निर्णय पर असहमति जताते हुए संकेत दिए हैं कि बैंक प्रबंधन उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है. उन्होंने कहा कि यह निर्णय न्यायसंगत नहीं है और इसके खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है.

* विपक्षी खेमे में खुशी की लहर
दूसरी ओर, पूर्व अध्यक्ष एवं संचालक बबलू देशमुख ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे सत्य की जीत बताया. उन्होंने कहा कि सदस्यता के पात्र आवेदकों को उनका अधिकार मिला है और आगे की परिस्थितियों के अनुसार अगली रणनीति तय की जाएगी.
* क्या है पूरा मामला?
जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक में सितंबर और अक्टूबर 2023 के दौरान अशोक दामोदर होले समेत कुल 1132 नागरिकों ने सदस्यता के लिए निर्धारित प्रवेश शुल्क और शेयर राशि (1,050 रुपये) जमा कर आवेदन किया था. उस समय बैंक के प्रचलित उपविधियों के अनुसार व्यक्तिगत सदस्य बनने की व्यवस्था लागू थी और आवेदक निर्धारित सभी पात्रताएं पूरी कर रहे थे. लेकिन बाद में बैंक के संचालक मंडल ने 18 नवंबर 2023 को उपविधियों में संशोधन का हवाला देते हुए नए व्यक्तिगत सदस्य नहीं लेने का निर्णय लिया और सभी 1132 आवेदन खारिज कर दिए. बैंक प्रशासन का तर्क था कि संशोधित उपविधियों के बाद व्यक्तिगत सदस्यता का प्रावधान सीमित हो गया है, इसलिए नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जा सकते.
* पहले अपील भी हुई थी खारिज
बैंक के निर्णय से असंतुष्ट आवेदकों ने महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम की धारा 23 के तहत विभागीय सहनिबंधक के समक्ष अपील दायर की. मामले की सुनवाई के बाद विभागीय सहनिबंधक ने 16 मार्च 2026 को आवेदकों की अपील खारिज कर दी थी. साथ ही उन्हें नए नियमों के अनुसार पुनः आवेदन करने की सलाह दी गई थी. इस निर्णय को आवेदकों ने अन्यायपूर्ण बताते हुए राज्य के सहकार मंत्री के समक्ष महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम, 1960 की धारा 154 के तहत पुनरीक्षण याचिका दायर की.
* सहकार मंत्री ने क्या कहा?
इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद सहकार मंत्री बाबासाहेब पाटील ने स्पष्ट कहा कि, जब आवेदकों ने सदस्यता के लिए आवेदन किया था, उस समय बैंक के उपविधियों के अनुसार वे पूरी तरह पात्र थे. बाद में किए गए संशोधन के आधार पर उनके अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता. मंत्री पाटिल ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि सहकारी संस्था कानून की धारा 23 के अनुसार जिला सहकारी बैंक जैसी संस्थाओं को खुली सदस्यता के सिद्धांत का पालन करना होता है और पात्र व्यक्ति को मनमाने ढंग से सदस्यता से वंचित नहीं किया जा सकता.
* विभागीय सहनिबंधक का आदेश क्यों हुआ रद्द?
सहकार मंत्री पाटिल ने अपने फैसले में कहा कि विभागीय सहनिबंधक ने आवेदकों की पात्रता का मूल्यांकन आवेदन की तारीख के आधार पर करने के बजाय बाद के नियमों को आधार बनाया, जो विधिसम्मत नहीं है. इसी आधार पर 16 मार्च 2026 का आदेश रद्द करते हुए 1132 आवेदकों को उनके मूल आवेदन की तारीख से मानीव सदस्य घोषित करने के निर्देश दिए गए.
* चुनावी राजनीति में बढ़ सकती है हलचल
यह निर्णय ऐसे समय आया है जब जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के आगामी चुनावों की चर्चा तेज हो रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 1132 नए सदस्यों का मतदाता सूची में शामिल होना बैंक की सत्ता पर काबिज पैनल और विपक्षी गुटों के बीच शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है. ज्ञात रहे कि, सहकार क्षेत्र में जिला बैंकों का राजनीतिक महत्व अत्यधिक माना जाता है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि ऋण वितरण और सहकारी संस्थाओं पर प्रभाव के कारण जिला बैंक की सत्ता को स्थानीय राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. इसी वजह से इस फैसले को केवल कानूनी जीत नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है.
* अब आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बैंक प्रबंधन इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देगा या फिर 1132 आवेदकों को सदस्यता देकर उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू करेगा. यदि यह निर्णय अंतिम रूप से लागू होता है तो जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक की राजनीति में नए समीकरण बनना तय माना जा रहा है. सहकार मंत्री के इस आदेश ने न केवल तीन वर्ष पुराने विवाद का नया अध्याय खोल दिया है, बल्कि आगामी बैंक चुनावों को भी पहले से अधिक रोचक और संघर्षपूर्ण बना दिया है.





