वेंटिलेटर का प्रबंधन महत्वपूर्ण, दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं टालने का शहर के बालरोग विशेषज्ञों का आवाहन

विभिन्न अस्पतालों में भर्ती नवजातों की पूर्ण देखभाल की जा रही

* अमरावती मंडल से चर्चा में चिकित्सकों ने बतलाए वेंटिलेटर उपयोग के कारण भी
* संदर्भ जिला स्त्री अस्पताल डफरीन में हुई नवजातों की मृत्यु
अमरावती/दि.25 – जिस प्रकार प्रत्येक मशनरी के रखरखाव का नियम, कायदा होता है, उसी प्रकार वेंटिलेटर का भी मेंटेनन्स रहता है. उसके उपयोग पश्चात उसे रेस्ट देने की आवश्यकता रहती है. नवजात या बच्चों को वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता के अलग-अलग कारण हो सकते हैं. सबसे मुख्य कारण नवजात को सांस लेने में दिक्कत और कई मामलों में कम वजन के और प्रीमैचुअर बच्चों में फेफडे विकसित न हो पाने की स्थिति में वेंटिलेटर सपोर्ट देना पडता है. यह बात अमरावती के विशेषज्ञ बालरोग चिकित्सकों ने अमरावती मंडल से खास चर्चा में बताई. शहर के युवा बालरोग तज्ञ से लेकर वरिष्ठ चिकित्सकों और निजी महाविद्यालय अधिष्ठाता से अमरावती मंडल ने इस संदर्भ में बात की. कल सोमवार को ही शहर के जिला स्त्री अस्पताल अर्थात डफरीन में एसएनसीयू में हुए वेंटिलेटर ब्लास्ट में तीन मासूमों की दर्दनाक मृत्यु के संदर्भ में यह चर्चा की गई. सभी चिकित्सकों फिर वह डॉ. राजेश बूब हो या वरिष्ठ डॉ. हेमंत मुरके, युवा बालरोग तज्ञ डॉ. प्रवल्लिका रायचंदानी अथवा डॉ. लक्ष्मी भोंड या फिर डॉ. राजेश शर्मा, डीन डॉ. अनिल देशमुख ने इस तरह की झकझोर देनेवाली घटनाएं रोकने के लिए सभी से सभी प्रकार की उपाययोजना करने और सावधानी बरतने का आवाहन भी इस चर्चा में अमरावती मंडल के माध्यम से किया.

* सांस लेने में वेंटिलेटर सपोर्ट
शहर के वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत मुरके ने बताया कि, वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता के अनेक कारण हो सकते हैं. कम वजन के अथवा प्रीमैचुअर और कई बार नवजात को सांस लेने में दिक्कत को ध्यान में रखकर चिकित्सक वेंटिलेटर सपोर्ट का निर्णय करते हैं. ऑक्सीजन भी लगाना पडता है. बच्चे की स्थिति देखकर चिकित्सक निर्णय करते हैं. वेंटिलेटर की सेटिंग भी आवश्यक होती है. उन्होंने बताया कि, कई बार एक किलो से भी कम वजन के शिशु होते हैं. उन्हें न केवल वेंटिलेटर सपोर्ट बल्कि कई बार ब्लड भी देना पड सकता है. डॉ. मुरके के अनुसार वेंटिलेटर का मेंटेनन्स उसी प्रकार आवश्यक है, जिस प्रकार हम अन्य मशीनरी अथवा अपने वाहन और अन्य उपकरणों का करते हैं. डॉ. मुरके ने जिला स्त्री अस्पताल की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने बताया कि, उनके अस्पताल के एनआईसीयू में डफरीन से सोमवार को 8 शिशु लाए गए हैं. अभी उनकी दशा क्रिटीकल ही कहीं जा सकती हैं.

* वेंटिलेटर का मेंटेनन्स, वॉच बेहद जरुरी
तीन दशकों से अमरावती में बच्चों की हारी-बीमारी में सेवा हेतु तत्पर डॉ. राजेश गणेश बूब ने डफरीन की घटना को अत्यंत दुर्भाग्यजनक बताते हुए समाज के सभी वर्गों से इस प्रकार के हादसे रोकने के लिए प्रभावी और सार्थक कदम उठाने की अपील अमरावती मंडल से खास चर्चा दौरान की. आपने कहा कि, इस घटना ने सभी को झकझोर दिया, रुला दिया. ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति टालना हम सभी का कर्तव्य है. डॉ. राजेश बूब ने यह भी बताया कि, वेंटिलेटर सपोर्ट पर शिशु को रखने के अनेक कारण हो सकते हैं. कई बार किसी दुर्घटना के बाद भी शिशु के सांस लेने में तकलीफ की आशंका देखते हुए चिकित्सक वेंटिलेटर सपोर्ट की सलाह देते हैं. डॉ. बूब के अनुसार सांस लेने में परेशानी, ब्रेन में कोई दिक्कत आदि के चलते वेंटिलेटर लगाना पडता है. उसके लिए सांस के सेकंद की सेटिंग भी करनी होती है. तत्पश्चात लगातार वॉच और मेंटेनन्स आवश्यक है. बेसीकली सांस लेने में परेशानी होने पर शिशु को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा जाता है. डॉ. बूब ने भी कहा कि, समय-समय पर सर्विसिंग और देखभाल की आवश्यकता उपकरणों को होती है. उन्होंने बताया कि, रेस्ट देना ही पडता है. ओवरलोड होने पर दुर्घटना की आशंका बढ जाती है.

* जंतु संसर्ग और मस्तिष्क संसर्ग में पडती जरुरत
पारिजात अस्पताल की बालरोग तज्ञ डॉ. लक्ष्मी भोंड ने बताया कि, पूरे दिन का वेंटिलेटर सपोर्ट तुलना में कम ही काम पडता है. जिन शिशुओं में जंतु संसर्ग और मस्तिष्क संसर्ग की आशंका देखी जाती है, ऐसे शिशुओं कृत्रिम यंत्रणा पर रखना पडता है. डॉ. भोंड के अनुसार कम दिनों में जन्म शिशुओं में भी समस्या हो सकती है. फेफडे पूर्ण रुप से बनने में विलंब होता है. ऐसे शिशुओं को भी वेंटिलेटर सपोर्ट में सेटिंग आवश्यक है. उन्होंने बताया कि, सोमवार को डफरीन की घटना से प्रभावित दो शिशुओं को उनके अस्पताल में दाखिल किया गया है. अभी तबीयत पर संपूर्ण ध्यान दिया जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि, स्त्री अस्पताल की परिचारिकाओं और स्टाफ की तत्परता एवं साहस के कारण नवजात को बचाया गया. डॉ. लक्ष्मी भोंड के अनुसार पारिजात अस्पताल में 17 शिशु का अति दक्षता कक्ष उपलब्ध है. फिलहाल वहां शिशुओं को रखा गया है. उनकी संपूर्ण देखभाल की जा रही है.
* इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के संपूर्ण वॉच की दरकार
होप अस्पताल की बालरोग तज्ञ डॉ. प्रवल्लिका रायचंदानी ने बताया कि, वेंटिलेटर सपोर्ट भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है. नवजात शिशुओं को वेंटिलेटर सपोर्ट दिया जाता है, तो उसके पूर्ण देखभाल की आवश्यकता होती ही है. डॉ. रायचंदानी ने बताया कि, बेबी को सांस लेने में परेशानी, एयर फ्लो के लिए सेकंड आधारित सेटिंग कर वेंटिलेटर सपोर्ट दिया जाता है. उनके यहां 15 नवजात शिशु अति दक्षता विभाग में रखे जा सकते हैं. सोमवार को डफरीन अस्पताल से उनके यहां भी शिशुओं को लाया गया था. अत: उनकी देखभाल की जा रही है. अमरावती मंडल से चर्चा में उन्होंने बताया कि, वेंटिलेटर का सभी प्रकार से ध्यान रखना जरुरी होता है. डफरीन की घटना पर टिप्पणी से बचते हुए उन्होंने कहा कि, वेंटिलेटर भी बिजली से चलता है. बिजली गुल हो जाए, तो बैटरी बैकअप बराबर है या नहीं और ओवरलोड तो न हो गया हो, इस बात का भी ध्यान रखना जरुरी होता है. उन्होंने आज-कल कमजोर शिशु पैदा होने की आशंका से साफ इंकार किया. डॉ. रायचंदानी के अनुसार समय से पहले जन्मे शिशुओं की देखभाल तो आवश्यक है ही. वेंटिलेटर सपोर्ट के नाना कारण होते हैं. उसी प्रकार मशीन के प्रेशर आदि को भी बराबर जांचना पडता है.

* शिशु की देखभाल महत्वपूर्ण
डॉ. पंजाबराव देशमुख स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय अधिष्ठाता डॉ. अनिल देशमुख ने कहा कि, सांस लेने में दिक्कत, निमोनिया, ऑक्सीजन न मिल पाना, एंटीबायोटिक का रिस्पॉन्स आदि अनेक कारणों से शिशु को वेंटिलेटर सपोर्ट लगाना पडता है. हमारे महाविद्यालय अस्पताल में इन बॉर्न और आउट बॉर्न इस प्रकार दो एनआईसीयू उपलब्ध है. 30 शिशु का यहां उपचार चलता है. पर्याप्त संख्या में वेंटिलेटर उपलब्ध होने का दावा कर डीन डॉ. देशमुख ने कहा कि, प्रत्येक शिशु पर एक परिचारिका तैनात है. उन्होंने कहा कि, डफरीन की घटना के जो भी कारण रहे होंगे. इतना तो जरुर है कि, शिशु का मामला है, तो अतिरिक्त सावधानी रखनी पडती है, रखनी चाहिए. डॉ. देशमुख ने बताया कि, डफरीन से सोमवार को 11 शिशु यहां आनन-फानन में लाए गए. उपरांत अन्य अस्पतालों से 2 शिशु सोमवार को ही पीडीएमएमसी के आईसीयू में दाखिल किए गए हैं. अति दक्षता विभाग कहा जाता है, नाम के अनुरुप अति दक्षता रखनी होती है. भविष्य में इस प्रकार की दुर्भाग्यजनक घटनाएं रोकने पर हम सभी को बल देना चाहिए.

* वेंटिलेटर मेंटेनन्स बेहद जरुरी
बालरोग तज्ञ डॉ. राजेश शर्मा ने कहा कि, बच्चे हो या बडे मरीज वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता पडने पर ही चिकित्सक उसकी सलाह देते हैं. किंतु अति दक्षता विभाग में सचमुच काफी सावधानी बरते जाने की आवश्यकता होती है. डॉ. शर्मा के अनुसार वेंटिलेटर विस्फोट होने की आशंका रहती है. उसका मेंटेनन्स बेहद जरुरी है. कौनसे बच्चों को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पडता है, इस प्रश्न के उत्तर में वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. शर्मा ने बताया कि, शिशु की प्राणों की रक्षा करना चिकित्सक का पहला दायित्व होता है. अत: ऑक्सीजन की कमी, सांस लेने में परेशानी देखते ही वेंटिलेटर की सलाह दी जाती है. उपकरण का उपयोग करना पडता है. ऐसे में उनके प्रेशर और सभी बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है. कम वजन के बच्चे की देखभाल वैसे भी बहुत सावधानी की डिमांड करती है. अत: उस दृष्टि से नियोजन करना चिकित्सक, अस्पताल का जिम्मा होता है.
* अमरावती में 131 बेड के एनआईसीयू
चिकित्सा की भाषा में एनआईसीयू और एसएनसीयू कहे जाते अति दक्षता विभाग में शिशुओं को रखने की नौबत आती है. उनकी दशा अत्यंत चिंताजनक होने पर ही विभाग में उपचार शुरु किया जाता है. अमरावती शहर में सभी निजी और सरकारी अस्पताल मिलाकर 131 बेड के एनआईसीयू रहने की जानकारी चिकित्सा जगत ने दी. उन्होंने बताया कि, वेंटिलेटर की संख्या कम-अधिक हो सकती है. इतना अवश्य है कि, चिकित्सा सेवाएं पहले से बेहतर हुई है. आगे भी सुविधाएं बढाने के लिए शासन और निजी अस्पताल प्रयासरत हैं.

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