कागजों में सुरक्षित, हकीकत में मौत का जाल!

डफरिन अस्पताल में सुरक्षा नियमों की पोल खुली

* तीन नवजातों की मौत के बाद 15 अनिवार्य सुरक्षा अनुमतियों, फायर ऑडिट और ऑनलाइन रिपोर्टिंग पर उठे गंभीर सवाल
* अग्नि सुरक्षा सप्ताह मनाया गया, फिर भी एसएनसीयू में कैसे हो गया मौत का विस्फोट?
अमरावती/दि.27 –  फायर सेफ्टी असेसमेंट के तहत अस्पतालों को विस्तृत निरीक्षण सूची (चेकलिस्ट) भरनी होती है. इसमें अग्निडफरिन अस्पताल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष (एसएनसीयू) में हुए भीषण अग्निकांड और तीन मासूम बच्चों की मौत के बाद अब अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक के बाद एक चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं. प्रारंभिक जांच और प्रशासनिक दस्तावेजों को लेकर उठ रहे सवालों ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है. सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि अस्पताल में सुरक्षा संबंधी सभी नियमों का पालन किया जा रहा था, तो फिर अत्याधुनिक बताए जाने वाले एसएनसीयू में ऐसा हादसा कैसे हुआ? और यदि सुरक्षा व्यवस्थाओं में खामियां थीं, तो जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?

* अग्नि सुरक्षा सप्ताह के बावजूद नहीं टली त्रासदी
विशेष रूप से हैरानी की बात यह है कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 4 से 10 मई के बीच देशभर में अग्नि सुरक्षा सप्ताह मनाया गया था. इस दौरान सरकारी और निजी संस्थानों में आग से बचाव, सुरक्षा उपकरणों की जांच तथा आपदा प्रबंधन को लेकर जागरूकता अभियान चलाए गए थे. अब सवाल उठ रहा है कि क्या डफरिन अस्पताल भी इस अभियान का हिस्सा था? यदि था, तो वहां की सुरक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया? और यदि निरीक्षण हुआ था, तो एसएनसीयू में मौजूद संभावित खतरे क्यों नहीं चिन्हित किए गए? शहर में यह चर्चा तेज है कि कहीं अग्नि सुरक्षा सप्ताह केवल औपचारिकता बनकर तो नहीं रह गया था.

* 15 अनिवार्य सुरक्षा अनुमतियों पर उठे सवाल
नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी अस्पताल को सुरक्षित और सुचारु रूप से संचालित करने के लिए अनेक कानूनी और तकनीकी प्रमाणपत्रों का नियमित नवीनीकरण आवश्यक होता है. इनमें प्रमुख रूप से फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र, भवन उपयोग (ऑक्युपेंसी) प्रमाणपत्र, इलेक्ट्रिकल सेफ्टी सर्टिफिकेट, विद्युत गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, भवन स्थिरता प्रमाणपत्र, बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन अनुमति, महाराष्ट्र नर्सिंग होम पंजीयन, पीसीपीएनडीटी लाइसेंस, एमटीपी लाइसेंस, एईआरबी अनुमति, औषधि लाइसेंस, खाद्य सुरक्षा लाइसेंस, लिफ्ट सुरक्षा प्रमाणपत्र, वर्षा जल संरक्षण प्रमाणपत्र, अन्य सुरक्षा एवं संचालन संबंधी अनुमतियां शामिल हैं. अब यह सवाल उठ रहा है कि इनमें से कितनी अनुमतियां वैध थीं और कितनों का नवीनीकरण लंबित था. यदि कोई अनुमति समाप्त हो चुकी थी तो संबंधितफाइलों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

* एनएचएम पोर्टल पर क्या दर्ज की जा रही थी जानकारी?
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत सभी सरकारी अस्पतालों को हर महीने अपनी सुरक्षा व्यवस्था, फायर ऑडिट और अन्य तकनीकी जानकारी एचएमआईएस पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होता है. डफरिन अस्पताल द्वारा इस पोर्टल पर दर्ज की गई जानकारी अब जांच का विषय बन सकती है. प्रमुख सवाल हैं, क्या फायर ऑडिट की वास्तविक स्थिति पोर्टल पर दर्ज की गई थी? क्या किसी सुरक्षा कमी का उल्लेख किया गया था? यदि खामियां दर्ज थीं, तो वरिष्ठ अधिकारियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की? और यदि सब कुछ सुरक्षित बताया गया था, तो वास्तविक स्थिति उससे अलग क्यों निकली? विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रश्नों के उत्तर जांच की दिशा तय कर सकते हैं.

* क्या चेकलिस्ट सिर्फ हस्ताक्षर तक सीमित रह गई?शमन यंत्रों की वैधता, स्प्रिंकलर सिस्टम की कार्यक्षमता, पानी के भंडारण की स्थिति, स्मोक डिटेक्टर, अलार्म सिस्टम और आपातकालीन निकास मार्गों की वास्तविक जांच की जाती है. लेकिन अब आरोप लगाए जा रहे हैं कि डफरिन अस्पताल में यह पूरी प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित रह गई. यदि चेकलिस्ट में सब कुछ संतोषजनक दिखाया गया था, तो फिर हादसे के समय सुरक्षा व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं रही? कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि निरीक्षण और ऑडिट केवल औपचारिकता के लिए किए गए, तो यह सीधे-सीधे मरीजों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है.

* जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज
तीन नवजातों की मौत के बाद अब विभिन्न सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिक मंचों ने अस्पताल की सुरक्षा अनुमतियों, फायर ऑडिट रिपोर्ट, इलेक्ट्रिकल निरीक्षण और ऑनलाइन रिपोर्टिंग प्रणाली की उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज कर दी है. लोगों का कहना है कि यह केवल तकनीकी दुर्घटना नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की विफलता का मामला है. यदि कहीं भी दस्तावेजी लापरवाही, गलत जानकारी या सुरक्षा मानकों की अनदेखी साबित होती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.

* जांच के केंद्र में अब सुरक्षा तंत्र
डफरिन अग्निकांड की जांच अब केवल वेंटिलेटर या विद्युत खराबी तक सीमित नहीं रह गई है. सुरक्षा प्रमाणपत्रों, फायर ऑडिट, तकनीकी निरीक्षण, ऑनलाइन रिपोर्टिंग और प्रशासनिक जवाबदेही तक इसकी परिधि बढ़ती जा रही है. तीन मासूमों की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी अस्पतालों में सुरक्षा नियम वास्तव में लागू होते हैं या केवल कागजों पर सुरक्षित दिखाने के लिए औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं. अब पूरे प्रदेश की नजर इस बात पर है कि जांच समिति इन सवालों के जवाब कैसे तलाशती है और क्या इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही वास्तव में तय होती है.

Back to top button