डफरीन अग्निकांड : क्या था वेंटिलेटर विस्फोट का असली कारण?
अब जांच के केंद्र में बिजली का लोड, उपकरणों की गुणवत्ता और प्रशासनिक जवाबदेही

अमरावती/दि.27 – अमरावती के जिला महिला अस्पताल (डफरीन) के नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष (एसएनसीयू) में हुए भीषण अग्निकांड और तीन मासूम नवजातों की दर्दनाक मौत के बाद अब पूरा मामला केवल एक अस्पताल दुर्घटना तक सीमित नहीं रह गया है. यह राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, उपकरणों की गुणवत्ता, सुरक्षा ऑडिट, विद्युत व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला बन गया है. राज्य सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति अब इस त्रासदी की तह तक पहुंचने में जुटी है. जांच का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु वेंटिलेटर की गुणवत्ता, उसकी खरीद प्रक्रिया, तकनीकी स्थिति और उसे मिलने वाले विद्युत भार (लोड) को बनाया गया है. स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार समिति यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि आखिर ऐसा कौन-सा तकनीकी या प्रशासनिक दोष था, जिसके कारण एक अत्याधुनिक बताई जाने वाली नई इमारत में इतना बड़ा हादसा हो गया.
* आखिर कैसे हुआ हादसा?
सोमवार तड़के डफरीन अस्पताल के एसएनसीयू में भर्ती 39 नवजात शिशुओं के बीच अचानक एक वेंटिलेटर में विस्फोट हुआ. विस्फोट के बाद कुछ ही क्षणों में धुआं और आग फैल गई. अफरा-तफरी के बीच डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मचारियों ने जान जोखिम में डालकर 36 नवजातों को बाहर निकाला, लेकिन तीन मासूम बच्चों को बचाया नहीं जा सका. इस घटना ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया. जिस अस्पताल को हाल ही में उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया था और जो राज्य में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले अस्पतालों में गिना जाता था, वहीं नवजातों की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए.
* जांच के घेरे में बिजली का लोड
स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि केवल वेंटिलेटर की तकनीकी खराबी ही इस दुर्घटना का कारण नहीं हो सकती. जांच में यह भी देखा जा रहा है कि अस्पताल में स्थापित उपकरणों को कितनी क्षमता की बिजली आपूर्ति की जा रही थी और क्या विद्युत भार उपकरणों की सहनशीलता से अधिक था. विशेषज्ञों का कहना है कि एसएनसीयू में लगे वेंटिलेटर, वार्मर, मॉनिटर, ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम और एयर कंडीशनिंग जैसी मशीनें लगातार बिजली पर निर्भर रहती हैं. यदि बिजली के दबाव में असामान्य उतार-चढ़ाव हुआ हो या लोड प्रबंधन में कोई खामी रही हो, तो उपकरणों के ओवरहीट होने और विस्फोट जैसी स्थिति से इंकार नहीं किया जा सकता. इसी संभावना को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग अब राज्यभर के सरकारी अस्पतालों में नई मशीनें स्थापित करने से पहले बिजली वितरण और पारेषण कंपनियों का तकनीकी प्रमाणपत्र अनिवार्य करने पर विचार कर रहा है.
* वेंटिलेटर की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
डफरीन अग्निकांड के बाद वेंटिलेटर की गुणवत्ता को लेकर भी विवाद तेज हो गया है. पूर्व पालकमंत्री डॉ. सुनील देशमुख ने आरोप लगाया है कि अस्पताल में लगाए गए वेंटिलेटर कथित रूप से निम्न गुणवत्ता के, डुप्लीकेट अथवा चीन निर्मित हो सकते हैं. हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन जांच एजेंसियां अब यह भी खंगाल रही हैं कि संबंधित उपकरण कब खरीदे गए, किस प्रक्रिया से खरीदे गए, किस कंपनी ने उनकी आपूर्ति की और उनका रखरखाव किसके जिम्मे था. जांच समिति यह भी पता लगा रही है कि वेंटिलेटर की आखिरी सर्विसिंग कब हुई थी, क्या उसकी तकनीकी जांच नियमित रूप से हो रही थी और क्या उसमें पहले भी कोई खराबी दर्ज की गई थी.
* खरीद प्रक्रिया भी जांच के दायरे में
सूत्रों के अनुसार समिति केवल दुर्घटना के तत्काल कारणों तक सीमित नहीं रहेगी. वह उपकरणों की खरीद प्रक्रिया, निविदा शर्तों, तकनीकी स्वीकृति, इंस्टॉलेशन, निरीक्षण और रखरखाव के पूरे रिकॉर्ड की जांच करेगी. स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यदि उपकरणों की खरीद या गुणवत्ता में किसी प्रकार की अनियमितता पाई गई तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी.
* स्वास्थ्य मंत्री का बड़ा संकेत
राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जांच के बाद दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. उन्होंने कहा है कि अस्पतालों में स्थापित उपकरणों के लिए विद्युत सुरक्षा मानकों को और अधिक सख्त बनाया जाएगा. मंत्री ने यह भी घोषणा की है कि अग्निकांड के दौरान साहस दिखाकर 36 नवजातों की जान बचाने वाले डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मचारियों का सम्मान किया जाएगा तथा उनके वेतन और सेवा शर्तों पर भी सकारात्मक विचार किया जाएगा.
* चार दिन में रिपोर्ट, पूरे राज्य की नजर
आयुक्त स्तर की जांच समिति अगले कुछ दिनों में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने वाली है. इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि हादसे का वास्तविक कारण क्या था-क्या यह तकनीकी खराबी थी, बिजली व्यवस्था की विफलता थी, उपकरणों की गुणवत्ता में कमी थी या फिर प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस एसएनसीयू में जीवन बचाने वाली मशीनें लगी थीं, वहीं मौत का तांडव कैसे मच गया? तीन मासूमों की मौत का जिम्मेदार कौन है? और क्या इस बार भी जांच रिपोर्ट फाइलों में दब जाएगी या फिर वास्तव में जिम्मेदार लोगों तक कानून का हाथ पहुंचेगा? अमरावती ही नहीं, पूरा महाराष्ट्र अब इन सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा है.





