सातुर्णा औद्योगिक वसाहत में भूखंडों को लेकर घमासान
उद्यमियों ने अनियमितता के आरोप लगाकर जांच मांगी

अध्यक्ष वीरेंद्र लढ्ढा ने कहा, नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जा रही
अमरावती/दि.30 – स्थानीय बडनेरा रोड स्थित सातुर्णा औद्योगिक वसाहत सहकारी संस्था में औद्योगिक भूखंडों के आवंटन, जब्ती, पुनर्वाटप और उपयोग को लेकर विवाद गहरा गया है. कुछ उद्यमियों ने संस्था के संचालक मंडल पर नियमों की अनदेखी कर भूखंडों के संबंध में मनमाने निर्णय लेने के आरोप लगाते हुए जिला उद्योग केंद्र में शिकायत दर्ज कराई है. वहीं संस्था के अध्यक्ष वीरेंद्र लढ्ढा ने इन आरोपों को व्यक्तिगत हितों से प्रेरित बताते हुए कहा है कि संस्था द्वारा केवल उद्योग स्थापित करने के उद्देश्य से आवंटित भूखंडों का वर्षों से गैर-औद्योगिक उपयोग करने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है.
इस संदर्भ में प्राप्त जानकारी के मुताबिक, सातुर्णा औद्योगिक वसाहत में स्थित जाधव इंजीनियरिंग कंपनी प्रा. लि., किसान इंडस्ट्रीज, प्रतीक ब्रिक्स इंडस्ट्रीज तथा नवभारत सीमेंट वस्तु निर्मिती से जुड़े संचालकों ने जिला उद्योग केंद्र के उपसंचालक से मुलाकात करते हुए संस्था के भूखंडों से संबंधित विभिन्न निर्णयों पर आपत्ति जताई है. उनका आरोप है कि कुछ भूखंडों की जब्ती, विभाजन, पुनर्वाटप तथा बिक्री की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया. उन्होंने वर्ष 2015 के बाद लिए गए कथित विवादित प्रस्तावों और भूखंड आवंटनों की जांच की मांग की है.
* 66 हजार वर्गफीट भूखंड सबसे बड़ा विवाद
शिकायत में जाधव इंजीनियरिंग कंपनी के लगभग 66 हजार वर्गफीट भूखंड का विशेष उल्लेख किया गया है. शिकायतकर्ताओं का कहना है कि भूखंड न्यायालयीन विवाद में है और उस पर अंतरिम स्थगन आदेश लागू है. इसके बावजूद भूखंड को पांच-छह छोटे हिस्सों में विभाजित कर अन्य उद्योगों को देने की प्रक्रिया शुरू किए जाने का आरोप लगाया गया है. इस पर संस्था के अध्यक्ष वीरेंद्र लढ्ढा का कहना है कि जाधव इंडस्ट्रीज को वर्ष 1978 में बड़े पैमाने के उद्योग की श्रेणी में लगभग 66 हजार वर्गफीट जमीन आवंटित की गई थी. उनके अनुसार, संबंधित उद्योग पिछले करीब 20 वर्षों से बंद है. आवंटित क्षेत्र में से करीब 40 हजार वर्गफीट जमीन को वापस लेकर छह-सात छोटे भूखंड तैयार कर नए उद्योगों को आवंटित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है. अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा का दावा है कि यह कार्रवाई औद्योगिक उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जा रही है.
* सन 1980 से किसान इंडस्ट्रीज का भूखंड खाली रखने का दावा
अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा ने शिकायतकर्ताओं के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसान इंडस्ट्रीज के संचालक ने वर्ष 1980 में भूखंड लेने के बाद उसे लंबे समय तक खाली रखा. उनका कहना है कि संस्था ने जिन लोगों को उद्योग स्थापित करने के लिए जमीन दी है, उनसे उसी उद्देश्य से उसका उपयोग अपेक्षित है. उद्योग के नाम पर अतिरिक्त भूखंड लेकर वर्षों तक उस पर प्रस्तावित विस्तार नहीं करने तथा जमीन का दूसरे कार्यों के लिए इस्तेमाल करने वाले भूखंडधारकों पर भी संस्था ने कार्रवाई शुरू की है.
* कारखाने बंद, जमीन गोदामों के लिए इस्तेमाल करने का आरोप
अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा के अनुसार, कुछ भूखंडधारकों के कारखाने वर्षों से बंद हैं और उन्होंने परिसर अन्य लोगों को किराए पर दे रखा है. आरोप है कि किराएदार वहां उद्योग चलाने के बजाय इन जगहों का इस्तेमाल गोदाम के रूप में कर रहे हैं. संस्था के नियमों के अनुसार औद्योगिक भूखंड का उपयोग उद्योग के लिए ही किया जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि वर्ष 2010-11 में ऐसी औद्योगिक इकाइयों को अस्थायी रूप से किसी अन्य उद्यमी को किराए पर देने की व्यवस्था की गई थी, ताकि बंद पड़ी इकाई को आर्थिक सहारा मिल सके. हालांकि, इसमें शर्त रखी गई थी कि किराएदार द्वारा उसी परिसर में उद्योग संचालित किया जाएगा. अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा का आरोप है कि कुछ भूखंडधारकों ने इस व्यवस्था का गलत फायदा उठाते हुए केवल किराया वसूलना शुरू कर दिया और औद्योगिक गतिविधियां संचालित नहीं कीं.
* आमसभा में प्रस्ताव पारित होने का दावा
अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा के अनुसार, औद्योगिक उपयोग नहीं होने वाले और नियमों के विपरीत इस्तेमाल किए जा रहे भूखंडों का मुद्दा संस्था की आमसभा में कई बार रखा गया. उनका दावा है कि आमसभा की सहमति से ऐसे भूखंड वापस लेकर उन्हें अन्य इच्छुक आवेदकों को देने का निर्णय लिया गया है. उन्होंने कहा कि किसी उद्योग का विभिन्न कारणों से बंद होना असामान्य नहीं है, लेकिन लंबे समय तक उद्योग बंद रखने, जमीन को गैर-औद्योगिक उपयोग में लाने अथवा किराए पर देकर गोदाम के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
* आवासीय उपयोग और अतिक्रमण पर भी आपत्ति
अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा ने सातुर्णा औद्योगिक वसाहत में कुछ अन्य अनियमितताओं का भी उल्लेख किया. उनके अनुसार, औद्योगिक भूखंडों का मूल उपयोग उद्योग के लिए होना चाहिए और प्रत्येक औद्योगिक इकाई में अधिकतम 800 वर्गफुट क्षेत्र ही आवासीय उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा सकता है. आरोप है कि कुछ इकाइयों में दो हजार वर्गफुट से अधिक जगह का इस्तेमाल आवासीय जरूरतों के लिए किया जा रहा है. उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ औद्योगिक इकाइयों के सामने संस्था की खाली जमीन पर अतिक्रमण कर वहां सौंदर्यीकरण के कार्य किए गए हैं. संस्था इन सभी मामलों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में है और इसी वजह से कुछ भूखंडधारकों में नाराजगी है.
* पुराने नक्शे को लेकर भी विवाद
सातुर्णा औद्योगिक वसाहत के अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा ने संस्था के पुराने नक्शे का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने बताया कि अमरावती तत्कालीन सीपी एंड बरार प्रांत का हिस्सा था, उस समय औद्योगिक वसाहत के लिए जमीन आवंटित की गई थी. संस्था के पास उपलब्ध पुराने नक्शे की प्रति हासिल करने के लिए जिलाधिकारी कार्यालय से प्रयास किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिलने पर संस्था ने अपने स्तर पर नक्शा प्राप्त किया. अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान भूखंडधारकों से पांच रुपये प्रति वर्गफुट के हिसाब से राशि लेकर करीब 68 से 70 लाख रुपये का चालान जमा किया गया और औद्योगिक वसाहत का अद्यतन नक्शा तैयार कराया गया.
* शिकायतकर्ताओं पर भी उठाए सवाल
दैनिक अमरावती मंडल से बातचीत में अध्यक्ष विरेंद्र लढ्ढा ने कहा कि शिकायत करने वाले कुछ लोगों के अपने व्यक्तिगत हित और स्वार्थ हो सकते हैं. उनके अनुसार संस्था का उद्देश्य किसी व्यक्ति को परेशान करना नहीं, बल्कि औद्योगिक वसाहत में आवंटित जमीन का निर्धारित उद्देश्य के लिए उपयोग सुनिश्चित करना है. उन्होंने कहा कि जिला उद्योग केंद्र द्वारा यदि संस्था से किसी शिकायत पर स्पष्टीकरण मांगा जाता है तो संचालक मंडल की ओर से सभी दस्तावेज और वास्तविक स्थिति उपलब्ध कराई जाएगी.
* जिला उद्योग केंद्र मांगेगा संस्था से स्पष्टीकरण
इस मामले में जिला उद्योग केंद्र के उपसंचालक निलेश निकम ने बताया कि सातुर्णा औद्योगिक वसाहत के कुछ भूखंडधारकों की ओर से शिकायतें प्राप्त हुई हैं. इन शिकायतों के संबंध में संस्था के संचालक मंडल से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा. स्पष्टीकरण और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच के बाद नियमानुसार आवश्यक कदम उठाए जाएंगे. उपसंचालक निकम ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक वसाहत के प्रत्येक भूखंड का उपयोग निर्धारित औद्योगिक उद्देश्य के लिए ही किया जाना अपेक्षित है. यदि किसी भूखंड का उपयोग इसके विपरीत पाया जाता है तो संबंधितों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है.
फिलहाल भूखंडों के आवंटन और उपयोग को लेकर लगाए गए आरोपों की विभागीय जांच होना बाकी है. शिकायतकर्ताओं के आरोप, संस्था का पक्ष और उपलब्ध अभिलेखों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संबंधित भूखंडों के मामले में नियमों का उल्लंघन हुआ है या संस्था ने अपने अधिकारों के तहत कार्रवाई की है.





