दिवाणी विवाद में जनहित याचिका क्यों?
नागपुर खंडपीठ ने मांगा स्पष्टीकरण

याचिकाकर्ताओं को एक सप्ताह में जवाब देने के निर्देश
नागपुर/दि. 16 – निजी जमीन और अतिक्रमण से जुड़े दिवाणी विवाद में जनहित याचिका दायर करने पर मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाई. न्यायालय ने उनसे इस मामले में जनहित याचिका दायर करने का औचित्य स्पष्ट करने को कहा है. साथ ही, एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं. इस प्रकरण पर गुरुवार को न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई हुई. शालिकराम चापेकर सहित 10 नागरिकों ने यह जनहित याचिका दायर की है.
याचिका में नागपुर के झिंगाबाई टाकली क्षेत्र स्थित खसरा क्रमांक 83/1 और 58/2 की ‘क’ प्रतियों की जांच कराने की मांग की गई है. इसके अलावा, महेश खंगार सहित 13 नागरिकों द्वारा सड़क और पोटखराब जमीन पर किए गए कथित अतिक्रमण को हटाने तथा याचिका लंबित रहने तक संबंधित जमीन पर निर्माण कार्य रोकने की मांग भी की गई है. नागपुर सुधार प्रन्यास (नासुप्र) की ओर से अधिवक्ता गिरीश कुंटे ने याचिका पर आपत्ति जताई. उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं की मांगें कानूनी कसौटी पर टिकने योग्य नहीं हैं. संबंधित जमीन पर बने अनधिकृत लेआउट नियमित किए जा चुके हैं. नासुप्र के पास पोटखराब जमीन से संबंधित कोई अभिलेख नहीं है और ऐसी जमीन के रिकॉर्ड की जांच राजस्व विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है. उन्होंने यह भी बताया कि सिटी सर्वे विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए मापन नक्शे में किसी नाले का उल्लेख नहीं है. इस विवाद के समाधान के लिए याचिकाकर्ताओं के पास दिवाणी न्यायालय में जाने का विकल्प उपलब्ध है.
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट को प्रथमदृष्टया मामला दिवाणी विवाद से संबंधित प्रतीत हुआ. इसी आधार पर खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि इस मामले में जनहित याचिका दाखिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी. न्यायालय ने एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण देने के निर्देश दिए हैं.





