चिखलदरा के देवी पॉइंट पर उमड़ते हैं श्रद्धालु
मेलघाट में आदिवासियों की जीवनदायिनी कुलदेवी

* 35 साल से अटकी 3 एकड़ 8 आर जमीन अंबादेवी संस्थान को मिली
* पर्यटन विकास से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद
चिखलदरा/दि.17- मेलघाट के घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच स्थित चिखलदरा का देवी पॉइंट आदिवासी समाज की गहरी आस्था का केंद्र है. कोरकू, गोंड और गवली समाज की कुलदेवी के रूप में पूजी जाने वाली इस जागृत देवी के मंदिर में नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. इस वर्ष भी नवरात्र के पहले दिन ऊंचे पहाड़ पर भगवा ध्वज फहराकर उत्सव की शुरुआत की गई. करीब 1,061 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस धार्मिक स्थल को लेकर मान्यता है कि यहां की प्राकृतिक गुफा से चंद्रभागा नदी का उद्गम होता है.
मंदिर के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने लगभग 35 वर्षों से लंबित 3 एकड़ 8 आर जमीन अंबादेवी संस्थान को निःशुल्क उपलब्ध कराई है. इससे मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए बेहतर निवास, स्वच्छ प्रसाधनगृह और शुद्ध पेयजल जैसी स्थायी सुविधाएं विकसित करने का रास्ता खुला है. नवरात्र के दौरान बढ़ती भीड़ का प्रबंधन भी अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकेगा. पर्यटन गतिविधियों को गति मिलने से स्थानीय कोरकू, गोंड और गवली समाज के बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
* प्राकृतिक चट्टानों के बीच विराजमान देवी
चिखलदरा के मुख्य गांव से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सीढ़ियों से उतरकर गहरी घाटी में जाना पड़ता है. तीन विशाल प्राकृतिक चट्टानों के नीचे देवी का स्थान है. गर्भगृह में पत्थरों से निर्मित स्वयंभू मूर्ति के साथ देवी की सुसज्जित प्रतिमा भी स्थापित है. हाथों में तलवार और त्रिशूल धारण किए दुर्गा के पास महादेव की पिंडी भी है. यह स्थल अमरावती से लगभग 86 किलोमीटर दूर शक्कर तालाब और मोझरी पॉइंट के आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र में स्थित है. पहाड़ों, जंगलों और चट्टानों से घिरा होने के कारण यहां धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक पर्यटन की भी संभावनाएं हैं.
* महाभारत काल से जुड़ी लोकमान्यता
मंदिर के पुजारी मुकुंद सालफले और माधवराव सालफले के अनुसार, इस स्थान का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है. लोकमान्यता है कि पांडवों के अज्ञातवास के दौरान विराट राजा के राज्य में द्रौपदी पर कीचक ने बुरी नजर डाली थी. इसके बाद भीम ने इसी गहरी घाटी में कीचक का वध किया था. कहा जाता है कि युद्ध के बाद रक्त से सने हाथ धोने के लिए भीम ने गदा से जमीन पर प्रहार किया, जिससे वहां जलकुंड बना. इसे आज भी भीमकुंड के नाम से जाना जाता है. इसी कथा के अनुसार, कीचक के वध से बनी गहरी घाटी को पहले ‘कीचकदरा’ कहा जाता था, जो कालांतर में बदलकर ‘चिखलदरा’ हो गया. मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अपनी रक्षा के लिए यहां भगवती की स्थापना की थी. बाद में यह स्थल मेलघाट के आदिवासी समाज की कुलदेवी का प्रमुख आस्था केंद्र बन गया.
* नवरात्र में विशेष पूजा, दशहरे पर शोभायात्रा
नवरात्र शुरू होते ही मंदिर परिसर भक्तिमय हो जाता है. पहले दिन पहाड़ पर भगवा ध्वज फहराया जाता है और जलाभिषेक के साथ घटस्थापना की जाती है. श्रद्धालु कई किलोमीटर पैदल चलकर देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर में प्रवेश से पहले द्वारकानाथ की पूजा करने की परंपरा भी निभाई जाती है. कोरकू समाज के श्रद्धालु पहले प्रवेश द्वार पर विधिवत पूजा करते हैं और फिर मंदिर में प्रवेश करते हैं. सुबह-शाम घंटानाद के साथ आरती होती है और दिनभर भजन-कीर्तन चलते हैं. पहाड़ से गिरने वाले प्राकृतिक झरने में स्नान कर देवी के दर्शन करना भी यहां की पुरानी परंपराओं में शामिल है. श्रद्धालु देवी को हल्दी, कुमकुम और दीप अर्पित करते हैं. अष्टमी पर देवी को चढ़ाई गई साड़ियों को बेचने के बजाय सम्मानपूर्वक प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है. विजयादशमी के दिन देवी की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है.
* बलिप्रथा बंद, पूजा-अर्चना की व्यवस्था में सुधार
इस मंदिर में पहले मुर्गे और बकरों की बलि देने की परंपरा प्रचलित थी. वर्ष 1991 में तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. सुधाकरराव नाईक ने मंदिर की व्यवस्था अंबादेवी संस्थान को सौंप दी थी. इसके बाद हेमंत डोंगरे, हेमंत लक्ष्मीकांत डोंगरे, डॉ. जयंत पांढरीकर और देविदास हाते सहित अन्य लोगों ने नियमित पूजा-अर्चना और आरती की व्यवस्था को व्यवस्थित करने के प्रयास किए. इसके साथ ही बलिप्रथा को पूरी तरह बंद करने की दिशा में कदम उठाए गए.
* काली चट्टानों से लगातार रिसता पानी, चंद्रभागा का उद्गम
देवी पॉइंट की एक विशेष पहचान यहां की चट्टानों से लगातार रिसने वाला पानी है. भूगर्भीय दृष्टि से यह क्षेत्र डेक्कन ट्रैप के काले बेसाल्ट पत्थरों से बना है. प्रा. डॉ. सावन देशमुख और प्रा. डॉ. शुभांगी देशमुख के अनुसार, इन चट्टानों में मौजूद प्राकृतिक दरारों और जोड़ों से वर्षा का पानी भीतर तक पहुंचकर जमा होता है. नीचे अभेद्य चट्टानी परत मिलने पर पानी रुक जाता है और प्राकृतिक ढलान के कारण चट्टानों की दरारों से बाहर निकलता रहता है. इसी वजह से गर्मी के मौसम में भी यहां पानी का प्रवाह बना रह सकता है. श्रद्धालु इस पानी को पवित्र तीर्थ मानकर बोतलों में भरकर घर ले जाते हैं. यही पानी कुंड में जमा होकर घाटी में गिरता है और स्थानीय मान्यता के अनुसार चंद्रभागा नदी का उद्गम बनता है. चंद्रभागा नदी मोझरी, अचलपुर और दर्यापुर की दिशा से बहते हुए आगे पूर्णा नदी में मिलती है.
* जमीन मिलने से पर्यटन विकास को गति मिलने की उम्मीद
जानकारी के अनुसार, 31 दिसंबर को मंत्रिमंडल ने पर्यटन महामंडल के पास वर्ष 1975 से लंबित 3 एकड़ 8 आर जमीन अंबादेवी संस्थान को निःशुल्क देने का निर्णय लिया. पालकमंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने इस संबंध में दिया गया आश्वासन पूरा किया, जबकि सांसद डॉ. अनिल बोंडे ने जमीन संस्थान को दिलाने के लिए लगातार प्रयास किए. मेलघाट में बाघों की मौजूदगी और वन क्षेत्र की चुनौतियों के बावजूद इस मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. परतवाड़ा से लगभग 35 किलोमीटर की पैदल कांवड़ यात्रा भी पिछले 15 वर्षों से लगातार निकाली जा रही है. अब जमीन उपलब्ध होने के बाद मंदिर परिसर में बुनियादी सुविधाओं के विकास, श्रद्धालुओं के बेहतर प्रबंधन और स्थानीय युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने की उम्मीद बढ़ गई है.





