मां की मौत के बाद पिता ने मांगा बच्ची का ताबा, हाईकोर्ट ने किया इंकार
नाना-नानी के गोद को ही बच्ची के लिए बताया सुरक्षित

नागपुर/ दि.1- परिवार में आए दिन होनेवाले झगडो से परेशान होकर अपनी बच्ची को साथ लेकर अपने मायके में रहनेवाली महिला का 19 जून 2020 को निधन हो गया था और तब से उस महिला की बच्ची अपने नाना-नानी व मामा के साथ ही रह रही थी. जबकि उसके पिता द्बारा उसे अपने पास रखने का आग्रह किया जा रहा था. ऐसे में यह मामला नागपुर हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंचा. जिसकी सुनवाई करते हुए नागपुर हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपी पिता उस बच्ची का प्राकृतिक अभीभावक हैं. परंतु इस बच्ची का हित सबसे उपर हैं. चूंकि उस बच्ची का पूरा बचपन उसके नाना-नानी व मामा के साथ बिता हैं. और वह अपने ननीहाल में सभी से घुली-मिली हैं. जिसके चलते उस बच्ची के लिए उसके नाना-नानी की गोद ही बेहद सुरक्षित हैं.
जानकारी के मुताबिक घाटोल तहसील में रहनेवाले आशीष (काल्पनिक नाम) का विवाह 4 मई 2017 को कल्पना (काल्पनिक नाम) के साथ हुआ था और अगले ही वर्ष उन्हें एक बेटी हुई. कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच आए दिन किसी न किसी बात को लेकर झगडे होने लगे. जिसके चलते कल्पना अपनी बेटी को अपने साथ लेकर अपने मायके में रहने हेतु चली आयी. पश्चात 19 जून 2020 को कल्पना का अकस्मात निधन हो गया. और तब से उसकी बेटी अपने नाना-नानी व मामा की छत्र छाया में रहने लगी. वहीं बच्ची के पिता ने आरोप लगाया है कि उसकी बच्ची को जानबुझकर उससे दूर रखा जा रहा हैं. तथा उसके ससुरालियों द्बारा बच्ची की कस्टडी अपने पास गैर कानूनी तरीके से रखी गई हैं.
इस मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि बच्ची अपनी पदाईश के बाद से जीस वातावरण में पलीबढी और जहां पर उसे अपनापन व स्थैर्य मिला वह उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. मामले की सुनवाई दौरान बच्ची के नाना-नानी व मामा ने अदालत को बताया कि बच्ची के पिता ने लंबे समय तक अपनी बच्ची की ओर कोई ध्यान नहीं दिया. तथा बच्ची की मां की मौत होने के बाद भी करीब तीन वर्ष तक कोई कदम नहीं उठाएं. इसी बीच बच्ची के पालन-पोषण हेतु अदालत द्बारा भत्ता मंजूर किए जाने के बाद बच्ची के पिता द्बारा बच्ची की कस्टडी के लिए याचिका दायर की गई. जिसे ध्यान में रखते हुए अदालत ने भी बच्ची के पिता की नियत पर सवालिया निशान उपस्थित किया और बच्ची की कस्टडी उसके नाना-नानी के पास ही रहने देने का आदेश दिया.
इसके साथ ही बच्ची को उसके पिता से पूरी तरह दूर रखना भी योग्य नहीं हैं. इस बात को ध्यान में रखते हुए अदाजलत ने मानवी दृष्टिकोन भी रखा और पिता को अनुमति दी की वह हर 15 दिन में एक बार अपनी बच्ची से मिल सकता है. पिता-पुत्री की यह भेंट मध्यप्रदेश के सौंसर स्थित विधि सेवा प्राधिकरण के कार्यालय में अधिकारियों की देखरेख के तहत होगी.





