अकाल पर राजनीति नहीं, जवाबदेही चाहिए

सूखा केवल मौसम की मार नहीं होता. खेत में खड़ी फसल सूखने के साथ किसान की उम्मीद, परिवार की अर्थव्यवस्था और गांव की पूरी जीवन-व्यवस्था प्रभावित होती है. ऐसे समय में सरकार की बैठक का केंद्र किसानों की चिंता, पानी की उपलब्धता, फसल नुकसान और राहत के उपाय होने चाहिए. लेकिन नांदेड में सूखे की स्थिति पर बुलाई गई मंत्रिमंडल की बैठक के बाद यदि चर्चा सूखे के निर्णयों से अधिक मंत्रियों के लिए रखे गए बादाम-काजू के अल्पाहार पर होने लगे, तो यह शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करने वाला प्रसंग जरूर बन जाता है.
विपक्ष ने अल्पाहार को लेकर सवाल उठाए. सरकार की ओर से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और पंकजा मुंडे ने इन आरोपों का जवाब दिया और विपक्ष पर भी निशाना साधा. राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है. लेकिन असली सवाल यह है कि इस पूरी बहस में सूखे से प्रभावित किसान कहां है? बैठक में क्या ठोस निर्णय लिए गए? कितने किसानों को राहत मिलेगी? पानी की व्यवस्था कैसे होगी? फसल नुकसान का आकलन कब पूरा होगा? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक बहस के केंद्र में क्यों नहीं हैं?
सरकार और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि सूखे जैसी आपदा को राजनीतिक बयानबाजी का विषय बनाने से जनता की समस्या हल नहीं होती. विपक्ष का काम सवाल पूछना है और सरकार का काम उन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना. यदि विपक्ष का आरोप गलत हैं, तो सरकार आंकड़ों और तथ्यों के साथ उसे खारिज कर सकती है. लेकिन विपक्ष के सवाल का जवाब विपक्ष पर ही पलटवार करके देने से मूल मुद्दा समाप्त नहीं होता. सत्ता में रहते हुए आलोचना सुनना किसी भी सरकार की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है. खासकर तब, जब वही नेता विपक्ष में रहते हुए सरकार से तीखे सवाल पूछ चुके हों. राजनीतिक भूमिका बदलने के साथ जवाबदेही का सिद्धांत नहीं बदल सकता. विपक्ष में रहते हुए सरकार की छोटी से छोटी चूक पर सवाल उठाना और सत्ता में आने के बाद उसी तरह के सवालों को राजनीतिक हमला बताना जनता को सहज नहीं लगेगा.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे राजनीतिक आरोपों से ऊपर उठकर शासन की दिशा तय करें. सूखे की स्थिति में सरकार के सामने कई तात्कालिक चुनौतियां हैं. किसानों को राहत, फसल नुकसान के पंचनामे, पीने के पानी की व्यवस्था, पशुओं के लिए चारा और पानी, रोजगार तथा प्रभावित ग्रामीण परिवारों तक सरकारी सहायता पहुंचाना, इनमें से किसी भी मुद्दे को राजनीतिक शोर में दबने नहीं दिया जाना चाहिए. बादाम-काजू वास्तव में कितना गंभीर मुद्दा है, यह अलग बहस हो सकती है. मंत्रियों के अल्पाहार पर खर्च हुआ पैसा यदि सरकारी नियमों के अनुसार है, तो सरकार को उसका स्पष्ट विवरण देना चाहिए. यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. लेकिन दोनों स्थितियों में समाधान एक ही है, पारदर्शिता. राजनीतिक सफाई की तुलना में खर्च और निर्णय का तथ्य जनता के सामने रखना कहीं अधिक प्रभावी उत्तर है.
दूसरी ओर विपक्ष को भी यह आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वह सूखे जैसे गंभीर प्रश्न को केवल प्रतीकात्मक मुद्दों तक सीमित कर रहा है. बादाम-काजू का मुद्दा उठाना राजनीतिक रूप से आसान है, लेकिन किसानों के लिए वास्तविक राहत की मांग करना और सरकार से उसके क्रियान्वयन की निगरानी करना अधिक महत्वपूर्ण है. जनता को यह भी देखना होगा कि कौन केवल बयान दे रहा है और कौन राहत व्यवस्था पर ठोस सवाल पूछ रहा है. सूखे का संकट किसी एक दल का विषय नहीं है. आज सत्ता में मौजूद दल कल विपक्ष में हो सकता है और आज विपक्ष में बैठा दल कल सत्ता में. लेकिन किसान की समस्या दल नहीं बदलती. पानी की कमी, फसल का नुकसान और कर्ज का दबाव चुनावी चक्र के साथ समाप्त नहीं होते. इसलिए सूखे जैसे प्रश्न पर राजनीतिक दलों के बीच न्यूनतम सहमति और दीर्घकालीन नीति की जरूरत है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को आलोचना से घबराने के बजाय उससे सीखने की राजनीतिक संस्कृति विकसित करनी होगी. गलती हुई है, तो उसे स्वीकार करना कमजोरी नहीं है. प्रशासनिक स्तर पर चूक हुई है, तो उसे सुधारना चाहिए. विपक्ष ने गलत तथ्य पेश किए हैं, तो उन्हें प्रमाणों के साथ सामने रखना चाहिए. लेकिन हर सवाल का जवाब राजनीतिक पलटवार से देने की आदत लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करती है. महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति को लेकर आने वाले दिनों में सरकार को बयानबाजी से अधिक आंकड़े देने होंगे. कितने गांव प्रभावित हैं, कितनी फसल का नुकसान हुआ, कितने किसानों के पंचनामे पूरे हुए, कितनी राहत मंजूर हुई और कितनी वास्तव में किसानों तक पहुंची, इन सवालों का स्पष्ट हिसाब जनता के सामने आना चाहिए. यही किसी भी राहत पैकेज की वास्तविक परीक्षा होगी.
सूखे पर राजनीति न करने की अपील तभी सार्थक होगी, जब सत्ता और विपक्ष दोनों सूखे को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखेंगे. मंत्रियों की थाली में बादाम-काजू हैं या नहीं, यह क्षणिक राजनीतिक मुद्दा हो सकता है, लेकिन किसान की थाली में अन्न रहेगा या नहीं, यह कहीं बड़ा सवाल है. इसलिए बहस का केंद्र अल्पाहार नहीं, किसान होना चाहिए, सफाई नहीं, राहत होनी चाहिए और राजनीतिक लीपापोती नहीं, स्पष्ट जवाबदेही होनी चाहिए.





