मृतक पिता की संपत्ति बेचने पर कोर्ट की रोक

अकोला न्यायालय का बड़ा फैसला, तीसरे पक्ष को हस्तांतरण पर लगाई अंतरिम रोक

* करारनामे की जानकारी से इनकार करने वाले वारिसों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अकोला/दि.15 – मृत व्यक्ति की संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में अकोला के चौथे संयुक्त दीवानी न्यायाधीश (वरिष्ठ स्तर) न्यायालय ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए विवादित संपत्ति की बिक्री तथा किसी भी प्रकार के तृतीय पक्ष अधिकार निर्माण पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी है. न्यायालय के इस फैसले को संपत्ति विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यह मामला मौजा दहिहांडा, तहसील एवं जिला अकोला स्थित सर्वे नंबर 102/5 के प्लॉट नंबर 20(1) से संबंधित है. विशेष दीवानी वाद क्रमांक 19/2026 में वादी गुलनार बानो ने संपत्ति के विक्रय करार के पालन हेतु न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था.
वादिनी की ओर से न्यायालय में प्रस्तुत पक्ष के अनुसार स्वर्गीय आनंदा ज्योतिराम गायकवाड़ ने उक्त संपत्ति बेचने की सहमति दी थी तथा इसके एवज में गुलनार बानो से राशि भी प्राप्त की थी. इस संबंध में 19 जनवरी 2024 तथा 6 जनवरी 2025 को बाकायदा करारनामा निष्पादित किया गया था. वादी ने दावा किया कि वह हमेशा से करार की शर्तों का पालन करने तथा विधिवत रजिस्ट्री कराने के लिए तैयार और इच्छुक रही हैं. मामले ने तब नया मोड़ लिया जब आनंदा गायकवाड़ का निधन हो गया. इसके बाद उनके कानूनी वारिसों ने कथित तौर पर विक्रय विलेख निष्पादित करने से इनकार कर दिया. इतना ही नहीं, संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष को बेचने अथवा हस्तांतरित करने की कोशिशें भी शुरू कर दी गईं.
मामला न्यायालय पहुंचने पर प्रतिवादियों ने करारनामों को ही चुनौती देते हुए दावा किया कि कथित एग्रीमेंट पंजीकृत नहीं हैं. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वादी अपनी तत्परता और इच्छा साबित करने में असफल रही हैं. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने प्रथम दृष्टया वादी के पक्ष में मजबूत मामला माना. कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि संपत्ति का हस्तांतरण कर दिया गया तो वादी को ऐसी क्षति पहुंचेगी जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी.
न्यायालय ने अपने आदेश में विशेष रूप से उल्लेख किया कि 6 जनवरी 2025 के करारनामे पर प्रतिवादी क्रमांक 2 के गवाह के रूप में हस्ताक्षर मौजूद हैं. ऐसे में प्रतिवादियों का यह दावा कि उन्हें करार की कोई जानकारी नहीं थी, प्रथम दृष्टया असत्य प्रतीत होता है. इन्हीं तथ्यों को आधार बनाते हुए न्यायालय ने वादी गुलनार बानो का अंतरिम आवेदन मंजूर करते हुए सभी प्रतिवादियों को विवादित संपत्ति पर किसी भी प्रकार का नया अधिकार निर्माण करने, बिक्री करने अथवा हस्तांतरण करने से अगले आदेश तक प्रतिबंधित कर दिया.
इस महत्वपूर्ण मामले में वादी की ओर से अधिवक्ता रमेशकुमार पिंजोमल रामनानी, एडवोकेट नितिन एस. महल्ले, एडवोकेट नीरज भिकूसींग राजपूत, एडवोकेट हसन पठान तथा एडवोकेट निखिल गोवर्धन रोहड़ा ने पैरवी की.

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