दीपाली चव्हाण के जाने के बावजूद व्यवस्था जस की तस

मार्च 2021 में अमरावती जिले के मेलघाट टाइगर रिजर्व से आई एक खबर ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था. जब हरिसाल की वन परिक्षेत्र अधिकारी दीपाली चव्हाण ने अपने सरकारी आवास में अपनी सर्विस रिवॉल्वर से गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी. यह केवल एक युवा और प्रतिभाशाली अधिकारी की दुखद मृत्यु नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल था, जिसके भीतर काम करते हुए एक साहसी अधिकारी इस हद तक टूट गई कि उसे जीवन समाप्त करने का निर्णय लेना पड़ा. आज पांच वर्ष बाद इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ चुका है. न्यायालय ने संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े आपराधिक आरोपों को निरस्त कर दिया है. कानूनी दृष्टि से मामला एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. लेकिन क्या न्यायालय का फैसला उन सभी प्रश्नों का उत्तर है, जो दीपाली चव्हाण की मृत्यु के बाद खड़े हुए थे. क्या अदालत के निर्णय के साथ व्यवस्था भी स्वयं को निर्दोष घोषित कर सकती है? शायद नहीं.
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के कठोर प्रशासनिक व्यवहार और आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के बीच स्पष्ट और प्रत्यक्ष संबंध सिद्ध होना आवश्यक है. केवल सख्त व्यवहार या प्रशासनिक दबाव को आत्महत्या के लिए उकसाने का कानूनी आधार नहीं माना जा सकता. यह न्यायशास्त्र का स्थापित सिद्धांत है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन किसी आपराधिक आरोप का सिद्ध न होना और किसी व्यवस्था का नैतिक रूप से निर्दोष होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. अदालत का काम कानून की कसौटी पर तथ्यों को परखना है, जबकि प्रशासन का दायित्व कार्यसंस्कृति, मानव व्यवहार और संस्थागत संवेदनशीलता का मूल्यांकन करना होता है. दीपाली चव्हाण प्रकरण में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या एक अधिकारी की आत्महत्या के बाद उस व्यवस्था ने आत्ममंथन किया, जिसमें वह काम कर रही थी?
वनपरिक्षेत्र अधिकारी दीपाली चव्हाण की पहचान केवल एक सरकारी अधिकारी के रूप में नहीं थी. मेलघाट जैसे कठिन और संवेदनशील वन क्षेत्र में उन्होंने अवैध वृक्ष कटाई, वन अतिक्रमण और वन्यजीव अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर अपनी अलग पहचान बनाई थी. तस्करों का पीछा करते हुए मध्य प्रदेश की सीमा तक पहुंचने वाली, जंगलों में जोखिम उठाकर काम करने वाली और कर्तव्य के प्रति समर्पित अधिकारी के रूप में उन्हें जाना जाता था. यही कारण है कि उनकी आत्महत्या ने लोगों को अधिक विचलित किया. सवाल यह नहीं था कि एक अधिकारी ने आत्महत्या क्यों की. सवाल यह था कि इतनी मजबूत और संघर्षशील मानी जाने वाली अधिकारी को आखिर ऐसी स्थिति तक पहुंचने क्यों दिया गया?
उल्लेखनीय है कि, दीपाली की मृत्यु के बाद मेलघाट के वनकर्मियों द्वारा मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र उस समय व्यापक चर्चा का विषय बना था. उस पत्र में जंगलों की आग बुझाने, शिकारी गिरोहों से लड़ने और वन्यजीवों की रक्षा करने वाले कर्मचारियों की पीड़ा सामने आई थी. पत्र का सबसे मार्मिक प्रश्न था कि, यदि समस्या ही वरिष्ठ अधिकारियों से हो, तो शिकायत आखिर किससे की जाए. वन विभाग हो या कोई अन्य सरकारी तंत्र, फील्ड में काम करने वाले अधिकारी और कर्मचारी अनेक प्रकार के दबावों का सामना करते हैं. सीमित संसाधन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, स्थानीय दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप, अपराधियों से टकराव और लगातार बढ़ती प्रशासनिक अपेक्षाएं, इन सबके बीच वे काम करते हैं. ऐसी स्थिति में यदि उन्हें अपने ही वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार को लेकर शिकायत हो, तो उनके पास प्रभावी और भरोसेमंद शिकायत निवारण व्यवस्था होनी चाहिए. लेकिन क्या ऐसी व्यवस्था वास्तव में मौजूद है. दीपाली प्रकरण ने इसी सवाल को सामने ला खड़ा किया था.
दीपाली चव्हाण मामले में जांच हुई. समितियां बनीं. रिपोर्ट तैयार हुईं. गिरफ्तारियां हुईं. निलंबन हुए. न्यायालयों में सुनवाई चली. अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय भी दे दिया. लेकिन क्या इन सबके बाद वन विभाग की कार्यसंस्कृति में कोई मूलभूत बदलाव आया. क्या अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली विकसित की गई. क्या वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार और नेतृत्व शैली को लेकर कोई स्पष्ट आचार संहिता बनाई गई. क्या दुर्गम क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकारियों के लिए परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था खड़ी हुई. यदि इन प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं, तो यह मानना कठिन होगा कि व्यवस्था ने इस घटना से कोई गंभीर सीख ली है.
किसी भी सरकारी तंत्र में अनुशासन आवश्यक है. वरिष्ठ अधिकारी को कार्य की समीक्षा करने, कमियों की ओर ध्यान दिलाने और आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार होता है. लेकिन प्रशासनिक अनुशासन और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन भी उतना ही आवश्यक है. एक अधिकारी केवल कर्मचारी नहीं होता. वह भी भावनाओं, दबावों और मानसिक सीमाओं वाला इंसान होता है. कठोरता और क्रूरता के बीच, अनुशासन और अपमान के बीच तथा नेतृत्व और दमन के बीच एक महीन रेखा होती है. उस रेखा को पहचानना किसी भी संस्थान की परिपक्वता का प्रमाण होता है. दीपाली चव्हाण प्रकरण ने इसी संवेदनशील प्रश्न को समाज और प्रशासन के सामने रखा था.
आज न्यायालय का फैसला आ चुका है. कानूनी प्रक्रिया अपने निष्कर्ष तक पहुंच गई है. लेकिन दीपाली चव्हाण की मृत्यु केवल एक न्यायिक मामला नहीं थी. वह एक सामाजिक और प्रशासनिक चेतावनी भी थी. यदि किसी व्यवस्था में काम करने वाले अधिकारी स्वयं को अकेला, असुरक्षित और असहाय महसूस करते हैं, तो केवल कानूनी निर्णय उस समस्या का समाधान नहीं कर सकते. संस्थागत सुधार, संवाद की संस्कृति, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र ही ऐसे मामलों से वास्तविक सबक सीखने का रास्ता हैं. दीपाली चव्हाण को वापस नहीं लाया जा सकता. उनकी मृत्यु के पीछे के हर प्रश्न का उत्तर भी शायद कभी नहीं मिल पाएगा. लेकिन यदि उनकी मृत्यु के बाद भी व्यवस्था ने स्वयं को बदलने का प्रयास नहीं किया, तो यह केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रहेगी, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की सामूहिक विफलता मानी जाएगी. पांच वर्ष पहले एक युवा अधिकारी चली गई थी. आज फैसला आ गया है. लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न अब भी वही है, क्या दीपाली चव्हाण की मौत के बाद व्यवस्था सचमुच बदली है, या केवल फाइलें बंद हुई हैं. इस सवाल का जवाब हमारी प्रशासनिक व्यवस्था को जरूर खोजना होगा. अन्यथा आगे चलकर ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति होने की आशंका हमेशा बनी रहेगी.