सूखे की मार और उम्मीद की सरकार

पश्चिम विदर्भ इस समय केवल मौसम की प्रतिकूलता से नहीं, बल्कि उम्मीद और अनिश्चितता के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. अमरावती, वाशिम, अकोला, बुलढाणा और यवतमाल के खेतों में खड़ी सोयाबीन, कपास और तुअर की फसलें इस वर्ष किसान के परिश्रम और प्रकृति की बेरुखी के बीच फंसी दिखाई दे रही हैं. बारिश के लंबे खंड ने खेतों की नमी छीन ली है. कहीं पौधे खड़े हैं, लेकिन उनमें दाना नहीं है, कहीं कपास की बढ़वार रुक गई है, तो कहीं किसान को यह समझ नहीं आ रहा कि वह नुकसान का आकलन करे या अगली फसल की चिंता. ऐसे समय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का स्वयं खेतों की मेड़ तक पहुंचना, किसानों से सीधे संवाद करना और हालात का प्रत्यक्ष जायजा लेना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य कदम है. लोकतंत्र में यह महत्वपूर्ण है कि सत्ता संकट के समय लोगों के बीच दिखाई दे. लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि खेतों की मेड़ पर पहुंची संवेदना मंत्रालय की फाइलों से निकलकर किसानों के जीवन तक कितनी जल्दी पहुंचती है.
वाशिम जिले के म्हसला गांव में किसानों द्वारा मुख्यमंत्री फडणवीस का काफिला रोकना किसी राजनीतिक प्रदर्शन का दृश्य मात्र नहीं था. वह उस पीड़ा का सार्वजनिक विस्फोट था जो लंबे समय से किसानों के भीतर जमा हो रही थी. जब किसान सड़क पर उतरकर संपूर्ण क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग करता है, तब वह केवल राहत पैकेज नहीं मांग रहा होता. वह यह चाहता है कि शासन उसके संकट को उसी गंभीरता से स्वीकार करे, जिस गंभीरता से वह स्वयं उसे झेल रहा है. मुख्यमंत्री फडणवीस ने दौरे के दौरान सूखा संहिता के ट्रिगर-1 के तहत तत्काल सहायता का आदेश जारी करने, केंद्र की मदद का इंतजार किए बिना राज्य स्तर पर राहत उपलब्ध कराने, दिवाली से पहले सहायता पहुंचाने, चारा-पानी की व्यवस्था करने, रबी फसल के लिए सहयोग देने तथा जलसंधारण कार्यों को गति देने जैसी महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं. इन घोषणाओं का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि किसान के लिए समय सबसे बड़ा कारक होता है. राहत यदि समय पर पहुंची तो वह संबल बनती है, लेकिन देर से पहुंची तो उसका प्रभाव काफी कम हो जाता है.
दरअसल, सूखा केवल फसल का नुकसान नहीं होता. उसके साथ किसान के पूरे आर्थिक चक्र पर संकट आता है. बैंक का कर्ज, बच्चों की पढ़ाई, घरेलू खर्च, बीज और खाद की अगली व्यवस्था, पशुओं के चारे की चिंता और बाजार में गिरती क्रयशक्ति-ये सभी समस्याएं एक साथ किसान के सामने खड़ी हो जाती हैं. इसलिए राहत का अर्थ केवल मुआवजा नहीं है; राहत का अर्थ किसान को फिर से खड़ा होने की क्षमता देना है. यहीं से प्रशासन की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है. मुख्यमंत्री फडणवीस खेतों तक पहुंचे, यह सकारात्मक संकेत है. जनप्रतिनिधि भी दौरे कर रहे हैं. लेकिन क्या प्रशासनिक तंत्र भी उसी संवेदनशीलता के साथ खेतों तक पहुंचेगा? क्या अधिकारी केवल रिपोर्ट मांगेंगे या वास्तविक स्थिति देखने के लिए गांव-गांव और खेत-खेत जाएंगे? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर आने वाले दिनों में तय करेगा कि सरकार की मंशा कितनी प्रभावी कार्रवाई में बदलती है.
आज किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उपग्रह आधारित आंकड़े और खेत की वास्तविक स्थिति में अक्सर अंतर दिखाई देता है. ऊपर से हरी दिखने वाली फसल भीतर से खाली हो सकती है. पौधा जीवित हो सकता है, लेकिन उत्पादन की संभावना समाप्त हो चुकी होती है. ऐसे में यदि केवल तकनीकी आंकड़ों के आधार पर नुकसान का आकलन किया गया, तो अनेक वास्तविक पीड़ित किसान राहत से वंचित रह सकते हैं. इसलिए आवश्यक है कि पंचनामे केवल औपचारिकता न बनें, बल्कि वास्तविकता का दस्तावेज बनें.
यह भी समझना होगा कि पश्चिम विदर्भ का संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है. खरीफ फसल का नुकसान तो सामने है ही, लेकिन रबी सीजन को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं. जलाशयों में अपेक्षित जलसंचय नहीं हुआ. भूजल स्तर पर दबाव बढ़ सकता है. पशुओं के लिए चारे की समस्या उत्पन्न हो सकती है. कई गांवों में पेयजल संकट की आशंका भी व्यक्त की जा रही है. यदि अभी से नियोजन नहीं किया गया, तो आने वाले महीनों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है. इसलिए सरकार की रणनीति केवल राहत वितरण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. जलसंधारण, तालाबों की मरम्मत, गाद निकासी, लघु सिंचाई परियोजनाओं का पुनरुद्धार, रोजगारोन्मुख कार्यों का विस्तार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाली योजनाओं को समानांतर रूप से आगे बढ़ाना होगा. सूखे से लड़ाई केवल मुआवजे से नहीं जीती जाती, वह भविष्य के लिए तैयार किए गए ढांचे से जीती जाती है.
इस पूरे घटनाक्रम का एक मानवीय पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दुष्काल केवल जमीन को नहीं सुखाता, वह मनुष्य के मन में भी सूखा छोड़ जाता है. बार-बार की प्राकृतिक मार किसान के आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है. ऐसे समय शासन की उपस्थिति और संवेदनशीलता का विशेष महत्व होता है. मुख्यमंत्री का खेतों तक जाना इसी संवेदनशीलता का प्रतीक है. लेकिन किसान को केवल यह जानकर संतोष नहीं होगा कि उसकी बात सुनी गई. वह यह देखना चाहता है कि उसकी बात पर कार्रवाई भी हुई या नहीं. पश्चिम विदर्भ का किसान आज सरकार से असंभव की मांग नहीं कर रहा. वह केवल समय पर सहायता, निष्पक्ष आकलन, फसल बीमा दावों का त्वरित निपटारा, कर्ज उपलब्धता और भविष्य के लिए ठोस योजना चाहता है. उसकी अपेक्षा यह है कि मंत्रालय और खेत के बीच की दूरी केवल भौगोलिक न रहे, प्रशासनिक भी कम हो.
आज आवश्यकता इस बात की है कि मुख्यमंत्री के दौरे को एक घटना बनाकर न छोड़ दिया जाए. उसे एक प्रक्रिया की शुरुआत बनाया जाए. यदि खेतों की मेड़ पर देखी गई वास्तविकता मंत्रालय के निर्णयों में दिखाई दी, यदि अधिकारियों ने भी गांवों तक पहुंचकर समस्याओं को समझा, यदि राहत समय पर पहुंची और रबी सीजन के लिए ठोस तैयारी हुई, तो यह दौरा पश्चिम विदर्भ के किसानों के लिए उम्मीद का मोड़ साबित होगा. लेकिन यदि आश्वासन फाइलों में उलझ गए, पंचनामे लंबित रहे और सहायता देर से पहुंची, तो किसानों का विश्वास और कमजोर होगा. इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है, खेतों की मेड़ से मंत्रालय तक राहत की दूरी कितनी है? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि सरकार उस दूरी को कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से पाट पाती है.
पश्चिम विदर्भ के खेत इस समय उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं. किसान की निगाह अब बादलों पर कम और सरकार की कार्रवाई पर अधिक है. क्योंकि सूखे की मार झेल रहे इस अंचल को केवल संवेदना नहीं, समय पर पहुंची राहत और भरोसेमंद व्यवस्था की आवश्यकता है. यही इस संकट की सबसे बड़ी मांग है और यही सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा भी.





