भाषाएं दीवारें नहीं, पुल होती हैं

हाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किए जाने के निर्णय ने पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है. परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक द्वारा मराठी सीखने के लिए निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बाद परिवहन विभाग ने कार्रवाई शुरू की तो यह मुद्दा केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भाषा, पहचान, रोजगार और क्षेत्रीय संवेदनाओं से जुड़ा एक व्यापक विमर्श बन गया.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा हस्तक्षेप कर मराठी सीखने के लिए एक वर्ष की अतिरिक्त मोहलत दिए जाने से तत्काल विवाद भले ही कुछ शांत हुआ हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं. इनमें सबसे प्रमुख प्रश्न यह है कि क्या किसी राज्य की राजभाषा का ज्ञान स्थानीय सेवा प्रदाताओं के लिए अनिवार्य होना चाहिए? और यदि हां, तो उसकी सीमा और तरीका क्या होना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं के बजाय व्यावहारिकता और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर तलाशना होगा.
महाराष्ट्र में रहने, काम करने और प्रतिदिन सैकड़ों यात्रियों से संवाद करने वाले ऑटो और टैक्सी चालकों से मराठी का सामान्य ज्ञान अपेक्षित होना कोई असंगत मांग नहीं है. मराठी महाराष्ट्र की राजभाषा है और राज्य की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार भी. यदि कोई यात्री अपनी मातृभाषा में चालक से बात करता है, तो उसे समझने और यथासंभव उसी भाषा में उत्तर देने की क्षमता सेवा की गुणवत्ता को बेहतर ही बनाएगी. स्थानीय भाषा का ज्ञान न केवल संवाद को सहज बनाता है, बल्कि समाज में आत्मीयता और स्वीकार्यता भी बढ़ाता है.
भारत के अनेक राज्यों में स्थानीय भाषा का ज्ञान रोजगार और सेवा क्षेत्र की एक स्वाभाविक आवश्यकता माना जाता है. दक्षिण भारत के कई राज्यों में भी स्थानीय भाषा के बिना सार्वजनिक सेवा क्षेत्र में काम करना कठिन माना जाता है. ऐसे में महाराष्ट्र में मराठी के प्रति आग्रह को असामान्य नहीं कहा जा सकता. लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब भाषा सीखने के प्रश्न को केवल दंड और दमन से जोड़ दिया जाता है. भाषा कोई लाइसेंस नहीं है, जिसे आदेश जारी होते ही प्राप्त कर लिया जाए. भाषा सीखना एक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जिसमें समय, प्रशिक्षण और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है. सरकार ने मराठी प्रशिक्षण वर्ग शुरू किए, यह स्वागतयोग्य कदम है. किंतु यह भी देखना होगा कि जिन लोगों को यह भाषा सीखनी है, वे दिनभर की मेहनत-मजदूरी के बाद प्रशिक्षण लेने के लिए कितना समय निकाल पाते हैं. प्रशिक्षण की गुणवत्ता, उसकी उपलब्धता और सीखने की व्यावहारिक सुविधा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
दूसरी ओर, कुछ ऑटो और टैक्सी चालकों की यह घोषणा कि हम मराठी सीखेंगे ही नहीं, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती. महाराष्ट्र ने हमेशा देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले लोगों का स्वागत किया है. मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक और अन्य शहरों की आर्थिक प्रगति में विभिन्न भाषाई समुदायों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. लेकिन जिस राज्य में रहकर रोजगार प्राप्त किया जाता है, वहां की भाषा और संस्कृति का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है. मराठी सीखना किसी की मातृभाषा या सांस्कृतिक पहचान को त्यागना नहीं है. हिंदीभाषी व्यक्ति मराठी सीखता है, तो वह हिंदी से दूर नहीं होता, बल्कि अपने सामाजिक दायरे का विस्तार करता है. इसी प्रकार मराठी जानने वाला व्यक्ति हिंदी या अंग्रेजी सीखता है तो उसकी पहचान कम नहीं होती, बल्कि संवाद की क्षमता बढ़ती है. इसलिए भाषा को प्रतिस्पर्धा या संघर्ष का विषय बनाने के बजाय संवाद और समावेशन का माध्यम बनाया जाना चाहिए.
हालांकि इस विवाद का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. परिवहन विभाग की जिम्मेदारी केवल मराठी सिखाने तक सीमित नहीं है. राज्य के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (आरटीओ) में नागरिकों को आज भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. दलालों का प्रभाव, फाइलों की अनावश्यक देरी, लाइसेंस और वाहन पंजीकरण की जटिल प्रक्रियाएं, फिटनेस प्रमाणपत्रों में पारदर्शिता की कमी और नागरिकों की शिकायतों के निस्तारण में सुस्ती जैसे कई मुद्दे वर्षों से बने हुए हैं. डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बावजूद आम नागरिक को कई बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. यदि परिवहन विभाग भाषा नीति को लेकर इतनी सक्रियता दिखा सकता है, तो उसे आरटीओ व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, भ्रष्टाचारमुक्त और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए भी उतनी ही प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए. सड़क सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन की गुणवत्ता, नियमों का प्रभावी पालन और यातायात व्यवस्था जैसे विषय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.
सरकार के सामने चुनौती केवल मराठी को बढ़ावा देने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि इस प्रक्रिया में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अनावश्यक कटुता पैदा न हो. भाषा पहचान का विषय है, लेकिन वह विभाजन का आधार नहीं बननी चाहिए. मराठी का सम्मान बढ़े, यह आवश्यक है; लेकिन उसके नाम पर हिंदीभाषियों या अन्य भाषाई समुदायों के प्रति वैमनस्य पैदा हो, यह किसी के हित में नहीं होगा. इसी प्रकार हिंदीभाषी या अन्य राज्यों से आए लोगों को भी यह समझना होगा कि स्थानीय भाषा के प्रति सम्मान दिखाना किसी प्रकार की मजबूरी नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का आधार है.
अंततः समाधान टकराव में नहीं, संवाद में है. सरकार को अनिवार्यता से अधिक सक्षमता पर जोर देना चाहिए और भाषा सीखने के लिए बेहतर प्रशिक्षण, पर्याप्त समय और सकारात्मक वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए. वहीं ऑटो और टैक्सी चालकों को भी विरोध और अड़ियल रवैये के बजाय सहयोग की भावना अपनानी चाहिए. भाषाएं दीवारें नहीं, पुल होती हैं. यदि यह विवाद मराठी और हिंदीभाषियों के बीच दूरी बढ़ाने के बजाय परस्पर सम्मान और संवाद का अवसर बन सके, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी.

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