अमरावती सीट पर विधान परिषद चुनाव में

तटस्थ रहने के मूड में नहीं कांग्रेसी मतदाता

* पार्टी में जबर्दस्त भीतराघात व अंतर्कलह वाली स्थिति
* वोटिंग से मुंह मोडने को तैयार नहीं कांग्रेस के पार्षद
* कांग्रेस गुट नेता भी व्हिप जारी करने के लिए नहीं तैयार
* समय पडने पर नेतृत्व के निर्देर्शों व पार्टी व्हिप के उल्लंघन की भी तैयारी
अमरावती/दि.17 – कल गुरूवार 18 जून को विधान परिषद की सीट हेतु अमरावती के स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र में मतदान कराया जाना है. जिसमें अब महज कुछ ही घंटों का समय शेष है. लेकिन इसके बावजूद इस चुनाव को लेकर कांग्रेस के स्थानीय नेता द्बिधा मनस्थिति और संभ्रम का शिकार दिखाई दे रहे हैं. क्योंकि मतपत्रिका पर नाम रहने के बावजूद चुनावी मैदान में कांग्रेस का प्रत्याशी ही नहीं हैं. ऐसे में कांग्रेस के सामने अब दो ही पर्याय है कि या तो चुनावी मैदान में रहनेवाले वंचित बहुजन आघाडी के प्रत्याशी डॉ. नीलेश विश्वकर्मा की दावेदारी का समर्थन किया जाए, या फिर कांग्रेस पार्षदों को वोट डालने से मना करते हुए तटस्थ रहने हेतु कहा जाए. लेकिन दोनों ही स्थिति में पार्टी के पार्षदों द्बारा अपने नेताओं की ओर से जारी किए जानेवाले निर्देशों का कहां तक पालन किया जाता है, यह देखना अपने आप में काफी दिलचस्प होगा.
विशेष उल्लेखनीय है कि पिछली बार स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से हुए विधान परिषद के चुनाव के समय कांग्रेस पार्टी के पास अपने खुद के 117 वोट थे. जिसमें से कांग्रेस प्रत्याशी को मात्र 17 वोट ही मिले थे. वहीं इस बार कांग्रेस प्रत्याशी ने नामांकन प्रक्रिया के तुरंत बाद ही मैदान छोड दिया है. जिसके चलते कांग्रेस पार्टी के वोट इस बार भी प्रतिस्पर्धी प्रत्याशी के पाले में पडने की पूरी संभावना है. जिसके चलते पहले ही शर्मनाक स्थिति का सामना कर रहे कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के लिए और भी अधिक शर्मनाक स्थिति बन जायेगी. संभवत: इसी बात को ध्यान में रखते हुए कांगे्रस पार्टी के स्थानीय नेताओं द्बारा अपने मतदाताओं को तटस्थ रहने के बारे में निर्देश देने पर विचार किया जा रहा है. लेकिन यदि ऐसा कोई निर्देश जारी होता भी है, तो क्या कांग्रेस के मतदाता सदस्य वाकई वोट डालने हेतु नहीं जायेंगे और क्या वे वाकई तटस्थ बने रहेंगे, यह अपने आप में सबसे बडा सवाल है.
यहा यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि स्थानीय स्वायत्त निकाय निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद के चुनाव हेतु ‘अंदरबट्टे’ में जमकर ‘मखाने’ बांटे जाते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है और विधान परिषद चुनाव की ‘बहती गंगा’ में हर कोई अपनी पार्टी के विचारों, सिध्दांतों व निर्देशों के परे रखते हुए जमकर हाथ धोता है, यह भी अपने आप में एक ‘ओपन सीक्रेट’ हैं. ऐसी जानकारी लगभग हर किसी को होती है. ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि जिन लोगों ने चुनावी मैदान में शुरू से ही ताल ठोककर खडे दमदार प्रत्याशी से ‘मखाने’ लिए है. यदि ये लोग तटस्थ रहने के नाम पर वोट डालने भी नहीं जाते हैं, तो उन ‘मखानों’ के हिसाब किताब का क्या होगा. जाहीर है कि उस स्थिति में संबंधित प्रत्याशी द्बारा ऐसे लोगों से अपने ‘मखानो’ की वसूली की जायेगी. जो ऐसे लोगों के लिए महंगा सौदा साबित होगा. इसके साथ ही यदि वह प्रत्याशी चुनाव में जीतकर विधायक निर्वाचित हो जाता है तो आगे चलकर उस विधायक से अपने क्षेत्र के लिए विकास कामों हेतु निधि हासिल करना भी मुश्किल काम साबित होगा. यानी ‘मखानो’ के लिहाज से यह दोहरा नुकसान हो सकता है. ऐसे ही तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस के पार्षद व नगरसेवक चुनाव में तटस्थ रहने के खिलाफ है.
सूत्रों के मुताबिक बीती शाम स्थानीय कांग्रेस भवन में हुई नगर परिषदों और नगर पंचायतों के कांग्रेस गट नेताओं की बैठक में यह मुद्दा चर्चा हेतु उठाया गया था. जिसके बाद कांग्रेस के कइ्र गट नेताओं ने आपसी चर्चा के दौरान यह कहा कि वे विधान परिषद के चुनाव में किसी अन्य प्रत्याशी के समर्थन में वोटिंग करने या फिर वोट न डालते हुए तटस्थ रहने को लेकर नगरसेवकों के नाम कोई व्हिप जारी करने के पक्ष में नहीं है. क्योंकि पार्टी पार्षदों द्बारा ऐसेे किसी व्हिप का अव्वल तो पालन नहीं किया जायेगा. साथ ही व्हिप का उल्लंघन होने की स्थिति में संबंधित सदस्यों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की जा सकेगी. जिसके चलते व्हिप जारी करने का कोई औचित्य भी नहीं है.
सूत्रों ने यह भी बताया कि बीती शाम और आज सुबह हुई गट नेताओं व पार्षदों की बैठक के बाद कई गटनेताओं व पार्षदों का यहां तक कहना रहा कि पार्टी के बडे नेताओं एवं वरिष्ठ पदाधिकारियों ने विधान परिषद के चुनाव में पहले तो अपनी ओर से विरोधियों के साथ मिलकर अपनी पूरी ‘सेटिंग’ कर ली है और अब सदस्यों के नाम पर प्रतिस्पर्धी प्रत्याशी से पैसे लेकर बिक जाने का आरोप लगाया जा रहा है. जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार अथवा बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. यदि पार्टी नेतृत्व एवं वरिष्ठ पदाधिकारियों द्बारा शुरू से ही इस चुनाव को गंभीरतापूर्वक लिया जाता और स्थानीय स्तर के किसी कट्टर व समर्पित कांग्रेसी को पार्टी का प्रत्याशी बनाया जाता, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती और कांग्रेसी जनप्रतिनिधिों द्बारा पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में वोट डाले जाते. लेकिन अब चूकि चुनावी मैदान में पार्टी प्रत्याशी ही नहीं है, तो पार्टी नेताओं द्बारा अपनी चमडी बचाने हेतु मतदाता सदस्यों पर चुनाव में तटस्थ रहने का दबाव नहीं डाला जाना चाहिए. बल्कि सदस्यों को अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए.

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