अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक में कथित घोटाले की होगी प्राथमिक जांच

नागपुर खंडपीठ का बड़ा आदेश, पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा को जांच कर एफआईआर पर निर्णय लेने के निर्देश

अमरावती/दि.7 – अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक (एडीसीसी बैंक) में कथित आर्थिक अनियमितताओं, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के आरोपों को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है. न्यायालय ने अमरावती के सिटी कोतवाली पुलिस थाने और आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) को मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत प्राथमिक जांच (प्रिलिमिनरी इंक्वायरी) पूरी कर नियमानुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं. न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोड़े की खंडपीठ ने यह आदेश रवींद्र विठ्ठलराव गायगोले एवं अन्य तथा यशवंत रूपरावजी मांगरोले एवं अन्य द्वारा दायर फौजदारी रिट याचिकाओं पर सुनवाई के बाद पारित किया.
* बैंक के निदेशकों ने ही लगाए गंभीर आरोप
याचिकाकर्ता स्वयं अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के निर्वाचित संचालक हैं. उन्होंने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि बैंक के कुछ निदेशकों, एक पूर्व मंत्री एवं पूर्व विधायक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) तथा प्रशासनिक अधिकारियों ने आपसी मिलीभगत से बैंक में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं कीं. शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संबंधित पदाधिकारियों ने फर्जी प्रस्ताव पारित किए, बैंक के अभिलेखों में हेरफेर की, नियमों को दरकिनार कर रिश्तेदारों एवं चहेतों को कर्ज और आर्थिक लाभ पहुंचाए तथा सार्वजनिक निधि का दुरुपयोग कर बैंक और उसके निवेशकों को नुकसान पहुंचाया.
* अक्टूबर 2025 में दी गई थी शिकायत
याचिकाकर्ताओं ने 19 अक्टूबर 2025 को सिटी कोतवाली पुलिस थाने में विस्तृत लिखित शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में कथित वित्तीय गड़बड़ियों के कई उदाहरण और दस्तावेजी आधार भी प्रस्तुत किए गए थे. हालांकि पुलिस द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं किए जाने पर उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने प्रारंभिक स्तर पर जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन बाद में जांच रोक दी गई.
* उपनिबंधक के पत्र से रुकी थी जांच
मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया. अमरावती के जिला उपनिबंधक, सहकारी संस्थाओं ने पुलिस को पत्र भेजकर कहा था कि उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए एक आदेश के कारण इस मामले में जांच करना उचित नहीं होगा. इसके बाद पुलिस ने आगे की कार्रवाई रोक दी थी. न्यायालय ने पाया कि जिला उपनिबंधक ने उच्च न्यायालय के पूर्व आदेश की गलत व्याख्या की थी. संबंधित आदेश महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम, 1960 की धारा 79(3) से जुड़ा था, जो संस्थाओं द्वारा वार्षिक विवरण एवं अभिलेख प्रस्तुत करने की प्रक्रिया से संबंधित है. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वर्तमान शिकायत का विषय वित्तीय अनियमितताओं, धन के दुरुपयोग और कथित आपराधिक कृत्यों से जुड़ा है, जिसका धारा 79(3) से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है. ऐसे में पुलिस जांच रोकने का निर्देश देना उचित नहीं था.
* ‘ललिता कुमारी’ फैसले का हवाला
न्यायालय ने अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ मामले का उल्लेख किया. इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी शिकायत से तुरंत संज्ञेय अपराध स्पष्ट नहीं होता है, तो पुलिस प्राथमिक जांच कर सकती है, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि मामला संज्ञेय अपराध का बनता है या नहीं. नागपुर खंडपीठ ने कहा कि वर्तमान मामला वित्तीय अनियमितताओं और सार्वजनिक धन के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है, इसलिए प्रथम दृष्टया तथ्यों की जांच आवश्यक है. जांच के बाद यदि संज्ञेय अपराध के पर्याप्त आधार मिलते हैं, तो एफआईआर दर्ज करने पर निर्णय लिया जाना चाहिए.
* न्यायालय ने क्या दिए निर्देश?
खंडपीठ ने दोनों याचिकाएं मंजूर करते हुए सिटी कोतवाली पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा को निर्देश दिया है कि शिकायत के आधार पर प्राथमिक जांच पूरी की जाए. जांच में सामने आए तथ्यों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जाए. यदि प्रथम दृष्टया अपराध सिद्ध होता है तो एफआईआर दर्ज करने सहित कानूनन आवश्यक कार्रवाई की जाए. जांच केवल पूर्व में जारी किए गए प्रशासनिक पत्रों के आधार पर रोकी नहीं जा सकती.
* बैंक प्रबंधन पर बढ़ सकता है दबाव
उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के कथित वित्तीय व्यवहार एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं. यदि प्राथमिक जांच में शिकायतों की पुष्टि होती है, तो बैंक के कुछ वर्तमान एवं पूर्व पदाधिकारियों, अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज होने की संभावना बढ़ सकती है. राजनीतिक और सहकारी क्षेत्र में भी इस मामले को गंभीरता से देखा जा रहा है, क्योंकि शिकायत में एक पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक तथा बैंक के वरिष्ठ पदाधिकारियों का नाम सामने आया है. ऐसे में आगामी दिनों में आर्थिक अपराध शाखा की जांच और उसके निष्कर्षों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी.

 

Back to top button