सीजन में खो गया गावरानी आम

केसर, हापूस, नीलम, बदाम, लंगडा की डिमांड

चांदुर बाजार /दि.16– गर्मीयों के इस पुरजोर सीजन में आम की डिमांड रहती है. केसर, हापूस, नीलम, बदाम, लंगडा, लाल पट्टा आदि प्रजाति के आम जिले के सभी गांव-देहातों में बडी मात्रा में बिक रहे हैं. चाव से खाएं जा रहे हैं. ऐसे में पहले विदर्भ के ग्रामीण भागों में काफी मात्रा में मिलनेवाला गावरानी आम कहीं खो गया है. ऐसा इसलिए लग रहा है कि, कहीं भी इन दिनों गावरानी आम नहीं मिलते.
चांदुर बाजार तहसील में पहले काफी अमराई थी. इन अमराई में प्राकृतिक रुप से बढनेवाले गावरानी आम की विशेष पहचान थी. गांवों के किसान गर्मियों में यह आम नगरों में बेचने लाते थे. चांदुर बाजार के मार्केट में रोज आमों के लिए कतारे लगती थी. उसका आकार, रंग और स्वाद के अनुरुप उनके नाम दिए जाते थे.
माधान में पटेल की अमराई, सोनारी में मलगा की अमराई, चांदुर बाजार में काबरा सेठ की अमराई उस समय बडी प्रसिद्ध थी. इन अमराई का आम सुगंध और मिठास के कारण सभी पसंद करते थे. लोग इन आमों की डिमांड करते थे. साखरे आम, लड्डू आम, आखाडी आम के नाम से यह मेहमान नवाजी के लिए ले जाए जाते. गांवों में आए अतिथियों का आदर-सत्कार आमरस अथवा आम की फाक देकर होता था. उसका भी अपना मान माना जाता था.
गावरानी आमों की कैरियों से अचार का भी प्रचलन रहा. गर्मियां बीतते-बीतते गांव की महिलाएं अचार के लिए कैरियां लेती. उसकी भी बडी तैयारी होती थी. बदलते दौर में खेती किसानी भी बदल गई है. ऐसे में पारंपरिक अमराई नष्ट होती जा रही है. इसके कारण गावरानी आम का उत्पादन भी सीमित हो गया है. अब रेडिमेड अचार अधिक उपयोग में लाया जा रहा. उसी प्रकार अचार खाने न खाने को लेकर नाहक चल रही चर्चा की वजह से भी घर-घर में आम का अचार बनाने की प्रथा बंद हो चली है. इसके कारण गावरानी आम मार्केट कम दिखाई दे रहे हैं.

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