प.पू. प्रीति सुधा जी का देवलोक गमन, अंबानगरी भी द्रवित
प्रफुल्ल सावला सहित अनेक ने बताई मधुर, दिव्य स्मृतियां

* समाज को विनम्रता, परोपकार की सीख दी
अमरावती/दि.2- जैन धर्म की महान साध्वी परम पूज्य प्रीति सुधा जी का आज तडके पुणे में देवलोक गमन हो जाने से अंबा नगरी में भी जैन समाज के अनुयायी द्रवित हो गये. प्रीति सुधा जी के दशकों पहले अंबानगरी आगमन और यहां व्याख्यानमाला की मधुर स्मृतियों के साथ आपकी सीख को स्मरण किया. मन ही मन अंबानगरी के हजारों जैन धर्मावलंबियों ने परम पूज्य साध्वी जी के परलोक गमन पर अत्यंत दु:ख व्यक्त किया.
उल्लेखनीय है कि संस्कार भारती और वाणीभूषण के नाम से जानी जाती महाराजसा प्रीति सुधा जी का आज तडके पुणे के वर्धमान प्रतिष्ठान में संथारा सहित देवलोक गमन हुआ. प्रात: 7 से 9 बजे तक महासमाधि दर्शन हेतु समस्त पुणे उमडा था. प्रात: 9 बजे दिवंगत दिवात्मा की डोली लोणीकंद हेतु प्रस्थान किया. लोणीकंद के क्षेत्रपाल प्रतिष्ठान में दोपहर 4 बजे परमपूज्य प्रीति सुधा जी को अंतिम विदाई दी गई. कडी धूप के बावजूद हजारों की संख्या में अनुयायी उपस्थित रहे. पुणे और आसपास के सभी नगरों, गांवों से जैन धर्मावलंबी उपस्थित रहे.
परमपूज्य प्रीति सुधा जी महाराजसा के अमरावती आगमन की स्मृतियों को श्रावक प्रफुल्ल सावला ने स्मरण किया. आपने बताया कि सरल सामान्य भाषा में जैनत्व को साध्वी जी ने जन-जन तक पहुंचाया. वे महान सहृदयी व्यक्तित्व की धनी रही. अनेकानेक भजनों की रचना आपने की और सर्वत्र यह भजन, यह काव्यकृतियां लोकप्रिय हुई. इतनी लोकप्रिय कि सभी की जिव्हा पर इन काव्य पंक्तियों ने सदा के लिए स्थान जमा लिया. उनमें ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, बाद अमृत पिलाने से क्या फायदा…., म्हारा ज्ञानी रे जीवडा …’ का सहज उल्लेख किया जा सकता है. प्रफुल्ल सावला ने बताया कि साध्वी जी के भजनों में समस्त समाज और धर्मशास्त्र का निचोड रहा है.
प्रफुल्ल सावला स्मरण करते हैं कि यह उनके महाविद्यालयीन दिनों की बात होगी. उन्हें ठीक प्रकार स्मरण है कि साध्वी जी को विद्यार्थियों ने गैदरिंग और कार्यक्रम में सहर्ष तथा सादर आमंत्रित किया तो साध्वी जी भी उतने ही चाव और भाव से आती. हजारों की संख्या में उन्हें सुनने उत्सुक विद्यार्थियोें को सीख देती. उनके द्बारा गाए और रचित भजन सभी को मुखपाठ हो गये थे.
प्रफुल सावला के अनुसार पूज्य श्री का भाई बहन के स्नेह पर आधारित व्याख्यान इतना प्रभावी रहा कि विदर्भ के अनेक नगरों, गांवों में वर्षो से दूर-दूर रह रहे भाई बहन एक हो गये. कचहरी में चल रहे केसेस लोगों ने पीछे ले लिए थे. आपके सानिध्य में आकर क्षण भर में निर्मल हृदय हो जाते थे. विषय को देखने का आपका अलग दृष्टिकोण रहा.




