विज्ञान और अध्यात्म का सुंदर संगम साधने वाले वारकरी स्व. दादासाहेब कालमेघ

नागपुर विश्वविद्यालय (वर्तमान राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय) के पूर्व कुलपति तथा विदर्भ की ख्यातनाम श्री शिवाजी शिक्षण संस्था के पूर्व अध्यक्ष, जनसामान्य के मन और हृदय में आज भी अमिट स्थान रखने वाले, हम सभी के प्रेरणास्रोत और विदर्भ के मानचिन्ह स्वर्गीय वा. मो. उर्फ दादासाहेब कालमेघ को उनके 29वें स्मृतिदिन (29 जुलाई 2026) पर इस लेख के माध्यम से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं.
श्री शिवाजी शिक्षण संस्था संचालित आदर्श विद्यालय, दर्यापुर (जिला अमरावती) में अंग्रेजी माध्यम की शुरुआत हुई थी. मुझे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना था, इसलिए मेरे पिता ने मुझे आठवीं कक्षा में इस विद्यालय में प्रवेश दिलाया. इसका उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि उसी समय जीवन में पहली बार मैंने दादासाहेब कालमेघ का नाम सुना था. हमारे शिक्षक गिल्डा सर, पाकधुने सर, ताठे सर और देशमुख सर, जो संस्था के आजीवन सदस्य थे, अक्सर अनौपचारिक चर्चाओं में कहते थे कि विद्यार्थियों के लिए अंग्रेजी माध्यम शुरू करने का श्रेय दादासाहेब को जाता है. इससे उनकी दूरदर्शिता का अनुमान लगाया जा सकता है, जिसका महत्व आज और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है.
एक छोटे से गांव से निकलकर अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में उच्च शिक्षा प्राप्त करना, आईआईटी खड़गपुर जैसी प्रतिष्ठित संस्था से एम.टेक. की उपाधि हासिल करना, एल.आई.टी. जैसे प्रसिद्ध संस्थान में प्राध्यापक बनना और फिर कम आयु में कुलपति बनने का गौरव प्राप्त करना-यह आज भी किसी प्रेरक कथा से कम नहीं है. 1980 के दशक में यह उपलब्धि हासिल करने वाले वा. मो. उर्फ दादासाहेब कालमेघ वास्तव में एक असाधारण और ऊर्जावान व्यक्तित्व थे.
विज्ञान के शिक्षक होने के बावजूद दादासाहेब अध्यात्म को अत्यंत महत्व देते थे. उन्होंने अपने प्रवचनों, कीर्तनों और पोवाड़ों के माध्यम से विज्ञान और अध्यात्म दोनों की महत्ता लोगों को समझाई. संत परंपरा, कीर्तन और यज्ञ जैसे विषयों पर एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति विश्वास करता है, यह बात कई लोगों को आश्चर्यजनक लगती थी. इसी कारण उन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा. लेकिन उन्होंने इन सबकी परवाह किए बिना अपने विचारों और व्यक्तित्व की गरिमा बनाए रखी.
विज्ञान और अध्यात्म का विषय आज की युवा पीढ़ी के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. एक प्राध्यापक और कुलपति होकर भी दादासाहेब ने अध्यात्म को क्यों अपनाया, इसका उत्तर उनके विचारों और लेखन में मिलता है. उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म पर व्यापक लेखन किया है. आशा है कि उनका यह हस्तलिखित साहित्य श्री शरद कालमेघ और श्री हेमंत कालमेघ निकट भविष्य में प्रकाशित करेंगे.
विज्ञान और अध्यात्म के संबंध में दादासाहेब लिखते हैं कि,
विज्ञान म्हणजे विशेष ज्ञान, अध्यात्म म्हणजे संपूर्ण ज्ञान,
विज्ञान मर्यादित बिंदू, अध्यात्म सिंधू अध्यात्म असे.
विज्ञान तर्क्य, व्यक्ताचे, वादविवाद शोध संशोधनाचे,
श्रद्धा, अनुभूती, परमार्थ परिणामांचे अतर्क्य, अव्यक्त अध्यात्म असे.
विज्ञानाचा संबंध देहाशी, अध्यात्माचा देवाशी,
विज्ञान डोळ्याचे, दृष्टीचे अध्यात्म असे.
इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि दादासाहेब विज्ञान की तार्किकता और अध्यात्म की अनुभूति, दोनों को समान महत्व देते थे. वे केवल वैज्ञानिक दृष्टि के व्यक्ति नहीं थे, बल्कि अध्यात्म की दिव्य दृष्टि से भी संपन्न थे.
आगे वे लिखते हैं कि,
विज्ञान-अध्यात्माची करूनी युती, अर्थ-परमार्थाची जोडोनी नाती,
शांती-क्रांतीची वाढवुनी गती, दारिद्र्य भेदाभेद मिटविण्यासाठी,
मार्गक्रमावे उद्योग-धंदे.
इन विचारों से यह स्पष्ट होता है कि दादासाहेब विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय को मानव कल्याण का मूलमंत्र मानते थे. इसी दृष्टि से वे किसान और मजदूर केंद्रित समाज व्यवस्था की कल्पना करते थे. एक पोवाड़े में वे कहते हैं,
टिळकांचे होते स्वराज्य, नेहरुंचे होते लोकराज्य,
शास्त्रींचे होते किसान राज्य, गांधींचे होते रामराज्य,
तुकडोजींचे होते ग्रामराज्य, दादास हवे किसान-मजदुरांचे राज्य.
दादासाहेब का स्वभाव लोगों को तर्क और युक्ति के माध्यम से समझाने का था. उनका चिंतन सदैव लोककल्याण पर केंद्रित रहा. सत्ता को वे कभी व्यक्तिगत स्वार्थ का साधन नहीं मानते थे. इसी भाव को उन्होंने अपनी रचनाओं में इस प्रकार व्यक्त किया कि,
गेली आमची खुर्ची, घसरला आमचा भाव,
नका आमच्या मांग लागू, नका करू काव काव.
होती आमची खुर्ची, होता आमचा मान,
होतो करत आम्ही, रातदिन तनतन.
जाता आमची खुर्ची, गेला आमचा ताव,
जाता आमची खुर्ची, गेली आमची हाव.
जब हम उनके जीवन और विचारों का अध्ययन करते हैं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि उनमें इतना आत्मबल, इतनी निस्वार्थ भावना और इतनी व्यापक दृष्टि कैसे विकसित हुई. इसका उत्तर उनके जीवन में विज्ञान और अध्यात्म के अद्भुत संतुलन में मिलता है.
दादासाहेब के साहित्य, काव्य और जीवन-दर्शन का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि वे मैं से अधिक परिवार, परिवार से अधिक समाज, समाज से अधिक राष्ट्र और राष्ट्र से भी ऊपर विश्वकल्याण को महत्व देते थे. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन इसी आदर्श के लिए समर्पित कर दिया. वे सुख और दुःख को समान भाव से स्वीकार करने वाले व्यक्तित्व थे. कृतज्ञता, निस्वार्थता, निर्मोह, ज्ञान और कर्मनिष्ठा उनके व्यक्तित्व की पहचान थे. यही गुण उन्हें सामान्य से असाधारण बनाते थे. यदि हम उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लें, तो वही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
पंढरपुर की वारी में लाखों लोग स्वयं अनुशासन के साथ शामिल होते हैं. अनेक विदेशी भी इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं. एक बार एक विदेशी व्यक्ति ने एक वारकरी से पूछा कि, आर दे बेगर्स यानी क्या ये सभी लोग भिखारी हैं. तो उस वारकरी ने उत्तर दिया कि, यस दे आर बेगर्स, बट दे आर बेगिंग फॉर वर्ल्ड वेलफेअर यानी हाँ, वे भिखारी हैं, लेकिन वे अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कल्याण की भिक्षा मांग रहे हैं. यही वारकरी परंपरा की वास्तविक शक्ति है. हमारे दादासाहेब भी ऐसे ही वारकरी थे, जिन्होंने विज्ञान और अध्यात्म का सुंदर संगम अपने जीवन में साधा था.
विनम्र श्रद्धांजलि.
– डॉ. दीपक धोटे
प्राचार्य, ब्रजलाल बियाणी विज्ञान महाविद्यालय, अमरावती
मो.क्र. 9422857431