तीन नवजात बच्चे आग में जिंदा जले, बुरी तरह झुलसकर मौत

डफरीन अस्पताल अग्निकांड, एनआयसीयू में मौत का तांडव

* वेंटिलेटर में धमाके की आशंका के बाद चौथी मंजिल पर धुएं और आग का कहर
* 39 नवजात बच्चे थे एनआयसीयू में भर्ती, 36 बच्चों को बचाया गया, 6 घायल
* फायर सिस्टम, फायर ऑडिट, बंद लिफ्टों और प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल
* अमरावती की सबसे दर्दनाक अस्पताल त्रासदी ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की परतें
अमरावती/दि.24– सोमवार की भोर अमरावती के लिए एक ऐसी दर्दनाक सुबह लेकर आई, जिसे शायद यह शहर वर्षों तक भूल नहीं पाएगा. जिला स्त्री अस्पताल यानी डफरीन अस्पताल के नवजात शिशु अतिदक्षता विभाग (एनआयसीयू) में तड़के लगी भीषण आग ने तीन मासूम नवजातों की जिंदगी हमेशा के लिए छीन ली, जबकि छह अन्य बच्चे घायल हो गए. इस हादसे ने केवल तीन परिवारों को नहीं उजाड़ा, बल्कि पूरे जिले को गहरे शोक में डुबो दिया है.
जानकारी के मुताबिक, तड़के लगभग 3.30 से 4 बजे के बीच अस्पताल की चौथी मंजिल पर स्थित एनआयसीयू विभाग में अचानक धमाके जैसी आवाज सुनाई दी. प्रारंभिक जानकारी के अनुसार वेंटिलेटर अथवा उससे जुड़े किसी विद्युत उपकरण में तकनीकी खराबी के कारण विस्फोट हुआ और कुछ ही सेकंड में आग तथा धुआं पूरे वार्ड में फैल गया. घटना में तीन नवजातों की मौत हो गई. इस घटना के चलते अमरावती से लेकर मुंबई मंत्रालय तक हडकंप मचा. जिसके चलते मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश देने के साथ ही राज्य के स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर को तुरंत ही अमरावती के लिए रवाना किया.

* मौत और जिंदगी के बीच कुछ मिनटों की जंग
पता चला है कि, जब एनआयसीयू में धमाका हुआ, उस समय अधिकांश नवजात बच्चे मशीनों और जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे सांस ले रहे थे. अचानक पूरे विभाग में धुआं भर गया. वार्ड के अंदर मौजूद डॉक्टरों और नर्सों को कुछ पल के लिए समझ ही नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है. कुछ ही मिनटों में हालात भयावह हो गए. अलार्म, चीख-पुकार और भागदौड़ के बीच कर्मचारियों ने देखा कि धुआं तेजी से फैल रहा है और नवजात बच्चों का दम घुट सकता है. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अस्पताल कर्मचारियों ने बिना समय गंवाए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया. कई कर्मचारियों ने कांच तोड़कर बच्चों को बाहर निकालना शुरू किया. नवजातों को गोद में उठाकर, ऑक्सीजन सपोर्ट के साथ और कुछ को सीधे स्ट्रेचर पर रखकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया. कुछ ही मिनटों की यह जंग 36 मासूमों की जिंदगी बचाने में निर्णायक साबित हुई.

* चौथी मंजिल पर मौत का साया, तीन विंगों में भर्ती थे 39 नवजात
डफरीन अस्पताल के एनआयसीयू विभाग में तीन अलग-अलग विंग संचालित हैं. प्रत्येक विंग में लगभग 13 नवजात बच्चों के उपचार की व्यवस्था है. घटना के समय कुल 39 बच्चे भर्ती थे. जिस विंग में आग लगी, वहां 9 से 12 नवजातों का उपचार चल रहा था. इनमें कई बच्चे समयपूर्व जन्मे हुए थे और कुछ गंभीर स्थिति में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे. धमाके के बाद सबसे पहले इसी विंग में धुआं फैला और बच्चों की जान पर संकट आ गया. डॉक्टरों और नर्सों ने समय रहते कार्रवाई नहीं की होती तो मृतकों की संख्या कई गुना अधिक हो सकती थी.

* मेडिकल स्टाफ व नर्सों की बहादुरी ने टाला और बड़ा हादसा
इस पूरे हादसे में अस्पताल की नर्सिंग टीम की भूमिका सबसे अधिक चर्चा में रही. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, धुआं इतना घना था कि वार्ड के भीतर सांस लेना भी मुश्किल हो गया था. इसके बावजूद कई नर्सें लगातार भीतर जाती रहीं और बच्चों को बाहर निकालती रहीं. एक नर्स ने तो अपनी जान की परवाह किए बिना कई बार धुएं से भरे वार्ड में प्रवेश कर बच्चों को सुरक्षित निकाला. उनकी इसी बहादुरी के कारण दर्जनों नवजातों की जान बच सकी. इस साहसिक कार्य की पूरे शहर में सराहना हो रही है.

* तीन परिवारों की खुशियां मातम में बदलीं
इस अग्निकांड में जिन तीन नवजातों की मौत हुई, उनकी पहचान हो चुकी है. मृत बच्चों में पूजा स्वप्निल बोरगे (पुलगांव, जिला वर्धा) का नवजात पुत्र, गायत्री प्रफुल चोपड़े (मुरखेड, तहसील अंजनगांव सुर्जी) का नवजात पुत्र एवं किरण गंगाराम बेठेकर (बोराला, तहसील चिखलदरा) की नवजात पुत्री शामिल हैं. इन तीनों परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.
सबसे मार्मिक घटना पुलगांव निवासी स्वप्निल और पूजा बोरगे के परिवार की रही. आठवें माह में समयपूर्व जन्मे बेटे को उपचार के लिए एनआयसीयू में भर्ती कराया गया था. पहली संतान के रूप में पुत्र जन्म होने पर पूरा परिवार उत्साहित था. स्वप्निल पूरी रात रिश्तेदारों और मित्रों को बेटे के जन्म की खुशखबरी सुनाते रहे. लेकिन सुबह होते-होते वही व्यक्ति अपने बेटे की मौत की खबर सुनाने को मजबूर हो गया. अस्पताल परिसर में उनकी चीखें सुनकर मौजूद लोग भी भावुक हो उठे.

* अस्पताल परिसर में मचा कोहराम, रोते-बिलखते रहे परिजन
हादसे की खबर फैलते ही अस्पताल परिसर में सैकड़ों लोग जमा हो गए. कई माता-पिता अपने बच्चों की जानकारी पाने के लिए घंटों तक अस्पताल परिसर में भटकते रहे. किसी को यह पता नहीं था कि उसका बच्चा किस अस्पताल में भेजा गया है, कोई यह जानने की कोशिश कर रहा था कि उसका बच्चा जीवित है या नहीं. कई महिलाएं अस्पताल परिसर में ही बेसुध होकर गिर पड़ीं. मृत बच्चों के परिजनों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ तीव्र आक्रोश व्यक्त किया. उनका कहना था कि यदि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होती तो उनके बच्चों की जान बच सकती थी.

* 36 बच्चों को पांच अस्पतालों में भेजा गया
बचाए गए बच्चों को तत्काल विभिन्न अस्पतालों में स्थानांतरित किया गया. जिसके तहत सुपर स्पेशालिटी अस्पताल में 5 बच्चे, मुरके अस्पताल में 8 बच्चे, होप अस्पताल में 6 बच्चे, पारिजात अस्पताल में 2 बच्चे व पीडीएमसी अस्पताल में 11 बच्चे रेफर किए गए. वहीं चार बच्चों की स्थिति स्थिर होने पर उन्हें उनके परिजनों के साथ घर भेज दिया गया.

* बंद पड़ी दोनों लिफ्टों ने बढ़ाई मुश्किल
इस भयावह घटना के बाद अस्पताल की आधारभूत सुविधाओं की वास्तविक स्थिति भी सामने आ गई. चार मंजिला इमारत में दो लिफ्टें लगी हुई हैं, लेकिन दोनों लंबे समय से बंद थीं. लिफ्टों के सामने भारी स्टील बेंच रखी गई थीं. जब आग लगी तब दमकल कर्मियों, पुलिस अधिकारियों और अस्पताल कर्मचारियों को चौथी मंजिल तक सीढ़ियों के माध्यम से पहुंचना पड़ा. नवजात बच्चों को गोद में लेकर नीचे लाना पड़ा. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि लिफ्टें चालू होतीं तो बचाव कार्य और तेज हो सकता था.

* पूरे अमरावती में शोक, न्याय की प्रतीक्षा
तीन मासूम नवजातों की मौत ने पूरे अमरावती को झकझोर कर रख दिया है. हर नागरिक के मन में एक ही सवाल है कि क्या यह केवल एक तकनीकी दुर्घटना थी या फिर लापरवाही, अनदेखी और जवाबदेही के अभाव ने तीन नन्हीं जिंदगियों को निगल लिया. आज अस्पताल के बाहर पसरा सन्नाटा, मर्च्युरी में गूंजती चीखें, बिलखते माता-पिता और अधूरी रह गई तीन जिंदगियां इस बात की गवाही दे रही हैं कि यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस विफलता का प्रतीक है जिसकी कीमत तीन नवजात बच्चों ने अपनी जान देकर चुकाई है. अब पूरा अमरावती, पूरा विदर्भ और पूरा महाराष्ट्र उस जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है जो तय करेगी कि आखिर इन तीन मासूमों का दोषी कौन है.

* केवल दुर्घटना नहीं, पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चेतावनी
यह हादसा केवल अमरावती का मामला नहीं है. इससे पहले महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल, भोपाल के कमला नेहरू अस्पताल तथा देश के अन्य अस्पतालों में भी एनआयसीयू और आयसीयू में आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनके बाद अस्पताल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई थीं. विशेषज्ञों का मानना है कि एनआयसीयू जैसे विभागों में विद्युत उपकरणों, वेंटिलेटरों, ऑक्सीजन लाइनों, थर्मल सेंसर, स्मोक डिटेक्शन सिस्टम और आपातकालीन निकासी व्यवस्था का नियमित ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए.

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