मातृत्व अवकाश के लिए महिला डॉक्टर पर लगा 23 लाख का जुर्माना रद्द
मां बनना अपराध नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की सख्त टिप्पणी

नागपुर/दि.14 – मातृत्व अवकाश लेने के कारण एक महिला डॉक्टर पर लगाया गया 23 लाख 58 हजार 403 रुपये का जुर्माना रद्द करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि मां बनना कोई अपराध नहीं है और कोई भी सेवा नियम महिला को मातृत्व से वंचित नहीं कर सकता. यह फैसला न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की खंडपीठ ने सुनाया. अदालत के इस निर्णय को मातृत्व अवकाश और महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
जानकारी के मुताबिक याचिकाकर्ता डॉ. मीनाक्षी मुठिया मूल रूप से तमिलनाडु की रहने वाली हैं. उन्होंने एमडीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद नागपुर के शासकीय दंत महाविद्यालय व अस्पताल में सहायक प्राध्यापक के रूप में एक वर्ष की अनिवार्य सेवा देने का बंधपत्र किया था. वह 13 दिसंबर 2023 को महाविद्यालय में कार्यरत हुई थीं और उन्हें 12 दिसंबर 2024 तक सेवा देना अपेक्षित था. इसी दौरान वे गर्भवती हो गईं और उन्होंने 1 मई से 30 सितंबर 2024 तक मातृत्व अवकाश लिया. प्रसूति के बाद उन्होंने पुनः अपनी सेवा जॉइन कर ली, लेकिन चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संचालनालय ने यह कहते हुए मातृत्व अवकाश की अवधि को सेवा अवधि में शामिल करने से इनकार कर दिया कि बंधनकारक सेवा में मातृत्व अवकाश का प्रावधान नहीं है. इतना ही नहीं, महाविद्यालय प्रशासन ने यह आरोप लगाते हुए कि डॉक्टर ने बंधपत्र की सेवा पूरी नहीं की, 6 जनवरी 2025 को 23.58 लाख रुपये का जुर्माना वसूलने का आदेश जारी कर दिया. इस आदेश के खिलाफ डॉ. मीनाक्षी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मातृत्व केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संवैधानिक संरक्षण प्राप्त मानवीय अधिकार है. गर्भावस्था और प्रसूति के दौरान मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त समय मिलना आवश्यक है. अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए मां की उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. इसलिए मातृत्व अवकाश को सेवा में बाधा या अनुशासनहीनता नहीं माना जा सकता. खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी बॉन्ड, करार या सेवा नियम के आधार पर महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश से वंचित करना या उस अवधि के लिए दंड लगाना कानून के अनुरूप नहीं है. ऐसा करना मातृत्व लाभ कानून की भावना के विपरीत होगा.
अदालत के इस फैसले से कार्यस्थलों पर महिलाओं के मातृत्व अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता मिली है. माना जा रहा है कि भविष्य में ऐसे मामलों में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित हो सकता है. इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अक्षय सुदामे ने पक्ष रखा.





