न्याय के लिए बेटी ने मां का शव कब्जे में लेने से किया इंकार

मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने कहा ‘भूमिका उचित’

* अमरावती शहर के गाडगेनगर थाना क्षेत्र की गत वर्ष की घटना
अमरावती/ दि.14- मां की मृत्यु बाबत जांच होने तक शव कब्जे में लेने से इंकार करना अनुचित नहीं हैं. वह शव का अवमान साबित नहीं होता, ऐसा महत्वपूर्ण फैसला मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने एक प्रकरण में दिया. इस प्रकरण में न्यायालय ने अन्य आरोपी महिला के विरोध में दर्ज मामला रद्द करने के निर्देश दिए. यह घटना अमरावती शहर के गाडगे नगर थाना क्षेत्र की हैं.
जानकारी के मुताबिक याचिकाकर्ता महिला का नाम अमरावती निवासी विजया उकरडा उर्फ विलासराव आठोर (आठवले) हैं. अमरावती के गाडगेनगर थाना क्षेत्र में दर्ज हुआ मामला रद्द करने का अनुरोध याचिकाकर्ता विजया ने नागपुर उच्च न्यायालय की खंडपीठ में दायर किया हैं. इस प्रकरण पर न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके के समक्ष सुनवाई हुई. अमरावती निवासी शांताबाई उकरडा के निधन के बाद 13 अक्तूबर 2025 को यह घटना घटित हुई. पुलिस ने शांताबाई की बेटी विजया को मां का शव कब्जे में लेने कहा, तब विजया ने मृत्यु की जांच करने की मांग की. साथ ही जांच पूर्ण होने तक शव कब्जे में लेने से इंकार कर दिया. इंकार किए जाने से शव का अवमान करने का आरोप करते हुए पुलिस ने मृतक महिला की बेटी विजया के खिलाफ मामला दर्ज किया. लेकिन इस इंकार में किसी की भावना आहत करने का, धार्मिक भावना दुखाने का अथवा शव का अवमान करने का कोई भी मकसद रहने का उल्लेख प्रकरण में दिखाई नहीं दिया, ऐसा न्यायालय ने स्पष्ट किया. याचिकाकर्ता ने स्मशानभूमि में अवैध रूप से प्रवेश किया, अंत्येष्टि में दुविधा निर्माण की अथवा शव का अपमान हो ऐसा कोई भी कृत्य करने का आरोप नहीं हैं. इस कारण भारतीय न्याय संहिता की धारा 301 के तहत आवश्यक घटक इस प्रकरण में पूर्ण नहीं होते, ऐसा स्पष्ट करते हुए न्यायालय ने प्रकरण रद्द कर दिया. विधिसेवा प्राधिकरण में याचिकाकर्ता की तरफ से पक्ष रखने के लिए एड. शिल्पा गिरडकर की नियुक्ति की थी.
* चाहिए 50 लाख रुपए की भरपाई
मां का शाव बेवजह आठ दिन कब्जे में रखकर मानसिक रूप से प्रताडीत किए जाने का आरोप करते हुए याचिकाकर्ता विजया आठोर ने राज्य शासन व पुलिस के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की हैं. 50 लाख रुपए भरपाई की मांग की हैं. संबंधित अधिकारी की मनमानी और गैरकानूनी कृत्य के कारण मुलभूत अधिकार का उल्लंघण होने का दावा याचिका में किया हैं. शव वापिस मिलने के लिए बार-बार पत्र व्यवहार करने के बाद भी अधिकारी ने 19 अक्तूबर 2025 तक पहल नहीं की, ऐसा आरोप किया हैं. उच्च न्यायालय ने शासन को नोटिस देकर जवाब मांगा हैं.

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