अमरावती-नागपुर के 28 प्राध्यापकों को ‘पुरानी पेंशन’

सुप्रीम कोर्ट में जीत, हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

नागपुर /दि.27- 1 नवंबर 2005 से पहले जिनकी भर्ती प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, लेकिन बाद में ज्वाइनिंग हुई, ऐसे अमरावती और नागपुर विभाग के 28 प्राध्यापकों को पुरानी पेंशन योजना लागू करने का अहम फैसला आया है. राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी, जिससे हाईकोर्ट नागपुर खंडपीठ का फैसला बरकरार रहा है. इसके अनुसार उच्च शिक्षा विभाग ने 23 जुलाई को सभी प्राध्यापकों को जीपीएफ नंबर भी जारी कर दिए हैं.
* मामले की पृष्ठभूमि
– राज्य में नियम : 1 नवंबर 2005 के बाद नौकरी में आए कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना (एनपीएस) लागू की गई थी.
– समस्या : इन 28 प्राध्यापकों की चयन और शासन की मान्यता 2005 से पहले की थी, लेकिन प्रशासनिक देरी के कारण इन्हें नई पेंशन योजना में डाल दिया गया. इसके विरोध में नागपुर यूनिवर्सिटी टीचर एसोसिएशन नूटा और महाराष्ट्र प्राध्यापक संघ के अध्यक्ष डॉ. प्रवीण रघुवंशी के नेतृत्व में प्रो. डॉ. राजेश मिरगे और अन्य 27 प्राध्यापकों ने 14 जनवरी 2024 को हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की.
* कोर्ट का फैसला
– हाईकोर्ट नागपुर खंडपीठ : 13 अगस्त 2025 को प्राध्यापकों के पक्ष में फैसला देते हुए 3 महीने में पुरानी पेंशन लागू करने का आदेश दिया.
सुप्रीम कोर्ट : शासन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. लेकिन 29 मई को सुप्रीम कोर्ट ने शासन की याचिका खारिज कर हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रखा.
* ‘नियुक्ति प्रक्रिया की तारीख ही आधार’
कोर्ट ने माना कि कर्मचारी के सेवा अधिकारों का आधार नियुक्ति प्रक्रिया की तारीख ही है. प्रशासनिक देरी के कारण कर्मचारियों के हक नहीं मारे जा सकते. समान परिस्थिति वाले कर्मचारियों में भेदभाव नहीं हो सकता. इस कानूनी लड़ाई की नींव दिवंगत पूर्व विधायक प्रा. बी. टी. देशमुख के मार्गदर्शन में रखी गई थी. याचिकाकर्ताओं की ओर से एड. फिरदौस मिर्जा और एड. अशफाक शेख ने पैरवी की.
* प्रा. डॉ. राजेश मिरगे का बयान
यह लड़ाई सिर्फ 28 प्राध्यापकों की पेंशन की नहीं थी, बल्कि शिक्षकों की सामाजिक सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों की थी. यह फैसला भविष्य में 1 नवंबर 2005 से पहले के सभी कर्मचारियों के लिए दिशा-निर्देश बनेगा.

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