डफरीन में मौत की आग, वेंटिलेटर धमाके से भड़की लपटें

अमरावती का सबसे दर्दनाक सवेरा

* तीन नवजातों की मौत, तीन माताओं की गोद उजड़ी
* सुरक्षा व्यवस्था, फायर ऑडिट और जवाबदेही पर उठे बड़े सवाल
* अमरावती से लेकर मुंबई मंत्रालय तक हडकंप, पूरे महाराष्ट्र को झकझोर गई त्रासदी
अमरावती/दि.24 – सोमवार की तड़के जब अधिकांश शहर नींद में था, तब अमरावती के जिला स्त्री रुग्णालय यानी डफरीन अस्पताल के नवजात शिशु अतिदक्षता विभाग (एनआयसीयू) में ऐसा हृदयविदारक हादसा हुआ, जिसने पूरे महाराष्ट्र को स्तब्ध कर दिया. तड़के लगभग साढ़े तीन से चार बजे के बीच नवजात शिशु विभाग में अचानक आग भड़क उठी. प्रारंभिक जानकारी के अनुसार वेंटिलेटर में विस्फोट के बाद आग लगी और देखते ही देखते धुएं ने पूरे कक्ष को अपनी चपेट में ले लिया. इस हादसे में तीन मासूम नवजात बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि कई अन्य बच्चों की जान संकट में आ गई. यह केवल एक अस्पताल दुर्घटना नहीं रही, बल्कि सरकारी अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था, फायर ऑडिट, उपकरणों के रखरखाव और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न बनकर उभरी है.
* कुछ मिनटों में उजड़ गई तीन परिवारों की दुनिया
इस हादसे में जिन तीन नवजातों की जान गई, उनमें पूजा बोरगे का नवजात पुत्र (पुलगांव, जिला वर्धा), गायत्री प्रफुल चोपड़े का नवजात पुत्र (मुरखेड, तहसील अंजनगांव सुर्जी) व किरण बेठेकर की नवजात पुत्री (बोराला, तहसील चिखलदरा) शामिल हैं. मात्र एक से तीन दिन पहले जन्मे इन मासूमों ने दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था कि मौत ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया. अस्पताल परिसर में जब माताएं बिलख-बिलखकर हमारा बच्चा वापस दे दो कहकर रो रही थीं, तब वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं.
* 39 बच्चों में मची अफरा-तफरी, 36 को बचाया गया
अस्पताल के तीसरे माले पर स्थित डछउण में तीन अलग-अलग कक्ष हैं, जिनमें कुल 39 नवजात बच्चों के उपचार की व्यवस्था है. प्रत्येक कक्ष की क्षमता 13 बच्चों की है. जिस कक्ष में आग लगी, वहां 12 नवजात भर्ती थे. आग लगते ही ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों ने जान जोखिम में डालकर बच्चों को बाहर निकालना शुरू किया. उनकी तत्परता के कारण 36 बच्चों को सुरक्षित बचा लिया गया. छह बच्चों को तत्काल सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और अन्य चिकित्सा संस्थानों में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार जारी है.
* मौके पर पहुंचे जनप्रतिनिधि और प्रशासन
घटना की सूचना मिलते ही अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई. जिलाधिकारी आशीष येरेकर, पुलिस आयुक्त एवं वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी तत्काल अस्पताल पहुंचे. इसके साथ ही विधायक सुलभा खोडके, पूर्व सांसद नवनीत राणा, पूर्व मंत्री यशोमती ठाकुर, पूर्व मंत्री डॉ. सुनील देशमुख, सांसद बलवंत वानखड़े, विधान परिषद सदस्य प्रवीण पोटे पाटील, पूर्व महापौर विलास इंगोले, उपमहापौर सचिन भेंडे व शिंदे सेना की महिला नेत्री प्रीती बंड सहित अनेक जनप्रतिनिधियों ने अस्पताल पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया.
* माताओं का आक्रोश, अस्पताल परिसर में गम और गुस्सा
मृत बच्चों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो परिजन फूट-फूटकर रो पड़े. कई माताएं अपने बच्चों के शवों से लिपटकर बैठ गईं. हमारा बच्चा हमें वापस दे दो, हमारे बच्चे को कहीं मत ले जाओ जैसे आर्तनादों ने अस्पताल परिसर को शोक में डुबो दिया. परिजनों का आरोप था कि यदि सुरक्षा व्यवस्था समय पर काम करती तो बच्चों की जान बच सकती थी.
* जिलाधिकारी ने खोला पुराना राज, 2023 में भी लगी थी आग
जिलाधिकारी आशीष येरेकर ने घटना के बाद एक बेहद महत्वपूर्ण खुलासा किया. उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 में भी इसी अस्पताल के एनआईसीयू में आग लगने की घटना हुई थी. उस समय भी फायर एक्सटिंग्विशर और स्प्रिंकलर सिस्टम अपेक्षित रूप से काम नहीं कर पाए थे. अब सवाल उठ रहा है कि यदि 2023 की घटना के बाद सुधारात्मक कदम उठाए गए थे तो वे प्रभावी क्यों नहीं रहे? यही तथ्य अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है.
* सीएम फडणवीस का बड़ा फैसला
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घटना को अत्यंत दुखद और हृदयविदारक बताते हुए उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं. उन्होंने मृत बच्चों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है. साथ ही घायल बच्चों के उपचार का पूरा खर्च राज्य सरकार द्वारा उठाने के निर्देश दिए हैं.
* स्वास्थ्य मंत्री की घोषणा, दोषियों को नहीं बख्शेंगे
स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर स्वयं अमरावती पहुंचे और अस्पताल का निरीक्षण किया. उन्होंने स्वास्थ्य आयुक्त संजय काटकर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय जांच समिति गठित करने की घोषणा की. समिति को आठ दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं. मंत्री ने स्पष्ट कहा कि, चाहे दोष वेंटिलेटर में हो, विद्युत व्यवस्था में हो या प्रशासनिक तंत्र में, जो भी जिम्मेदार होगा उसकी गय नहीं की जाएगी.
* राजनीतिक प्रतिक्रियाएं, शोक, सवाल और आरोप
घटना के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया. पूर्व मंत्री यशोमती ठाकुर ने सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए वेंटिलेटर, फायर ऑडिट और अस्पताल प्रबंधन की सखोल जांच की मांग की. वहीं पूर्व सांसद नवनीत राणा ने कहा कि यदि ऐसी घटनाएं दोहराई गईं तो गरीबों का सरकारी अस्पतालों पर से विश्वास उठ जाएगा. उन्होंने दोषियों पर सदोष मनुष्यवध का मामला दर्ज करने की मांग की. इसके अलावा राष्ट्रवादी कांग्रेस विधायक रोहित पवार ने राज्य के सभी अस्पतालों का विशेष फायर ऑडिट कराने की मांग करते हुए कहा कि केवल कागजी ऑडिट से काम नहीं चलेगा. इसके साथ ही विधायक सुलभा खोडके ने स्वास्थ्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार से चर्चा कर पूरे प्रकरण की जांच तथा अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग की. जबकि पूर्व मंत्री प्रवीण पोटे पाटील ने कहा कि यह राजनीति का समय नहीं बल्कि पीड़ित परिवारों के साथ खड़े होने का समय है. साथ ही साथ सांसद बलवंत वानखड़े ने इसे सरकारी अस्पतालों की अग्निसुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी बताते हुए राज्यव्यापी सुरक्षा ऑडिट की मांग की.
* पूरा महाराष्ट्र पूछ रहा, आखिर जिम्मेदार कौन?
तीन मासूम जिंदगियां चली गईं. तीन परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए. लेकिन अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस बार भी जांच रिपोर्ट फाइलों में दब जाएगी या वास्तव में जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होगी? डफरीन अस्पताल की यह त्रासदी केवल अमरावती की नहीं है. यह राज्य के हर सरकारी अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर लगा एक गंभीर प्रश्न है. जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक उन तीन मासूमों की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बनी रहेगी. 36 बच्चों को बचा लिया गया, लेकिन तीन परिवारों की गोद हमेशा के लिए सूनी हो गई. यही इस हादसे की सबसे बड़ी और सबसे दर्दनाक सच्चाई है.

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