गणपति से करवाया था रक्तदान और वृक्षारोपण

उमेश चांडक की अनूठी उपलब्धि

* लोकमान्य तिलक के आदर्शों पर चले
* सार्वजनिक गणेशोत्सव का सुंदर सदुपयोग किया था
अमरावती/दि.19- लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम तीव्र करने गणपति उत्सव को सार्वजनिक करने और उसके माध्यम से जागरुकता करने का आदर्श सभी को ज्ञात है. अमरावती में भी लोकमान्य तिलक द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए उमेश रामचंद्र चांडक ने गणेशोत्सव में गणपति को ही रक्तदान करते दर्शाया था. आज इस बात पर किसी को विश्वास नहीं होगा, किंतु 40 बरस पहले ही उमेश चांडक ने अपने जुगलकिशोर व्यायाम शाला गणेश मंडल के माध्यम से पौधारोपण अर्थात पर्यावरण संरक्षण, पानी का सदुपयोग, दुल्हन ही दहेज है, जैसे ज्वलंत विषयों पर आधारित झांकी का निर्माण किया. उन्होंने बताया कि, अभी भी आज के समीचीन कई विषय है. जिन्हें वे गणेश उत्सव के माध्यम से रखना चाहते हैं. पेशे से किसान और तेल व्यापारी उमेश चांडक पारंपरिक गरबा आयोजक मंडल सक्करसाथ गुजराती नवरात्रि से भी जुडे हैं. जुगलकिशोर व्यायाम शाला वह संस्था है. जिसके अनेक पदाधिकारियों ने 1942 के भारत छोडो आंदोलन सहित स्वाधीनता संग्राम में भी सक्रिय हिस्सा लिया था. इतना ही नहीं, तो अनेक कार्यकर्ताओं को भूमिगत होना पडा था. अनेक सेनानियों ने गिरफ्तारी दी थी, जेल की सजा सहन की.
* अनूठी कल्पनाशीलता
उमेश चांडक ने अमरावती मंडल को बताया कि, वह 1985-86 का दौर रहा. उस समय कालाराम मंदिर सराफा परिसर के निवासी महेंद्र भूतडा ने रक्तदान की अलख जगाना शुरु किया था. ऐसे में गणेशोत्सव के माध्यम से वे भी कुछ सार्थक करना चाहते थे. इसलिए रक्तदान के प्रचार-प्रसार हेतु गणेश उत्सव का उपयोग किया. गणपति को ही रक्तदान करते दर्शाया गया. उमेश चांडक की अनोखी कल्पना ने पारंपरिक लोगों को कुछ अंशों में नाराज भी किया था. परंपरावादियों ने पलंग पर लेटे और रक्तदान कर रहे गणपति के स्वरुप पर दबे स्वर में आपत्ति करनी चाही थी. किंतु रक्तदान के प्रचार-प्रसार का बडा उद्देश्य देखते हुए इसे सभी ने मान्य किया, स्वागत किया. तत्कालीन अधिकारियों, जिला अस्पताल के शल्य चिकित्सक सहित अनेक गणमान्य ने झांकी को भेंट दी तथा सराहना की.
* पौधारोपण, जल ही जीवन
उमेश चांडक ने बताया कि, अगले वर्ष उन्होंने पौधारोपण, संवर्धन और संगोपन का विषय साकार किया. गणपति अपने हाथों से पौधारोपण कर रहे हैं और आसपास वृक्षारोपण संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी सीन में प्रदर्शित की गई थी. अगले वर्ष 1987 में राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रचार गणेश उत्सव के जरिए किया गया. उसके अगले वर्ष 1988 में एक कदम आगे बढते हुए सीधे गणराय को चिकित्सक के रुप में बताया गया. चिकित्सक बने गणपति पार्थिव से नेत्र ज्योति लेकर जीवित नेत्रहीन को लगाते दिखाए गए थे. इस झांकी ने भी कमाल की प्रशंसा बटोरी. जुगलकिशोर व्यायाम शाला का नाम चर्चित हो गया.
* और समाजमन हिल उठा
उमेश चांडक बताते हैं कि, 1989 की एक घटना ने समूचे देश को झकझोर दिया था, जब कानपुर में तीन बहनों ने दहेज के डर से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. दहेज जैसी भीषण समस्या से उस समय प्रत्येक परिवार कहीं न कहीं पीडित अथवा जुडा हुआ रहने से उमेश चांडक ने यह विषय गणेशोत्सव में लिया. दुल्हन ही दहेज है की झांकी उन्होंने प्रस्तुत की. उसके साथ दिए गए आंकडों ने समाज की आंखें खुलने का कार्य किया. अगला वर्ष जल अर्थात पानी के बचाव की सीख वाला रहा. झांकी का शीर्षक जल : प्रकृति द्वारा सुलभ, मानव न करें दुर्लभ. इस झांकी ने भी चर्चा का नया कीर्तिमान गढा.
* नाना प्रकार के टैक्स पर कटाक्ष
इसके अगले बरस उमेश चांडक ने आम से लेकर खास सभी लोगों के दिल की बात गणेश उत्सव झांकी के माध्यम से रख दी. इस बार उनका विषय सामान्य लोगों पर बढते करों अर्थात टैक्स को लेकर रहा. नाना प्रकार के टैक्स उस समय देश में लागू थे. करों के बोझ से आम आदमी कराह उठा था. अत: उमेश चांडक ने झांकी बनाई थी. कर : सिर पर बोझ, वह भी कमरतोड. उनकी झांकी सभी ओर चर्चित रही. हालांकि सरकार को टैक्स के प्रकार घटाने में बरसों लग गए.
* महीनों की रिसर्च
उमेश चांडक ने बताया कि, उस समय न गूगल था न सोशल मीडिया. ऐसे में जानकारी एकत्र करने में ही काफी समय लगता. बावजूद इसके धुन के पक्के उमेश चांडक बडी रिसर्च करते. मंडल के कुछ सहयोगी उन्हें खूब सहायता करते. ऐसे में काफी रिसर्च पश्चात विषय जन दरबार में गणेशोत्सव के माध्यम से रखा जाता. आज उमेश चांडक मोबाइल : सिकुडती दुनिया, जकडता मानव तथा चट मंगनी-पट ब्याह और अवयव दान जैसे विषयों पर गणेशोत्सव में झांकी बनाने की चाहत रखते हैैं. चांडक के परिवार में माताजी, चार भाई, पत्नी सरोज, पुत्र उदय और पुत्री उन्नति का समावेश है.
* धुन के पक्के, विरोध से अविचलित
उमेश चांडक अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे. उन्होंने मंडल में ही हो रहे उनके राष्ट्रीय कार्यक्रमों और ज्वलंत विषयों की झांकियों के विरोध को दरकिनार किया. विरोध से अविचलित उमेश चांडक ने कालांतर में अन्ना हजारे के आंदोलन को भी गणेशोत्सव में विषय बनाया था. उनका कहना रहा कि, आजादी पश्चात सामाजिक समस्याओं, निराकरण और राष्ट्रीय चेतना के कार्यक्रमों को जागरुकता का विषय बनाया. चांडक ने बताया कि, उस समय ना फ्लेक्स थे ना ही गूगल. सीमित पैसे और स्थान के बावजूद आकर्षक झांकी से जनहित और राष्ट्रहित का संदेश देने का चैलेंज रहता था. उसे सर्वतोपरि उत्कृष्ट करने का प्रयत्न किया.
* अंधश्रद्धा की झांकी सुपरहिट
उमेश चांडक ने बताया कि, निश्चित ही राष्ट्र और समाज से जुडे अनेक विषय रहे. ज्वलंत विषयों पर झांकी प्रस्तुत करने में बडा परिश्रम करना पडा. ऐसे ही अंध विश्वासों की बखिया उधेडता सीन जब गणेशोत्सव में प्रस्तुत कि, तो वह पब्लिक को बडा पसंद आया. सुपरहिट रहा. इस दृश्य को प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए लोगबाग उमडे थे. कतारें लग गई थी. चांडक बताते हैं कि, उन्हें स्वयं आभास न था कि, अंधश्रद्धा को दूर करने का यह सीन इस कदर पसंद किया जाएगा.

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