अमरावती महानगरपालिका सफाई कामगार संस्था प्रकरण

88.11 लाख रुपये के कथित घोटाले मामले में ऑडिटर को अग्रिम जमानत

* अदालत ने कहा- ऑडिट रिपोर्ट में अनियमितताओं का स्पष्ट उल्लेख, प्रथम दृष्टया अपहार छिपाने का प्रयास नहीं
अमरावती/दि.29- अमरावती महानगरपालिका सफाई कामगार मर्यादित संस्था में लगभग 88.11 लाख रुपये के कथित आर्थिक घोटाले के मामले में शासन के मान्यता प्राप्त पैनल ऑडिटर दिलीप गोविंदराव रोहणकर को जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय भट्टाचार्य ने अग्रिम जमानत प्रदान की है. न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि ऑडिटर द्वारा प्रस्तुत लेखा परीक्षण रिपोर्ट में उन्हीं अनियमितताओं का स्पष्ट उल्लेख किया गया था, जिनके आधार पर बाद में आपराधिक मामला दर्ज किया गया.
गौरतलब है कि सिटी कोतवाली पुलिस थाने में अपराध क्रमांक 244/2026 के तहत भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराओं के समकक्ष पूर्व भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420 एवं 34 के तहत 12 आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है. यह कार्रवाई जिला विशेष लेखा परीक्षक वर्ग-1, अमरावती की रिपोर्ट के आधार पर की गई थी.
* 88 लाख रुपये से अधिक के गबन का आरोप
शिकायत के अनुसार संस्था के तत्कालीन सचिव मनोज भिकाजी सिरसिया तथा अन्य पदाधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने अपने और अपने रिश्तेदारों के लाभ के लिए ऋण वितरण प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं कीं तथा संस्था के लगभग 88 लाख 11 हजार 951 रुपये के निधि का दुरुपयोग किया. मामले में वर्ष 2022-23 का ऑडिट करने वाले शासन मान्यता प्राप्त लेखा परीक्षक दिलीप रोहणकर पर भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने अनियमितताओं की जानकारी होने के बावजूद महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम, 1960 की धारा 81 के तहत उचित लेखा परीक्षण नहीं किया तथा संदिग्ध रिपोर्ट प्रस्तुत की.
* बचाव पक्ष ने रखा यह पक्ष
अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान ऑडिटर की ओर से अधिवक्ता अनिल विश्वकर्मा ने न्यायालय के समक्ष दलील दी कि उनके मुवक्किल ने समय पर ऑडिट पूरा कर रिपोर्ट प्रस्तुत की थी. रिपोर्ट में ऋण वितरण में अनियमितता, बकाया ऋणों का विवरण, अधिकारों के दुरुपयोग, ऋण आवेदन संबंधी त्रुटियों तथा वसूली प्रक्रिया में कमियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया था. उन्होंने यह भी बताया कि ऑडिट रिपोर्ट में संबंधित पदाधिकारियों से तीन माह के भीतर स्पष्टीकरण मांगने तथा आवश्यक होने पर कानूनी कार्रवाई करने की सिफारिश भी की गई थी. ऐसे में अपहार को छिपाने या किसी आरोपी को बचाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता.
* सरकार ने किया विरोध
सरकारी पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि मामला गंभीर आर्थिक अपराध से जुड़ा है और ऑडिटर ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर भ्रामक ऑडिट रिपोर्ट तैयार की. साथ ही जांच के लिए आवश्यक दस्तावेजों की बरामदगी अभी शेष होने का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत का विरोध किया गया.
* अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि जिस ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर अनियमितताओं का मामला सामने आया, उसी रिपोर्ट में संबंधित त्रुटियों और वित्तीय गड़बड़ियों का उल्लेख पहले से मौजूद है. न्यायालय ने कहा कि यदि ऑडिटर ने वास्तव में अन्य आरोपियों के साथ मिलीभगत की होती तो वे अपनी रिपोर्ट में इतनी गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख नहीं करते. प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्होंने कथित अपहार को छिपाने का प्रयास किया हो. अदालत ने यह भी कहा कि मामले के अधिकांश साक्ष्य दस्तावेजी स्वरूप में हैं और संबंधित कार्यालयों के पास उपलब्ध हैं. जांच एजेंसी आवश्यक होने पर इन दस्तावेजों को जब्त कर सकती है, इसलिए आरोपी की हिरासत में पूछताछ की तत्काल आवश्यकता प्रतीत नहीं होती.
* कानूनी हलकों में चर्चा
अदालत के इस आदेश के बाद कानूनी हलकों में चर्चा है कि किसी लेखा परीक्षक द्वारा अपने ऑडिट प्रतिवेदन में अनियमितताओं का स्पष्ट उल्लेख किए जाने के बावजूद उस पर आपराधिक दायित्व तय करने के लिए ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य आवश्यक होंगे. न्यायालय की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ मानी जा रही है. मामले में आरोपी की ओर से अधिवक्ता अनिल विश्वकर्मा ने पैरवी की. उन्हें अधिवक्ता मनोज नरवाडे, नम्रता साहू, ऋतुराज भोरे, आर्यन विश्वकर्मा, प्रतीक सगणे तथा समृद्धि जाधव का सहयोग प्राप्त हुआ.

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