विधान परिषद चुनाव को लेकर भाजपा में मंथन तेज

पुराने चेहरों की पुनरावृत्ति या नए नामों पर दांव?

नागपुर/दि.25 – महाराष्ट्र विधान परिषद की आगामी चुनावी प्रक्रिया को लेकर भाजपा के भीतर हलचल तेज हो गई है. नौ सीटों में से छह सीटें भाजपा के खाते में आने की संभावना है, ऐसे में पार्टी के भीतर दावेदारों की लंबी कतार लग गई है. खासकर विदर्भ से कई वरिष्ठ नेताओं के नाम चर्चा में हैं, जिससे राजनीतिक हलकों में उत्सुकता और धाकधूक दोनों बढ़ गई है. सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर है कि भाजपा मौजूदा विधान परिषद सदस्यों को दोबारा मौका देगी या फिर नए चेहरों पर दांव लगाएगी. पार्टी के भीतर इस समय यही सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है.
* संदीप जोशी और दादाराव केचे की राह आसान नहीं
भाजपा के मौजूदा विधान परिषद सदस्य संदीप जोशी और दादाराव केचे का कार्यकाल अपेक्षाकृत कम रहा है. ऐसे में यह माना जा रहा था कि दोनों को पुनः अवसर मिल सकता है, लेकिन पार्टी के भीतर नए नामों की मजबूत दावेदारी ने उनकी राह कठिन बना दी है. संदीप जोशी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी माने जाते हैं. कुछ समय पहले उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की इच्छा जताई थी, लेकिन बाद में फडणवीस से चर्चा के बाद उन्होंने अपना निर्णय टाल दिया. इससे संकेत मिले कि पार्टी अब भी उन्हें महत्व दे रही है. वहीं दादाराव केचे को विधानसभा टिकट नहीं मिलने के बाद विधान परिषद के माध्यम से पुनर्वास दिया गया था. वर्धा जिले में उनकी सामाजिक पकड़ को देखते हुए उन्हें फिर मौका मिल सकता है, लेकिन यह पूरी तरह नेतृत्व के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगा.
* नए चेहरों की मजबूत दावेदारी
यदि भाजपा पुराने चेहरों को दोहराने से बचती है, तो कई नए नाम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. इनमें प्रमुख रूप से माजी विधायक अनिल सोले, डॉ. राजीव पोतदार, डॉ. उपेंद्र कोठेकर, प्रा. संजय भेंडे और माजी महापौर दयाशंकर तिवारी के नाम चर्चा में हैं. अनिल सोले का नाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछली बार उनका टिकट काटकर संदीप जोशी को मौका दिया गया था, लेकिन बाद में जोशी चुनाव हार गए. ऐसे में सोले समर्थक इसे राजनीतिक न्याय का अवसर मान रहे हैं. डॉ. राजीव पोतदार भी मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं. सावनेर विधानसभा क्षेत्र से टिकट नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने संगठन के लिए काम जारी रखा. अब उनके समर्थन में जिला भाजपा पदाधिकारियों ने खुलकर मोर्चा खोल दिया है और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को ज्ञापन सौंपकर उन्हें मौका देने की मांग की है.
* दयाशंकर तिवारी को मिल सकता है लाभ
नागपुर शहर भाजपा अध्यक्ष और पूर्व महापौर दयाशंकर तिवारी का नाम भी तेजी से उभरा है. उन्होंने संगठन में लगातार सक्रिय भूमिका निभाई है. माना जा रहा है कि भाजपा यदि नागपुर शहर में हिंदी भाषी मतदाताओं को साधने की रणनीति बनाती है, तो तिवारी को मौका मिल सकता है.
* निष्ठावान नेताओं पर भी नजर
डॉ. उपेंद्र कोठेकर और प्रा. संजय भेंडे भी पार्टी के पुराने, निष्ठावान और संगठननिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं. लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे इन दोनों नेताओं के नाम पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है. पार्टी नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि निष्ठा, संगठन और सामाजिक समीकरणों में संतुलन कैसे बनाया जाए.
* महिला कोटे से निवेदिता चौधरी का नाम आगे
भाजपा के भीतर महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर भी चर्चा चल रही है. सूत्रों के अनुसार, इस बार दो सीटें महिला कोटे से देने पर गंभीर मंथन हो रहा है. ऐसे में पश्चिम विदर्भ से अमरावती की पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष निवेदिता चौधरी का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है. यदि नागपुर या पूर्व विदर्भ से एक नाम तय होता है, तो दूसरी सीट पश्चिम विदर्भ को दी जा सकती है, जिससे निवेदिता चौधरी की संभावनाएं मजबूत मानी जा रही हैं.
* बच्चू कडू पर भाजपा असहज
इस बीच प्रहार जनशक्ति पार्टी के नेता बच्चू कडू को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं. उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की ओर से उन्हें विधान परिषद की पेशकश की चर्चा है, लेकिन भाजपा के भीतर उनके नाम को लेकर असहजता बताई जा रही है. सूत्रों के अनुसार, बच्चू कडू के आक्रामक आंदोलन और सरकार पर दबाव बनाने की शैली भाजपा के कुछ नेताओं को असुविधाजनक लगती है. ऐसे में यदि शिंदे गुट बच्चू कडू को आगे बढ़ाता है, तो भाजपा के भीतर मतभेद उभर सकते हैं.
* अंतिम फैसला नेतृत्व के हाथ
फिलहाल भाजपा के भीतर दावेदारों की संख्या अधिक और सीटें सीमित हैं. ऐसे में अंतिम फैसला पूरी तरह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर करेगा. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा अनुभव और निष्ठा को प्राथमिकता देती है या फिर सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के लिए नए चेहरों पर दांव खेलती है. महाराष्ट्र विधान परिषद की यह लड़ाई केवल सीटों की नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन की भी परीक्षा मानी जा रही है.

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