भक्त कवियों ने श्रीकृष्ण का रस-राजस्व किया सिद्ध
हरिचंद मंगलम में अष्टसखा चरित्रामृत कथा महोत्सव

पू.पा.गो. श्री हरिराय जी महोदय श्री द्वारा वचनामृत
अमरावती/दि.2 – प. पू. 108 श्री पुरूषोत्तमजी महाराज श्री की आज्ञानुसार श्री गोवर्धननाथ जी हवेली सत्संग मंडल द्बारा सप्तदिवसीय अष्टसखा चरित्रामृत का आयोजन बडनेरा रोड स्थित हरिचंद मंगलम में प्रारंभ हुआ. प्रथम दिवस आयोजन निमित्त भव्य व अलौकिक शोभायात्रा भैया इंडस्ट्रीज बडनेरा रोड से प्रारंभ होकर हरिचंद्र मंगलम तापडिया सिटी सेंटर के सामने तक प्रस्थान की. शोभायात्रा हेतु सभी महिला पुरूष वैष्णव भैया इंडस्ट्रीज पर एकत्रित हुए. शोभायात्रा में प.पू. 108 गोस्वामी श्री हरिरायजी महोदय श्री सुसज्जीत रथ पर विराजमान थे. महिलाएं मंगल कलश सिरोधार्य कर कतारबध्द होकर शोभायात्रा की गरिमा बनाते हुए आगे बढ रही थी.
नाथद्बारा के श्रीनाथजी के अष्टसखा श्री कुंभनदास, श्री सुरदास जी श्री कृष्णदासजी, श्री परमानंद दास जी, श्री गोविंद स्वामी श्री नंददासजी, श्री चतुर्भुुजदास जी श्री छित स्वामी जी की सुंदर व मनमोहक झांकियां विभिन्न वाहनों में सजकर शोभायात्रा की शान बढा रही थी. सनातन धर्म के प्रचारक झांकी भी शोभायात्रा का क्रम बनी थी. अमरावती शहर में इस तरह का भव्य दिव्य व अलौकिक आयोजन पहली बार होने से समस्त वैष्णवों में अपार उत्साह परिलक्षित हो रहा था.
गोस्वामी श्री विठ्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्ग को सुदृढ बनाया. भगवान श्रीकृष्ण की सेवा में रहकर आपने जीवन की कलाकारिता काव्य कुशलता तथा संगीत की निपुणता को कृष्णभक्ति में न्यौछावार कर दिया. श्री महाप्रभु जी के चार शिष्यों कुंभनदास, सूरदास, कृष्णदास और परमानंद दास और विठ्ठलनाथ जी के स्वयं के चार शिष्य गोविंद स्वामी, चतुर्भजुदास तथा नंददास को शामिल कर आपने अष्टछाप की स्थापना की. इन कवियो को अष्टछाप की पवित्र आसन्दी पर विराजमान कर साहित्य क्षेत्र में क्रांति कर दी. इन भक्त कवियों ने श्रीकृष्ण का रस राजस्व सिध्द कर दिया. उनके 252 वैष्णव भक्तों ने अष्टसखाओं का विशेष स्थान है. श्री वल्लभाचार्यजी ने पुष्टिमार्ग भगवत साधना की आठ झांकियों के अलग-अलग आठ कीर्तनकार नियुक्त किए.
* आठ समय के दर्शनों में
आठ समय के दर्शनों में मंगला में अनुराग भाव जगाने के पद हेतु परमानंददास, श्रृंगार में बालरूप सौंदर्य, वेशभूषा व बालक्रीडा के लिए नंददास,ग्वालभोग में सखाभाव गोचारण, माखनचोरी के पदगान हेतु गोविंददास, राजभोग में छाक के पद के लिए कुंभनदास, उत्थापन में गोन्टेरन और वन्य लीला के पद हेतु सूरदास भोग में प्रभु के रूप में वर्णन, मुरली, रूप माधुर्य आशीर्वाद नेत्रों से मिलता है. हाथों से नहीं यही बात श्री बल्लभाचार्य जी ने सुबोधिनी जी से कहा है. गोवर्धननाथ श्री नाथ जी है. गोवर्धन धर श्री विठ्ठलनाथ जी है. यह अंतर स्पष्ट किया. किसी भी कार्य को करने से पूर्व प्रभु का स्मरण करना चाहिए. सेवा के विभिन्न प्रकार है. किंतु प्रतिदिन एक सेवा निश्चित करना चाहिए. भक्ति ऐसी होनी चाहिए कि प्रभु हमें ढूंढे. कुंभनदास जी प्रागटय चंदु सरोवर के पास हुआ. कुंभ के मेले में प्राप्त वरदान स्वरूप प्रागट्य होने से आपका नाम कुंभनदास हुआ.
जगत के कण-कण में भगवान बसा है. किंतु उसके नियम भगवान को लागू नहीं होते. जब तक आपका आधार तैयार नही होगा. सुदृढता नहीं आएगी. श्री वल्लाभाचार्यजी व कृष्णजी का प्रथम मिलन का दर्शन कराया. वहीं पर कुंभनदास जी ब्रम्ह संबंध लिया तथा ब्रजभाषा में लिखा पहल यह गाथा तथा श्री वल्लभाचार्य जी ने उन्हें कीर्तन की सेवा प्रदान की.
‘मंगला के दर्शन कराते हुए पद गाया
‘सांझ के सांचे बोल तिहारे’
आतुर भये नीलपट ओढे
पिले बसन बिसारे’
सांझ के सांचे बोल तिहारे
(प्रस्तुति – श्याम दम्मानी नीलेश)





