इलाज में नैतिकता, मरीजों को राहत

भारत में लाखों परिवार बीमारी से तो उबर जाते हैं, लेकिन इलाज पर होने वाला खर्च उन्हें आर्थिक संकट में धकेल देता है. अस्पतालों के भारी-भरकम बिल और महंगी दवाएं कई परिवारों को कर्ज के जाल में फंसा देती हैं. ऐसे में यदि मरीज के इलाज का फैसला भी दवा कंपनियों के व्यावसायिक हितों से प्रभावित होने लगे, तो समस्या और गंभीर हो जाती है. दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को उपहार, महंगी सुविधाएं और विदेश यात्राएं उपलब्ध कराने जैसी कथित अनैतिक गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है. यह केवल चिकित्सा जगत की नैतिकता का सवाल नहीं, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है.
संसद में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार, निजी अस्पताल में भर्ती होकर इलाज कराने का औसत खर्च 50,508 रुपये, जबकि सरकारी अस्पताल में यह खर्च 6,631 रुपये बताया गया है. यह अंतर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और सामर्थ्य से जुड़ी चुनौतियों को उजागर करता है. ऐसे में डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा का चयन यदि उसके चिकित्सकीय गुणों के बजाय किसी कंपनी से मिलने वाले लाभ से प्रभावित होता है, तो मरीज के हितों के साथ सीधा समझौता होता है. मरीज डॉक्टर पर भरोसा करके दवा खरीदता है. उसे यह जानने का अवसर भी नहीं मिलता कि उसे वही दवा क्यों लिखी गई और क्या उसका कोई सस्ता, समान रूप से प्रभावी विकल्प उपलब्ध है.
केंद्र सरकार ने मार्च 2024 में दवा विपणन की नैतिक प्रथाओं के लिए एक समान संहिता जारी की थी. इसके तहत डॉक्टरों और उनके परिवारों को उपहार देने तथा सम्मेलनों या कार्यशालाओं के नाम पर अनुचित यात्रा-सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने का प्रावधान है. लेकिन किसी संहिता की उपयोगिता उसके अस्तित्व से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी पालन से तय होती है. नियमों के उल्लंघन पर जवाबदेही और कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था न हो, तो ऐसे प्रावधान कागजों तक सीमित रह सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस विषय पर केंद्र को समिति गठित करने का निर्देश इसी कमी को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है.
दवा कंपनियों के बीच अपने उत्पादों को बढ़ावा देने की प्रतिस्पर्धा व्यावसायिक गतिविधि का हिस्सा है, लेकिन उसका प्रभाव डॉक्टर के स्वतंत्र चिकित्सकीय निर्णय पर नहीं पड़ना चाहिए. अमेरिका में दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों को दिए जाने वाले भुगतान और अन्य लाभों का सार्वजनिक रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था है. भारत में भी पारदर्शिता बढ़ाने, शिकायतों की निष्पक्ष जांच करने और उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई के उपाय मजबूत किए जाने चाहिए.
यह भी समझना होगा कि मार्केटिंग और प्रचार पर होने वाला खर्च अंततः दवाओं की कीमतों तथा कारोबारी गणना को प्रभावित कर सकता है. इसका बोझ मरीज पर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. इसलिए समाधान केवल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए. सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता, दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी और डॉक्टरों को अनावश्यक व्यावसायिक दबाव से मुक्त रखना भी जरूरी है.
चिकित्सा सेवा का केंद्र मरीज होना चाहिए, दवा कंपनी का मुनाफा नहीं. डॉक्टर और मरीज के बीच भरोसा किसी उपहार या व्यावसायिक प्रलोभन से प्रभावित होता है, तो नुकसान केवल एक व्यक्ति का नहीं, पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता का होता है. दवा कंपनियों की जवाबदेही तय करना और नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करना ही मरीजों को अनावश्यक खर्च और हितों के टकराव से बचाने का वास्तविक उपचार है.





