कैसे सार्थक होगा लोकसेवा आयोग का शतकीय सफर

सरकारी नौकरी का आकर्षण कम क्यों नहीं होता? क्या यह आकर्षण वास्तव में ‘लोकसेवा’ का है या फिर सरकारी पद से मिलने वाले अधिकार, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और सुरक्षित करियर का? यह सवाल संघ लोकसेवा आयोग यानी यूपीएससी की शताब्दी के अवसर पर और अधिक प्रासंगिक हो जाता है. क्योंकि किसी भी लोकसेवा व्यवस्था की असली ताकत केवल इस बात में नहीं होती कि वह कितने अधिकारियों का चयन करती है, बल्कि इस बात में होती है कि समाज उस चयन प्रक्रिया को कितना निष्पक्ष और विश्वसनीय मानता है.
बता दे कि, 1 अक्तूबर 1926 को भारत में पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना हुई थी. बाद में 1937 में इसका नाम फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन और संविधान लागू होने के बाद 1950 में संघ लोकसेवा आयोग यानी यूपीएससी हुआ. इस संवैधानिक संस्था की स्थापना का मूल उद्देश्य यही था कि सरकारी सेवाओं में नियुक्तियां राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रभाव से दूर, योग्यता और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर हों.
यूपीएससी की यात्रा ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक जरूरतों से शुरू हुई, लेकिन स्वतंत्र भारत में उसे एक अलग संवैधानिक अर्थ मिला. संविधान ने लोकसेवा आयोग को स्वतंत्र दर्जा इसलिए दिया कि, सरकारी सेवाओं में चयन पर राजनीतिक हस्तक्षेप और पक्षपात की संभावना कम की जा सके. सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में जो भूमिका निभाई, उसमें निष्पक्ष और सक्षम नौकरशाही को विशेष महत्व था. आज भी इसी व्यवस्था को भारतीय प्रशासन की रीढ़ माना जाता है. लेकिन सौ वर्ष की इस यात्रा का उत्सव मनाते समय केवल उपलब्धियों का गुणगान पर्याप्त नहीं है. असली सवाल यह है कि, जिस व्यवस्था पर देश के लाखों युवा अपना भविष्य दांव पर लगाते हैं, उस व्यवस्था में उनका विश्वास कितना मजबूत है?
यूपीएससी की शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी संदर्भ में कहा कि लोकसेवा में ऐसे युवाओं को आना चाहिए जो ‘पब्लिक ऑफिस’ से नहीं, ‘पब्लिक सर्विस’ से प्रेरित हों. उन्होंने यह भी कहा कि चयन प्रक्रिया को केवल उम्मीदवार की जानकारी नहीं, बल्कि इस बात को भी परखना चाहिए कि वह सिविल सेवा में क्यों आना चाहता है. यह सवाल वास्तव में पूरी व्यवस्था के केंद्र में है. उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर तेजी से बढ़े. बैंकिंग, वित्त, सूचना प्रौद्योगिकी, विमानन, उद्योग और सेवा क्षेत्र में आकर्षक वेतन और करियर के विकल्प उपलब्ध हुए. इसके बावजूद सरकारी नौकरी का आकर्षण कायम है. इसका एक कारण निश्चित रूप से रोजगार की सुरक्षा है. लेकिन इसके साथ सरकारी पद से जुड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रशासनिक अधिकार और निर्णय लेने की शक्ति भी महत्वपूर्ण कारक हैं. इसलिए यह मान लेना पर्याप्त नहीं होगा कि हर युवा केवल देशसेवा के लिए सरकारी नौकरी चाहता है और दूसरी ओर यह मानना भी उचित नहीं होगा कि सरकारी सेवा में आने वाला हर व्यक्ति केवल सुविधा या अधिकार के लिए आता है. बड़ी संख्या में अधिकारी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ काम करते हैं.
समस्या व्यक्ति से अधिक व्यवस्था और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता की है. लोकतांत्रिक प्रशासन में व्यक्ति से ज्यादा व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है. जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने आधुनिक नौकरशाही को नियम आधारित व्यवस्था के रूप में समझाया था, जिसमें निर्णय किसी व्यक्ति की पसंद या नापसंद के बजाय निर्धारित नियमों के आधार पर होते हैं. यही ‘निष्पक्ष प्रशासन’ का मूल है. अधिकारी बदलते रहें, सरकारें बदलती रहें, लेकिन नियम और संस्थागत मर्यादाएं कायम रहें, तभी प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत रह सकती है. यहीं से लोकसेवा आयोग की भूमिका शुरू होती है.
हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि इस व्यवस्था के सामने चुनौतियां मौजूद हैं. महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग को लेकर अभ्यर्थियों की शिकायतों के बाद राज्य सरकार ने आयोग के वर्तमान और पूर्व अध्यक्षों तथा सदस्यों के कामकाज की न्यायिक जांच कराने की घोषणा की है. आयोग के सचिव के तबादले और भर्ती प्रक्रिया में सुधार के भी निर्णय घोषित किए गए हैं. यह किसी व्यक्ति विशेष के दोष या निर्दोष होने का अंतिम निष्कर्ष नहीं है. लेकिन जब अभ्यर्थियों को आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाने की आवश्यकता महसूस होती है, तब संस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती विश्वास की बहाली बन जाती है. कर्नाटक में भी लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को लेकर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हुई है. इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य लोकसेवा आयोगों के कामकाज में संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है.
यूपीएससी के सामने भी चुनौतियां नहीं हैं, ऐसा कहना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा. पूजा खेडकर प्रकरण इसका प्रमुख उदाहरण है. जांच के बाद यूपीएससी ने उनकी 2022 की सिविल सेवा परीक्षा की उम्मीदवारी रद्द कर दी और उन्हें भविष्य की सभी परीक्षाओं एवं चयन प्रक्रियाओं से स्थायी रूप से प्रतिबंधित किया. आयोग ने इसके बाद 2009 से 2023 तक के 15 वर्षों में अनुशंसित 15 हजार से अधिक उम्मीदवारों के उपलब्ध आंकड़ों की भी जांच की. ऐसी घटनाएं यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि परीक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है, दस्तावेजों का सत्यापन कितना प्रभावी है और गड़बड़ी सामने आने के बाद कार्रवाई कितनी शीघ्र होती है. इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी संस्था अविश्वसनीय है. बल्कि इसका अर्थ यह है कि इतनी महत्वपूर्ण संस्था को लगातार अपनी प्रक्रियाओं को मजबूत करते रहना होगा.
यूपीएससी की शताब्दी पर आयोग ने भी परीक्षा सुधार, तकनीक, पारदर्शिता और उम्मीदवारों की तर्क क्षमता तथा अनिश्चित परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता को अधिक महत्व देने की दिशा में विचार रखा है. डिजिटल प्रवेश पत्र, चेहरे की पहचान जैसी तकनीकी व्यवस्थाओं पर भी काम हो रहा है. यह स्वागतयोग्य दिशा है, लेकिन तकनीक अकेले भरोसा नहीं बना सकती. भरोसा तब बनेगा जब अभ्यर्थी को यह विश्वास हो कि परीक्षा में उसकी मेहनत किसी सिफारिश, प्रभाव, आर्थिक क्षमता या प्रशासनिक चूक से कमतर नहीं होगी.
आज लाखों युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं. कई बार एक परीक्षा के लिए कई वर्ष निकल जाते हैं. ऐसे में परीक्षा की तारीख, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन, नियुक्ति और शिकायत निवारण, हर स्तर पर पारदर्शिता जरूरी है. आयोगों की स्वायत्तता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार से स्वतंत्रता के बिना निष्पक्ष चयन की धारणा कमजोर पड़ सकती है. लेकिन स्वायत्तता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं हो सकता.
यूपीएससी की शताब्दी इसलिए केवल गौरव का अवसर नहीं, आत्ममंथन का भी अवसर है. यदि प्रधानमंत्री स्वयं यह सवाल उठा रहे हैं कि लोकसेवा में आने वाला युवा ‘पद’ से आकर्षित है या ‘सेवा’ से, तो अगला सवाल यह होना चाहिए कि पूरी भर्ती व्यवस्था उस सेवा-भावना को कैसे पहचान पाएगी. सरकारी नौकरी को ‘नौकरी’ से आगे ‘लोकसेवा’ बनाने की जिम्मेदारी केवल अभ्यर्थी की नहीं है. प्रशिक्षण संस्थानों, आयोगों, सरकारों और स्वयं प्रशासनिक व्यवस्था की भी उतनी ही जिम्मेदारी है. जिस अधिकारी को जनता के जीवन से जुड़े निर्णय लेने हैं, उसके चयन में ज्ञान के साथ संवेदनशीलता, ईमानदारी, निर्णय क्षमता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व को महत्व देना होगा.
यूपीएससी की शताब्दी पर सिक्का और डाक टिकट जारी करना विरासत का सम्मान है, लेकिन इस संस्था की वास्तविक शताब्दी तभी सार्थक होगी, जब आने वाली पीढ़ियों का भरोसा पहले से अधिक मजबूत हो. लोकसेवा आयोग की शताब्दी पूरी हुई है. अब चुनौती यह है कि ‘लोकसेवा’ की विश्वसनीयता की शताब्दी भी पूरी हो और वह केवल समारोहों में नहीं, बल्कि हर परीक्षा कक्ष, हर चयन सूची और हर सरकारी कार्यालय में दिखाई दे.





