जिला स्त्री अस्पताल में आज तक शुरू नहीं हुआ आयसीयू

डफरीन अस्पताल अग्निकांड ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और बड़ी खामी

* नवजातों के बाद अब माताओं की सुरक्षा पर सवाल
* सात महीनों में 26 गंभीर माताएं इर्विन रेफर, चार की मौत
अमरावती/दि.24 – अमरावती के डफरीन अस्पताल के नवजात शिशु अतिदक्षता विभाग (एनआयसीयू) में सोमवार तड़के हुए भीषण अग्निकांड ने जहां तीन नवजात बच्चों की जान ले ली, वहीं इस हादसे ने जिला स्त्री अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की कई गंभीर खामियों को भी उजागर कर दिया है. आग, फायर सेफ्टी, उपकरणों के रखरखाव और प्रशासनिक जवाबदेही के सवालों के बीच अब एक और अत्यंत गंभीर मुद्दा सामने आया है कि जिले के सबसे बड़े महिला अस्पताल में आज तक माताओं के लिए समर्पित अतिदक्षता विभाग (आयसीयू) शुरू नहीं हो सका है.
एक ओर नवजातों की सुरक्षा पर प्रश्न उठ रहे हैं, तो दूसरी ओर गंभीर अवस्था में पहुंचने वाली गर्भवती महिलाओं और प्रसूताओं को उपचार के लिए दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ रहा है. आंकड़े बताते हैं कि जनवरी से जुलाई 2026 के बीच डफरीन अस्पताल से 26 गंभीर महिलाओं को जिला सामान्य अस्पताल (इर्विन) भेजना पड़ा, जिनमें से चार महिलाओं की मौत हो गई. ऐसे में अब यह सवाल और भी तीखा हो गया है कि आखिर माताओं की जान बचाने के लिए आवश्यक खउण सुविधा कब शुरू होगी?
* एनआयसीयू अग्निकांड ने उजागर की अस्पताल व्यवस्था की कमजोरियां
सोमवार तड़के डफरीन अस्पताल की चौथी मंजिल पर स्थित एनआयसीयू विभाग में अचानक आग लग गई. प्रारंभिक जानकारी के अनुसार वेंटिलेटर अथवा किसी विद्युत उपकरण में तकनीकी खराबी के कारण धमाका हुआ और कुछ ही क्षणों में पूरा वार्ड धुएं से भर गया. घटना के समय एनआयसीयू की तीन विंगों में कुल 39 नवजात भर्ती थे. डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों ने जान जोखिम में डालकर 36 बच्चों को बचा लिया, लेकिन तीन नवजातों की दर्दनाक मौत हो गई. छह अन्य बच्चे घायल हुए.
इस हादसे ने अस्पताल की फायर सेफ्टी व्यवस्था, स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर ऑडिट, बंद लिफ्टों और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. लेकिन इसी के साथ यह भी सामने आया कि अस्पताल में नवजातों के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं का दावा किया जाता है, जबकि गंभीर माताओं के लिए आयसीयू जैसी बुनियादी और जीवनरक्षक सुविधा तक उपलब्ध नहीं है.
* माताओं की जान बचाने के लिए आयसीयू आज भी सपना
डफरीन अस्पताल पूरे अमरावती जिले सहित आसपास के कई जिलों की महिलाओं के लिए प्रमुख प्रसूति केंद्र है. यहां प्रतिदिन लगभग 20 से 25 प्रसूतियां होती हैं. इनमें बड़ी संख्या में सिजेरियन ऑपरेशन भी शामिल होते हैं. प्रसूति के बाद अत्यधिक रक्तस्राव, रक्तचाप में अचानक गिरावट या वृद्धि, हृदय संबंधी जटिलताएं, श्वसन संकट, संक्रमण और अन्य गंभीर चिकित्सीय स्थितियां उत्पन्न होने पर मरीज को तत्काल आयसीयू उपचार की आवश्यकता पड़ती है. चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी परिस्थितियों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है. कई बार कुछ मिनटों की देरी भी मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है. इसके बावजूद अमरावती के जिला स्त्री अस्पताल में आज तक माताओं के लिए आयसीयू सुविधा शुरू नहीं हो सकी है.
* सात महीनों में 26 गंभीर महिलाएं इरविन रेफर
प्राप्त जानकारी के अनुसार जनवरी से जुलाई 2026 के बीच डफरीन अस्पताल से 26 गंभीर महिलाओं को उपचार के लिए इरविन अस्पताल भेजा गया. इनमें से 13 महिलाओं को आयसीयू उपचार की आवश्यकता थी. सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन गंभीर मामलों में चार महिलाओं की मौत हो गई. इन मौतों ने अस्पताल प्रशासन की तैयारियों और स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
* चार माताओं की मौत ने बढ़ाई चिंता
उपलब्ध जानकारी के अनुसार जनवरी महीने में एक महिला की मृत्यु हुई थी. इसके बाद 31 जुलाई को 28 वर्षीय गर्भवती गीता चव्हाण की मौत हो गई. 7 अगस्त को 23 वर्षीय भारती वानखड़े की इरविन अस्पताल पहुंचने के कुछ समय बाद मृत्यु हो गई. इसके अलावा एक अन्य महिला को मृत अवस्था में ही इरविन अस्पताल लाया गया था. स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डफरीन अस्पताल में आयसीयू सुविधा उपलब्ध होती और मरीजों को तत्काल अतिदक्षता उपचार मिल जाता, तो इनमें से कुछ मामलों में जान बचाने की संभावना अधिक हो सकती थी.
* डेढ़ साल पहले हुआ था आयसीयू का वादा
सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि डफरीन अस्पताल में आयसीयू शुरू करने की घोषणा कोई नई नहीं है. अस्पताल की पुरानी इमारत में आयसीयू शुरू करने की योजना बनी थी, लेकिन वह कभी साकार नहीं हो सकी. बाद में नई इमारत में 10 बिस्तरों वाला आधुनिक आयसीयू शुरू करने की घोषणा की गई. उस समय कहा गया था कि महिलाओं के लिए विशेष अतिदक्षता विभाग स्थापित किया जाएगा. लेकिन इस घोषणा को अब लगभग डेढ़ वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और आयसीयू अब तक शुरू नहीं हो पाया है.
* आखिर आयसीयू शुरू होने में दिक्कत कहां?
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों और नागरिकों के बीच अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब अस्पताल में जगह उपलब्ध है, स्त्री रोग विशेषज्ञ और फिजिशियन कार्यरत हैं, तो फिर आयसीयू शुरू होने में आखिर बाधा क्या है, क्या समस्या उपकरणों की है, क्या प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है, क्या तकनीकी मंजूरी नहीं मिली, क्या प्रशासनिक प्रक्रियाएं अधूरी हैं, या फिर मामला केवल सरकारी फाइलों में अटका हुआ है. इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर आज तक सामने नहीं आया है.
* आज 26 महिलाएं रेफर हुईं, कल कितनी होंगी?
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि डफरीन अस्पताल जैसी संस्था में आयसीयू का अभाव केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मातृ सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है. उनका सवाल है कि जब सात महीनों में 26 महिलाओं को रेफर करना पड़ा, तो आने वाले महीनों में यह संख्या कितनी होगी? हर बार गंभीर मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने में समय लगता है. एम्बुलेंस की उपलब्धता, यातायात, रास्ते की दूरी और मरीज की हालत, ये सभी कारक उपचार में देरी का कारण बनते हैं. ऐसी स्थिति में अस्पताल परिसर में ही आयसीयू उपलब्ध होना अनिवार्य माना जाता है.
* नवजातों के बाद अब माताओं की सुरक्षा पर भी प्रश्न
डफरीन अस्पताल का हालिया अग्निकांड पहले ही अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर चुका है. जांच के दायरे में फायर ऑडिट, स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर अलार्म, विद्युत व्यवस्था, उपकरणों का रखरखाव और बंद पड़ी लिफ्टें हैं. अब आयसीयू की अनुपलब्धता का मुद्दा सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और बड़ी कमजोरी उजागर हो गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आधुनिक महिला अस्पताल में एनआयसीयू और मातृ आयसीयू दोनों समान रूप से आवश्यक होते हैं. यदि एक तरफ नवजातों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है तो दूसरी तरफ प्रसूता महिलाओं का जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
* सबसे बड़ा सवाल: आखिर कब शुरू होगा माताओं का आयसीयू?
आज डफरीन अस्पताल के बाहर केवल तीन नवजातों की मौत का दुख नहीं है, बल्कि उन माताओं का भी सवाल है जिन्हें गंभीर हालत में दूसरे अस्पताल भेजा जाता है. जब अस्पताल में रोज 20 से 25 प्रसूतियां होती हैं, बड़ी संख्या में सिजेरियन ऑपरेशन किए जाते हैं और हर महीने गंभीर मरीज सामने आते हैं, तब आयसीयू का अभाव समझ से परे दिखाई देता है. एनआयसीयू अग्निकांड ने स्वास्थ्य व्यवस्था की जिन परतों को खोला है, उनमें मातृ आयसीयू का मुद्दा सबसे गंभीर बनकर सामने आया है. अब सवाल केवल इतना नहीं है कि एनआयसीयू में आग कैसे लगी, बल्कि यह भी है कि आखिर महिलाओं की जान बचाने के लिए आवश्यक आयसीयू सुविधा कब शुरू होगी? क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं होती, कई बार उसकी कीमत किसी मां को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है.

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