‘अगर मैं नहीं, तो कौन?’
तुकाराम मुंढे ने नौकरशाही को दिखाया आईना

* अधिकारियों की जिम्मेदारी पर रखी स्पष्ट राय
मुंबई/नागपुर/दि.21 – महाराष्ट्र के चर्चित आईएएस अधिकारी और वर्तमान खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) आयुक्त तुकाराम मुंढे ने प्रशासनिक व्यवस्था, नौकरशाही और जनता के प्रति अधिकारियों की जिम्मेदारी पर बेबाक विचार व्यक्त किए हैं. हाल के दिनों में खाद्य मिलावट और खाद्य सुरक्षा संबंधी कार्रवाईयों के कारण चर्चा में रहे मुंढे ने कहा कि किसी भी लोकतंत्र में व्यक्ति से अधिक संस्थाएं महत्वपूर्ण होती हैं और एक सिविल सर्वेंट की पहचान उसके पद या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि संविधान और जनता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से तय होती है.
‘इंडिया एट 100’ कार्यक्रम में बोलते हुए मुंढे ने कहा कि उन्हें केवल ‘बाबू’ या ‘ब्यूरोक्रेट’ कहलाना पसंद नहीं है. उनके अनुसार, सिविल सर्वेंट का मूल दायित्व जनता की सेवा करना और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप काम करना है. उन्होंने कहा कि नौकरशाही को अक्सर निष्क्रिय, आत्मसंतुष्ट और बदलाव का विरोध करने वाली व्यवस्था के रूप में देखा जाता है, लेकिन इस धारणा को बदलने की जिम्मेदारी पूरी सिविल सेवा की है. मुंढे ने कहा कि किसी भी सरकारी नीति की सफलता कागजों पर नहीं, बल्कि उसके जमीनी परिणामों से आंकी जानी चाहिए. आम नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना ही प्रशासन का वास्तविक उद्देश्य है. वरिष्ठ अधिकारी नीति निर्माण में भूमिका निभाते हैं, जबकि क्षेत्रीय स्तर के अधिकारी उसे लागू करते हैं, इसलिए दोनों की जिम्मेदारी समान रूप से महत्वपूर्ण है.
खुद को ‘पब्लिक हीरो’ कहे जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए मुंढे ने कहा कि किसी एक अधिकारी को व्यवस्था परिवर्तन का श्रेय नहीं दिया जा सकता. उन्होंने लोगों से नौकरशाही और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखने की अपील करते हुए कहा, अगर मैं नहीं, तो कौन? यह सवाल केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि हर संस्था और पूरे समाज को स्वयं से पूछना चाहिए. उन्होंने स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार, लापरवाही और काम के प्रति उदासीनता के कारण लोगों में नौकरशाही के प्रति नाराजगी पैदा होती है. हालांकि, यदि कोई अधिकारी ईमानदारी और निष्ठा से काम करता है तो वह केवल अपना कर्तव्य नहीं निभाता, बल्कि दूसरों के लिए भी एक आदर्श स्थापित करता है. मुंढे ने कहा कि लोकतंत्र की संसद, न्यायपालिका, मीडिया और सिविल सेवा जैसी संस्थाओं को समय-समय पर खुद को बदलते रहना चाहिए, तभी व्यवस्था मजबूत बनेगी.





