जनादेश नहीं, तोडफोड तय कर रही दलों को राजनैतिक ताकत
महाराष्ट्र में चुनाव के बाद भी बदल रहा सीटों का गणित

मुंबई/दि.20- लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल की ताकत चुनाव परिणामों और जनता के जनादेश से तय होती है, जिसे अगले पांच सालों तक स्थिर माना जाता है. लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति ने इस पारंपारिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है. यहां अब चुनाव के बाद भी दलों की वास्तविक राजनीतिक ताकत लगातार घट बढ रही है.वर्तमान स्थिति में जनता का जनादेश नहीं, बल्कि राजनीतिक उठापटक और जनप्रतिनिधियों का दलबदल ही शक्ति का नया पैमान बन गया है. साल 2022 में शिवसेना में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद शुरू हुआ यह सिलसिला अब तक थमा नहीं है.शिवसेना के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी दो धडों में बंट गई.अब इसी कडी में शिवसेना उध्दव गुट के छह लोकसभा सांसदों के अलग होने की सुगबुगाहट के राज्य की सियासत को नया मोड दे दिया है. सूत्रों के अनुसार ,इन सांसदों ने लोकसभा सचिवालय में अपना अलग समूह बनाने की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू कर दी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधायकों और सांसदों व्दारा बार-बार पाला बदलने से सत्ता और विपक्ष का पूरा गणित चुनाव के बिना ही बदल रहा है. मंत्रालय की एक राजनीतिक पत्रकार का कहना है कि जो कुछ हुआ वह अनपेक्षित नहीं था.इसकी आशंका पहले से ही थी,लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद इसमें तेजी आ गई. विश्लेषक संदिप सोनवलकर का कहना है कि, अब देश में क्षेत्रीय दलों की राजनीति खतरे में है. अब तो दल बदल कानून का नाम बदलकर कभी भी दल बदल कानून कर देना चाहिए. विपक्ष जहां इसे जनादेश का अपमान बता रहा है,वहीं सत्ता पक्ष इसे जन प्रतिनिधियों का लोकतांत्रिक अधिकार मान रहा है.
महाराष्ट्र में दलीय स्थिति
दल
भाजपा-8
कांग्रेस-13
शिवसेना (उध्दव)-3
शिवसेना (शिंदे)-7+6
राकांपा (शरद)-8
राकांपा(अजीत)-1
निर्दलीय -1
कुल-48
अब आगे क्या…. इस उलथ-पथल के बाद, राज्य की कुल 48 लोकसभा सीटों का समीरण बदल रहा है. उध्दव गुट के 6 सांसदों के टूटने से शिंदे गुट की ताकत बढ रही है. वही ,1 सांसद वाली अजित पवार की राकांपा की संख्या भी आधा दर्जन तक पहुंचने की संभावना है,जबकि राकांपा गुट खुद को इस टूट से बचाने के लिए संसद में रणनीतिक कदम उठाने पर विचार कर रहा है.





