येलकोट, येलकोट, जय मल्हार के उद्घोष से गूंजा कलेक्ट्रेट
भेड़पालों ने कलेक्ट्रेट पर दी दस्तक, लंबित मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन

* चराई पास तत्काल जारी करने सहित विभिन्न मांगों को लेकर पशुपालक-मालधारी समाज ने सौंपा ज्ञापन
* बोले-आश्वासन नहीं, अब चाहिए अमल, अन्यथा होगा तीव्र आंदोलन
अमरावती/दि. 31 –चरवाहों और पशुपालकों की विभिन्न लंबित मांगों को लेकर सोमवार को अमरावती कलेक्ट्रेट परिसर के सामने प्रदर्शन किया गया. भारतीय पशुपालक मालधारी विकास संगठन के आह्वान पर आयोजित इस आंदोलन में बड़ी संख्या में चरवाहों एवं पशुपालक समुदाय के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. प्रदर्शनकारियों ने सरकार से उनकी वर्षों से लंबित मांगों पर तत्काल निर्णय लेकर उन्हें लागू करने की मांग की. आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने ‘चराई पास चाहिए, हमारा हक चाहिए’, ‘हम भीख नहीं, अपना हक और अधिकार मांगते हैं’ जैसे नारे लगाए. प्रदर्शन के बाद जिलाधिकारी को विभिन्न मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा गया.
आंदोलनकारियों का मुख्य मुद्दा पशुधन के लिए चराई व्यवस्था और चराई पास से जुड़ा रहा. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि महाराष्ट्र सरकार ने पशुपालकों के पशुधन के लिए चराई पास से संबंधित शासन निर्णय जारी किया है, लेकिन उसका जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है. इसलिए शासन निर्णय को तत्काल लागू करते हुए पात्र पशुपालकों को चराई पास जारी किए जाएं. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि केवल शासन निर्णय जारी करने अथवा आश्वासन देने से उनकी समस्या दूर नहीं होगी. चराई के लिए वास्तविक व्यवस्था और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराकर सरकारी निर्णय का लाभ पशुपालकों तक पहुंचाना जरूरी है.
* जंगलों में पारंपरिक चराई अधिकार देने की मांग
पशुपालक समाज ने जंगलों में पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक चराई व्यवस्था को मान्यता देने की भी मांग की. प्रदर्शनकारियों के अनुसार, पशुपालन उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है और पशुओं के लिए पर्याप्त चराई क्षेत्र उपलब्ध नहीं होने से समुदाय के सामने गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है. उन्होंने वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पशुपालकों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देने और वन क्षेत्रों में पारंपरिक चराई के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की.
* ‘परंपरागत वनवासी’ के रूप में मान्यता देने की मांग
आंदोलनकारियों ने लंबे समय से जंगल और चरागाह क्षेत्रों पर निर्भर पशुपालक समुदाय की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें परंपरागत वनवासी के रूप में मान्यता देने की मांग भी रखी. उनका कहना है कि पीढ़ियों से पशुपालन और चराई पर निर्भर परिवारों की आजीविका को संरक्षण मिलना चाहिए. इसके साथ ही पशुपालकों के लिए स्वतंत्र विकास योजनाएं तैयार करने तथा उनके आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए विशेष प्रावधान करने की मांग की गई.
* कर्नाटक की तर्ज पर अधिकार देने की मांग
प्रदर्शनकारियों ने कर्नाटक राज्य में वर्ष 2025 में किए गए प्रावधानों की तर्ज पर महाराष्ट्र के पशुपालक एवं चरवाहा समाज को भी आवश्यक अधिकार और सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की. उनका कहना था कि चरवाहा समुदाय की समस्याएं केवल स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे देश में मौजूद हैं. इसलिए पशुपालकों के लिए स्पष्ट और प्रभावी नीति तैयार की जानी चाहिए.
* ‘अंतरराष्ट्रीय चरागाह एवं चरवाहा वर्ष’ का हवाला
आंदोलनकारियों ने वर्ष 2026 को अंतरराष्ट्रीय चरागाह एवं पशुपालक ंवर्ष (आईवाईआरपी-2026) के रूप में मनाए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि पूरी दुनिया चरागाहों और पशुपालक समुदाय के महत्व को स्वीकार कर रही है. ऐसे समय में भारत और महाराष्ट्र में भी चरवाहा समाज के पारंपरिक अधिकारों तथा आजीविका की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए. उनका कहना था कि चरागाह केवल पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालक समुदाय की आजीविका से भी सीधे जुड़े हैं.
* ‘एक दिन चरवाहों के नाम’ का आह्वान
आंदोलन के लिए संगठन की ओर से ‘एक दिन चरवाहों के नाम-उठो, जागो, अमरावती चलो’ का आह्वान किया गया था. प्रदर्शनकारियों ने अपने ऐतिहासिक संघर्ष और पशुपालक समाज के योगदान को याद करते हुए विभिन्न समाज सुधारकों एवं ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का स्मरण किया. प्रदर्शन के दौरान ‘जय मल्हार, जय अहिल्यादेवी, जय भगवान, मालधारी बलवान’ जैसे नारे भी लगाए गए.
* जिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापन
प्रदर्शन के बाद पशुपालक एवं चरवाहा समाज के प्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगों पर तत्काल कार्रवाई करने की अपील की. ज्ञापन में चराई पास जारी करने, जंगलों में पारंपरिक चराई के अधिकार को मान्यता देने, वन अधिकार अधिनियम-2006 का प्रभावी क्रियान्वयन करने, पशुपालकों के लिए स्वतंत्र विकास योजना तैयार करने तथा अन्य राज्यों की तर्ज पर अधिकार एवं सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग प्रमुख रूप से शामिल रही. आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे किसी प्रकार की भीख नहीं मांग रहे, बल्कि अपने पारंपरिक हक और अधिकारों की मांग कर रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शासन स्तर पर उनकी मांगों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं किया गया तो आंदोलन को आगे और व्यापक किया जाएगा.





