‘उन’ बच्चों के गुनाहगार हम हैं…

विगत सोमवार को तडके 3.30 बजे अमरावती के डफरीन जिला महिला अस्पताल में हुए अग्निकांड की त्रासदी अब करीब 100 से अधिक घंटे और चार दिन बीत चुके हैं. इस दौरान अस्पताल के एनआयसीयू कक्ष में लगी आग बुझ चुकी है और वहां से जले हुए उपकरण हटाए जा रहे हैं. जांच समितियां काम कर रही हैं. अधिकारी बयान दे रहे हैं. मंत्री आश्वासन बांट रहे हैं. जनप्रतिनिधि व राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों द्वारा डफरीन अस्पताल का दौरा किया जा रहा है. सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है. लेकिन डफरीन की राख से उठता एक सवाल अब भी धुएं की तरह हवा में तैर रहा है. जिसका जवाब पूरी व्यवस्था को देना होगा. सवाल यह है कि, आखिर उन तीन नवजात बच्चों का गुनाह क्या था? वे इस दुनिया में अभी-अभी आए थे. उन्होंने आंखें भी पूरी तरह नहीं खोली थीं. उन्हें राजनीति का अर्थ नहीं पता था. उन्हें प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र का ज्ञान नहीं था. उन्हें फायर ऑडिट, एनओसी, टेंडर, वेंटिलेटर, बजट, विभागीय खींचतान और सरकारी फाइलों की भाषा समझ में नहीं आती थी. वे केवल जीना चाहते थे. लेकिन उन्हें जीने का वह अधिकार भी नहीं मिल सका और इसलिए आज इस त्रासदी के सामने खड़े होकर समाज, सरकार, प्रशासन और स्वास्थ्य व्यवस्था को एक ही स्वीकारोक्ति करनी चाहिए कि, बच्चों, तुम्हारे गुनाहगार हम हैं.
डफरीन अस्पताल के एसएनसीयू में लगी आग को यदि केवल एक दुर्घटना कहा जाए, तो यह शायद सच से भागना होगा, क्योंकि असल हकीकत यह है कि वह आग सोमवार की सुबह नहीं लगी थी. बल्कि इस आग की शुरुआत तो वर्षों पहले हो चुकी थी. जब सुरक्षा निरीक्षण औपचारिकता बन गए थे. जब फायर ऑडिट फाइलों तक सीमित हो गए थे. जब चेकलिस्टें वास्तविक जांच के बजाय हस्ताक्षरों के लिए भरी जाने लगी थीं. जब अस्पतालों में सुरक्षा के नाम पर केवल कागजी संतोष दर्ज किया जा रहा था. जब हर विभाग यह मानकर चल रहा था कि दुर्घटना कभी उसके हिस्से में नहीं आएगी. सोमवार की सुबह केवल वह क्षण था जब वर्षों की लापरवाही ने आग का रूप ले लिया और उस आग की कीमत तीन नवजातों ने अपने प्राण देकर चुकाई. इसके साथ ही इस समय बहुत लोग समझ रहे हैं कि आग बुझ गई, इसलिए संकट समाप्त हो गया. लेकिन वास्तविकता अलग है. एसएनसीयू बंद है. नवजात बच्चों को दूसरे अस्पतालों में भेजा जा रहा है. गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है. गर्भवती महिलाओं और नवजातों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता प्रभावित हुई है. यानी वह हादसा सोमवार को आग बुझने के साथ ही उस दिन समाप्त नहीं हुआ था. बल्कि उसकी पीड़ा आज भी जारी है.
इस अग्निकांड के साथ जुडी विडंबना इतनी भयावह है कि उस पर विश्वास करना कठिन लगता है. जिस अस्पताल को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया. जिसकी उपलब्धियों के गुणगान किए गए. जिसे राज्य स्तरीय पुरस्कार मिले. जिसकी नई इमारतों का उद्घाटन बड़े-बड़े नेताओं ने किया. जिसे स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का प्रतीक बताया गया. उसी अस्पताल के नवजात शिशु कक्ष में तीन बच्चे जलकर मर गए. अब सवाल उठना स्वाभाविक है. यदि अस्पताल इतना उत्कृष्ट था तो फायर सेफ्टी पर सवाल क्यों खड़े हुए? यदि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत थी तो हादसा हुआ ही कैसे? यदि निगरानी प्रभावी थी तो खतरे की पहचान पहले क्यों नहीं हुई? यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप था तो तीन बच्चों की जान क्यों गई और यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप नहीं था, तो इतने वर्षों तक जिम्मेदार लोग क्या कर रहे थे? यहां यह कहना कतई अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि इन तीन बच्चों की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं है. यह तीन अभियोग हैं. पहला अभियोग स्वास्थ्य विभाग पर, दूसरा अभियोग प्रशासनिक तंत्र पर, तीसरा अभियोग उस राजनीतिक संस्कृति पर, जो दुर्घटना के बाद सक्रिय होती है और दुर्घटना से पहले सोती रहती है.
बीते सोमवार को घटित घटना के बाद ही यह जानकारी सामने आयी कि अमरावती शहर के सैकड़ों अस्पतालों में से बड़ी संख्या के पास फायर एनओसी तक नहीं है. यह केवल एक आंकड़ा नहीं. यह उस भयावह सच का दस्तावेज है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था कितनी खोखली हो चुकी है. यदि अस्पतालों की स्थिति यह है तो स्कूलों, छात्रावासों, कोचिंग क्लासों, मंगल कार्यालयों और अन्य सार्वजनिक प्रतिष्ठानों की स्थिति कैसी होगी? ऐसे में कहा जा सकता है कि, इस हादसे ने पूरे शहर को आईना दिखा दिया है और पूछा जा सकता है कि, क्या फायर ऑडिट केवल फाइलों के लिए होते हैं? ज्ञात रहे कि, महाराष्ट्र सहित पूरे देश में अस्पतालों का संचालन के लिए अनेक अनिवार्य स्वीकृतियां लेनी होती हैं. फायर सेफ्टी, इलेक्ट्रिकल सेफ्टी, स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी, बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट, लिफ्ट सेफ्टी, औषधि लाइसेंस, पीसीपीएनडीटी, एमटीपी और अन्य कई प्रमाणपत्र. ऐसे में अब संबंधित महकमों को यह जवाब देना होगा कि, क्या इन सभी का नवीनीकरण समय पर हुआ था? क्या वास्तविक निरीक्षण किए गए थे? क्या अधिकारियों ने केवल दस्तावेज देखे या जमीन पर जाकर स्थिति भी जांची? क्या ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज रिपोर्टें वास्तविक थीं? या फिर सब कुछ कागजों पर संतोषजनक घोषित कर दिया गया था? यदि सारी व्यवस्था सही थी तो तीन बच्चों की मौत क्यों हुई? और यदि व्यवस्था सही नहीं थी तो इतने वर्षों तक जिम्मेदार कौन था?
डफरीन अस्पताल में घटित अग्निकांड को लेकर शुरू की गई जांच का दायरा केवल एक वेंटिलेटर तक सीमित नहीं है. बल्कि 7 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति पूरी घटना की परतें खोलने में जुटी है. विद्युत व्यवस्था, वायरिंग, लोड क्षमता, ऑक्सीजन लाइन, स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म, भवन निर्माण की गुणवत्ता, पीडब्ल्यूडी की भूमिका, अग्निशमन विभाग की जिम्मेदारी, सभी पहलुओं की जांच हो रही है और होनी भी चाहिए, क्योंकि बड़ी दुर्घटनाएं कभी अकेले नहीं होतीं. वे छोटी-छोटी लापरवाहियों की लंबी श्रृंखला का अंतिम परिणाम होती हैं. यहां पर वेंटिलेटर से ज्यादा बड़ा सवाल खरीद व्यवस्था पर है. वेंटिलेटर को लेकर कई सवाल उठे हैं. उपकरणों की गुणवत्ता पर बहस छिड़ी है. खरीद प्रक्रिया पर उंगलियां उठी हैं. सरकार अब जीवनरक्षक उपकरणों की खरीद के लिए नई एसओपी बनाने की बात कर रही है. सभी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों के थर्ड पार्टी फायर तथा इलेक्ट्रिकल ऑडिट की घोषणा की जा रही है. लेकिन जनता पूछ रही है, यदि सब कुछ ठीक था तो नई व्यवस्था की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि नई व्यवस्था की जरूरत पड़ रही है, तो क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं कि पुरानी व्यवस्था विफल हो चुकी थी? इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक बात वह दावा है जिसमें कहा गया कि यदि अस्पताल समय पर संबंधित नियंत्रण व्यवस्था में आ गया होता, तो बेहतर उपकरण लगाए जा सकते थे और हादसा टल सकता था. यदि इस कथन में सच्चाई का एक अंश भी है तो स्थिति और भयावह हो जाती है. क्योंकि तब यह केवल तकनीकी दुर्घटना नहीं रह जाती. तब यह सरकारी विभागों की खींचतान का परिणाम बन जाती है. और तब सवाल उठता है कि, क्या फाइलों पर अटके निर्णयों की कीमत तीन नवजातों ने अपनी जान देकर चुकाई?
इस पूरी घटना का सबसे असहज करने वाला पहलू यह है कि कई दिनों तक किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई. यही बात लोगों के मन में सबसे बड़ा संदेह पैदा कर रही है. जब सड़क दुर्घटना में मौत होती है तो तुरंत मामला दर्ज हो जाता है. जब किसी सामान्य लापरवाही से जनहानि होती है तो पुलिस तत्काल कार्रवाई करती है. तो फिर यहां तीन नवजात बच्चों की मौत के बाद कानूनी प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों है? क्या जांच पूरी होने का इंतजार है? या फिर किसी को बचाने की कोशिश? यह सवाल अब केवल विपक्ष नहीं पूछ रहा. यह सवाल हर वह नागरिक पूछ रहा है जो अपने परिवार को सरकारी अस्पताल में लेकर जाता है. जनता का अविश्वास यूं ही पैदा नहीं हुआ है. भंडारा में नवजातों की मौत हुई. नागपुर में अस्पतालों में आग लगी. इसके अलावा भी इससे पहले अन्य कई सरकारी अस्पतालों में शॉर्ट सर्किट और सुरक्षा चूक की घटनाएं सामने आईं. हर बार समिति बनी. हर बार रिपोर्ट आई. हर बार कुछ छोटे कर्मचारी निलंबित हुए और हर बार बड़े जिम्मेदार लोग बच निकले. इसलिए आज जनता पूछ रही है कि, क्या इस बार सचमुच दोषियों तक पहुंचा जाएगा या फिर यह मामला भी कुछ महीनों बाद सरकारी फाइलों में दफन हो जाएगा?
राजनीतिक अनास्था व प्रशासनिक अनदेखी की वजह से उपजे इस अंधेरे के बीच कुछ चेहरे उम्मीद भी देते हैं. वे नर्सें, वे स्वास्थ्य सेविकाएं, वे वार्ड बॉय, वे कर्मचारी, जिन्होंने धुएं और आग के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर 36 नवजातों को बाहर निकाला. जिला शल्य चिकित्सक डॉ. विनोद पवार समेत अनेक कर्मचारियों ने जो साहस दिखाया, वह असाधारण था. समाज उनका ऋणी रहेगा. लेकिन एक और सच है. व्यक्तिगत बहादुरी कभी भी संस्थागत विफलता का विकल्प नहीं हो सकती. नायकों की जरूरत तब पड़ती है जब व्यवस्था असफल हो जाती है. डफरीन केवल एक अस्पताल का मामला नहीं है. यह पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए अंतिम चेतावनी है. यदि अब भी अस्पतालों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट नहीं हुआ. यदि जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई. यदि जवाबदेही तय नहीं हुई. यदि सुरक्षा को फाइलों से निकालकर जमीन पर नहीं उतारा गया. तो अगली त्रासदी केवल समय का इंतजार होगी और तब फिर कोई मंत्री दुख व्यक्त करेगा. कोई समिति बनेगी. कोई रिपोर्ट आएगी और कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा. सिवाय उन परिवारों के, जिनकी दुनिया हमेशा के लिए उजड़ चुकी होगी.
इस संपादकीय आलेख के जरिए उस भयावह अग्निकांड का शिकार हुए बच्चों से केवल इतना ही कहा जा सकता है कि, प्रिय बच्चों, तुम्हारी आंखों ने दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था. तुम्हारे सपनों ने आकार भी नहीं लिया था. तुम्हारे नाम तक शायद पूरी तरह तय नहीं हुए थे. लेकिन तुम उस व्यवस्था की बलि चढ़ गए, जो अपनी जिम्मेदारियों को भूल चुकी थी. आज तुम्हारी राख से उठता हर धुआं हमसे एक ही सवाल पूछ रहा है कि, क्या गरीब का बच्चा इस राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुरक्षित है? जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलता, तब तक डफरीन की जली हुई दीवारें, वह धुआं, वह चीख, वह अफरा-तफरी और वे तीन छोटी-छोटी अर्थियां हमें चैन से नहीं बैठने देंगी. क्योंकि सच यही है कि, तुम्हारी मौत केवल आग से नहीं हुई. तुम्हारी मौत लापरवाही से हुई. जवाबदेही की कमी से हुई. प्रशासनिक उदासीनता से हुई और उस सामूहिक असफलता से हुई, जिसका हिस्सा कहीं न कहीं हम सब हैं. इसलिए आज पूरी व्यवस्था को सिर झुकाकर स्वीकार करना चाहिए कि, बच्चों, हमें माफ कर दो… तुम्हारे गुनाहगार हम हैं.

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