‘उन’ दो जिंदगियों के खत्म होने का जिम्मेदार कौन?

गत रोज अमरावती के राजापेठ फ्लाईओवर पर हुई दर्दनाक दुर्घटना में युवा और उच्चशिक्षित गौरी धर्माले तथा उनकी मौसी हर्षा गावंडे की मौत ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है. एक परिवार की उम्मीदें, सपने और भविष्य कुछ ही सेकंड में सड़क पर बिखर गए. जिस बेटी को देखने के लिए कुछ दिनों बाद रिश्तेदार और मेहमान आने वाले थे, जिसका विवाह तय करने की तैयारियां घर में शुरू हो चुकी थीं, वह आज इस दुनिया में नहीं है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल एक सड़क दुर्घटना थी?
यदि एक नो-एंट्री क्षेत्र में भारी वाहन प्रवेश करता है, यदि वह बिना नंबर प्लेट के शहर की सड़कों पर दौड़ता है, यदि वह कई चौक और सिग्नल पार करता है, यदि वह ट्रैफिक पुलिस की नजरों से बचकर शहर के व्यस्ततम हिस्से तक पहुंच जाता है और अंततः दो महिलाओं को कुचल देता है, तो इसे दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता कहा जाना चाहिए. सच्चाई यह है कि गौरी और हर्षा की जान सिर्फ एक ट्रक चालक की लापरवाही से नहीं गई, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र की निष्क्रियता से गई है जिसने नियम बनाए तो जरूर, लेकिन उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी निभाना जरूरी नहीं समझा. ऐसे में इसे लेकर यह भी कहा जा सकता है कि, यह सिर्फ सड़क हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, ट्रैफिक अराजकता और नियमों की खुलेआम हत्या का परिणाम है.
गत रोज हुए हादसे और उस हादसे में दो युवतियों की मौत के बाद कई सवाल उठ खडे हुए है. जिनका जवाब देने की जिम्मेदारी से प्रशासन बच नहीं सकता. सबसे बडा सवाल यह है कि, यदि शहर में भारी वाहनों के प्रवेश का समय निर्धारित है, तो दोपहर के वक्त भीडभाड वाले समय एक ट्रक राजापेठ फ्लाईओवर तक कैसे पहुंच गया? क्या ट्रैफिक पुलिस को इसकी जानकारी नहीं थी? क्या किसी चौक पर उसे रोका नहीं गया? क्या शहर में नियम सिर्फ कागजों पर लागू हैं? हर बार दुर्घटना के बाद चालक को गिरफ्तार कर लेना आसान होता है. लेकिन इस बार सवाल सिर्फ चालक का नहीं है. सवाल उन अधिकारियों का भी है जिनकी जिम्मेदारी नियमों का पालन करवाना है. यदि नो-एंट्री में वाहन घुसा तो यह केवल चालक का अपराध नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की असफलता भी है.
इस पूरे मामले का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि दुर्घटना करने वाले ट्रक पर नंबर प्लेट तक नहीं थी. कल्पना कीजिए, एक बिना नंबर का भारी वाहन शहर के कई प्रमुख मार्गों से गुजरता है, लेकिन किसी की नजर उस पर नहीं पड़ती. न कोई चालान, न कोई रोक-टोक, न कोई कार्रवाई. क्या यह मान लिया जाए कि शहर में कानून का डर खत्म हो चुका है? यदि एक बिना नंबर का ट्रक शहर के बीचों-बीच घूम सकता है, तो फिर आम नागरिक की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
इस दुर्घटना ने शहर में चल रहे अधूरे और सुस्त विकास कार्यों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है. राजकमल से रेलवे स्टेशन की ओर जानेवाला रेलवे उडानपुल विगत करीब एक वर्ष से बंद है. वहीं पिछले कुछ महिनों से राजापेठ-अंबादेवी मार्ग पर प्रवेश द्वार निर्माण के कारण यातायात बाधित है. जिसके चलते कई प्रमुख मार्गों पर काम की गति इतनी धीमी है कि नागरिक रोजाना ट्रैफिक जाम और अव्यवस्था झेलने को मजबूर हैं. यहां यह भी विशेष उल्लेखनिय है कि, राजापेठ रेलवे क्रॉसिंग पर अक्सर ही यातायात बाधित होने की वजह से राजापेठ रेलवे उडानपुल का निर्माण किया गया था. साथ ही साथ रेलवे पटरियोें के नीचे से रेलवे अंडरपास भी बनाया गया था. ताकि अंग्रेजी के ‘एक्स’ अक्सर के आकार में रहनेवाले राजापेठ चौक पर यातायात को सुचारू रखा जा सके. लेकिन कहना अतिशोयक्ति नहीं होगा कि, आरओबी बनने के बाद उडान पुल के नीचे राजापेठ चौक पर यातायात की व्यवस्था और भी अधिक लचर हो गई है. क्योंकि जगह-जगह पर निजी लक्झरी बसों एवं नाश्ते की गाडियों का अतिक्रमण हो चुका है. इसके साथ ही रेलवे उडान पुल के ऊपर बने चौराहे पर रास्ते का घुमाव और कटाव इतना अधिक है कि, आरओबी पर भी कभी भी किसी भी वक्त हादसा घटित होने की संभावना पहले से जताई जाती रही. जो कल दुर्भाग्य से सच भी साबित हुई.
हम शहर में होनेवाले विकास कामों के कतई विरोधी नहीं है. बल्कि हमारा मानना है कि, अमरावती शहर का जिस तरह से विस्तार हो रहा है, उसे देखते हुए मूलभूत सुविधाओं का विकास भी होना चाहिए. परंतु प्रशासन विकास कार्यों का दावा तो करता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का मतलब नागरिकों की सुरक्षा से समझौता करना है? जब मुख्य मार्ग बंद होते हैं, तब वैकल्पिक यातायात व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी होती है? क्या किसी ने अध्ययन किया कि भारी वाहनों का दबाव किन मार्गों पर बढ़ेगा? क्या किसी ने यह सोचा कि संकरी सड़कों और फ्लाईओवरों पर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है? क्या किसी भी रास्ते को आवाजाही हेतु बंद करते समय अन्य मार्गों पर बढनेवाले यातायात के दबाव को देखते हुए वाहनों की आवाजाही को सुचारू रखने हेतु वन-वे की व्यवस्था को अमल में लाने के बारे में सोचा गया? क्या ऐसे भारी भरकम यातायात वाले रास्तों पर होनेवाली बेतरतीब पार्किंग को खत्म करने हेतु नियमबद्ध व अनुशासित तरीके से पार्किंग व्यवस्था पर अमल करने के बारे में सोचा गया? जाहिर है कि, स्थानीय प्रशासन व पुलिस विभाग से संबंधित महकमों द्वारा इसमें से किसी भी बात पर कोई विचार नहीं किया गया. जिसके चलते इसे केवल योजना की विफलता नहीं, बल्कि संवेदनहीनता कहा जा सकता है.
यहां यह भी विशेष उल्लेखनिय है कि, विगत 24 जुलाई से अमरावती शहर पुलिस ने अमरावती शहर के अंतर्गत व अंदरूनी रास्तों पर भी दुपहिया वाहन चालकों के लिए हेल्मेट का प्रयोग करना अनिवार्य कर दिया है. जिसके तहत दुपहिया वाहन चालक के साथ पिछली सीट पर बैठे व्यक्ती के लिए भी हेल्मेट पहनना अनिवार्य किया गया है. इसके लिए शहर पुलिस द्वारा तर्क दिया गया है कि, ऐसा करना दुपहिया वाहन चालकों के प्राणों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है. इसके बाद शहर की संकरी, उबड-खाबड तथा देखभाल के अभाव में गड्डों से भरी सडकों का मुद्दा नागरिकों द्वारा उपस्थित किया गया था. जिस पर शहर पुलिस ने अपनी ओर से यह कहते हुुए पल्ला झाड लिया था कि, यह काम सार्वजनिक लोकनिर्माण विभाग व अन्य संबंधित महकमों का है और पुलिस को सरकार व परिवहन विभाग की ओर से जारी आदेशों का पालन करना व करवाना है. ध्यान दिए जाने की बात यह है कि, गतरोज हुए सडक हादसे में मारी गई दुपहिया सवार दोनों युवतियां हेल्मेट पहने हुई थी, लेकिन इसके बावजूद उनकी सडक दुर्घटना में बेहद दर्दनाक तरीके से मौत हुई. इसके चलते सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि, कई इस हादसे के लिए उन युवतियों के सिर पर रहनेवाला हेल्मेट ही तो जिम्मेदार नहीं है. क्योंकि हेल्मेट पहनने के बाद उसके भीतरी हिस्से में लगे रहनेवाले स्पंज के चलते कानों में सुनाई देना काफी हद तक कम हो जाता है. साथ ही बिना सिर घुमाए सामने देखते हुए दाहिने व बाएं देखने में भी कुछ हद तक दिक्कत होती है. ऐसे में बहुत हद तक संभव है कि, उन दोनों युवतियों को पीछे से काल बनकर आ रहे टिप्पर ट्रक की आहट ही सुनाई ना दी हो और अगल-बगल देखने में हेल्मेट की वजह से हो रही तकलीफ के चलते उन्हें खुद को बचाने का मौका तक न मिला हो.
ऐसा नहीं है कि, यह शहर में अपने तरह का कोई पहला हादसा है, जिसमें किसी मासूम, निष्पाप व बेकसूर की जान गई है. लेकिन इससे पहले हुए हादसों से शायद कभी कोई सबक ही नहीं सीखा गया. ऐसे में इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि, आगे चलकर ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति नहीं होगी. बल्कि हर हादसे के बाद वही पुराना नाटक होता रहेगा. जिसके तहत कोई न कोई दुर्घटना होगी. जिसमें मरनेवालों के लिए मुआवजे की घोषणा होगी. जांच के आदेश दिए जाएंगे. दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन मिलेगा. कुछ दिन तक खबरें चलेंगी. फिर सब कुछ सामान्य हो जाएगा और फिर किसी अन्य परिवार का बेटा, बेटी, पिता या मां सड़क पर अपनी जान गंवा देगा.
दुर्भाग्य यह है कि हमारे प्रशासनिक ढांचे ने दुर्घटनाओं को नियति मान लिया है. जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक किसी विभाग की नींद नहीं खुलती. अब सिर्फ चालक नहीं, जिम्मेदार अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो. इस मामले में केवल ट्रक चालक के खिलाफ मामला दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है. बल्कि यह जांच भी होनी चाहिए कि, नो-एंट्री क्षेत्र में ट्रक कैसे पहुंचा? बिना नंबर प्लेट का वाहन शहर में कैसे घूमता रहा? ट्रैफिक नियंत्रण व्यवस्था कहां थी? बंद सड़कों और अधूरे विकास कार्यों के कारण उत्पन्न यातायात संकट के लिए कौन जिम्मेदार है? संबंधित विभागों ने समय रहते सुधारात्मक कदम क्यों नहीं उठाए? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह मानना पड़ेगा कि गौरी और हर्षा की मौत केवल एक चालक की गलती नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की सामूहिक विफलता का परिणाम है.
आज अमरावती का हर नागरिक यह जानना चाहता है कि आखिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? यदि नियम तोड़ने वाले वाहन बेखौफ सड़कों पर दौड़ेंगे, यदि विकास कार्य वर्षों तक अधूरे पड़े रहेंगे, यदि ट्रैफिक व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित रहेगी, तो फिर ऐसी घटनाएं रुकेंगी कैसे? गौरी धर्माले और हर्षा गावंडे अब लौटकर नहीं आएंगी. लेकिन उनकी मौत एक चेतावनी बनकर सामने खड़ी है. यह चेतावनी प्रशासन, ट्रैफिक पुलिस, सार्वजनिक निर्माण विभाग और जनप्रतिनिधियों-सभी के लिए है. यदि इस हादसे के बाद भी व्यवस्था नहीं जागी, तो आने वाले समय में सड़कें और भी कई सपनों को कुचलती रहेंगी और तब हर मौत के साथ यही सवाल गूंजेगा, क्या यह महज दुर्घटना थी, या प्रशासनिक लापरवाही की वजह से हुई एक और मौत?





