‘बी.टी.’ सर के जाने से साधन सुचिता का पर्व समाप्त

हाराष्ट्र के सार्वजनिक जीवन में सज्जनता, नीतिमत्ता व साधन सुचिता जैसे शब्दों को जिस व्यक्ति द्बारा अर्थ व प्रतिष्ठा दिलाई गई थी. ऐसे निष्णांत शिक्षातज्ञ, अध्ययनशील जनप्रतिनिधि व पूर्व विधायक प्रा. बी.टी. देशमुख का निधन केवल एक व्यक्ति का दुनिया से निकल जाना नही है. बल्कि यह एक प्रकल्प, ध्येयनिष्ठ व आदर्श कालखंड का दुखद अंत है. प्रा. बी.टी. देशमुख ने शुक्रवार की रात हमेशा की तरह अपनी बेहद साधारण जीवनशैली के अनुरूप किसी भी तरह के गाजे बाजे के बिना एक ऋषि की तरह इस दुनिया से बिदाई ली. उनके चले जाने से केवल अमरावती ही नहीं बल्कि पूरा महाराष्ट्र एक ऐसे नेतृत्व से वंचित हो गया है. जिसने जीवनभर सत्ता की बजाय तत्वों एवं पद की बजाय जनहित को ज्यादा महत्व दिया.
महात्मा गांधी ने जीवनभर जिस साधन शुचिता का आग्रह किया था. वह साधन शुचिता बी.टी. सर की जीवन यात्रा एवं उनके प्रत्येक कृत्य में उल्लेखनीय तरीके से दिखाई देती थी. मौजूदा दौर की लगातार बदलती और कलूषित राजनीति में जहां एक ओर सत्ता के गणित हेतु नीति-अनीति के सभी भेद मिट रहे है. वहीं दूसरी ओर बी.टी. सर का व्यक्तित्व ऐसे माहौल में भी किसी ध्येयनिष्ठ दीपस्तंभ की तरह अटल व अडिग खडा दिखाई देता था. वे केवल चुनाव जीतकर विधान परिषद में जानेवाले जनप्रतिनिधि नहीं है. बल्कि वे लोकतंत्र की रक्षा करनेवाले एक सजग व जागृत प्रहरी थे. उनकी पहचान किसी पद, कुर्सी या प्रतिष्ठा के चलते नहीं हुई. बल्कि उनकी पहचान उनके व्यवहार एवं उनके उदात्त जीवन मूल्यों के जरिए निर्माण हुई थी.
महाराष्ट्र विधान परिषद में अमरावती के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार 5 बार निर्वाचित होते हुए उन्होंने 30 वर्षो तक विदर्भ, विशेषकर अमरावती की आवाज को पुरजोर तरीके से विधानमंडल में उठाया. वे रोजाना खुद से यह सवाल किया करते थे कि वे लोगों के लिए क्या कर सकते है और फिर इसी एक सवाल का जवाब खोजते हुए वे अपने जीवन के प्रत्येक पल को जनहित के कामों हेतु खर्च किया करते थे. उनके लिए राजनीति यह सत्ता का सोपान या व्यक्तिगत प्रगति का साधन नहीं थी. बल्कि समाज सेवा की निरंतर तपस्या थी. उन्होंने अमरावती सहित समूचे विदर्भ की सिंचाई समस्या एवं अनुशेष को लेकर जो संघर्ष किया. वह संसदीय इतिहास में सुवर्ण अक्षरों के साथ लिखने लायक है. सन 1997 में सिंचाई अनुशेष को लेकर उनके द्बारा विधानमंडल में किया गया संघर्ष उनकी जबर्दस्त अध्ययन वृत्ति का सबसे बेहतरीन उदाहरण है.
सन 1997 में विधानमंडल के नागपुर शीतसत्र दौरान 3800 करोड रूपयों की निधि की घोषणा हुई थी. परंतु सरकारी विधेयक ने अनुशेष दूर करने का कोई प्रावधान नहीं था. तब बी.टी. देशमुख ने सभागृह में इस मुद्दे को पूरी ताकत के साथ उठाया और सभागृह को मतदान हेतु मजबूर करते हुए विधेयक ने सुधार भी करवाया. इसके साथ ही महाराष्ट्र विधान परिषद के इतिहास में एक निर्दलीय सदस्य ने सरकारी विधेयक में संशोधन करवाते हुए एक नया इतिहास रचा. इससे पहले सन 1980 के दशक में जब अमरावती जिला भीषण अकाल का सामना कर रहा था. तब रासू गवई, सुदाम काका देशमुख व डॉ. देवीसिंग शेखावत जैसे दिग्गज नेताओं को साथ लेकर बी.टी. देशमुख ने पानी के लिए जिस तरह का जन आंदोलन शुरू किया था. उसे भी कभी नहीं भुलाया जा सकता. अमरावती के प्रत्येक घर तक नल के जरिए पानी मिलने हेतु पूरी ताकत के साथ लडनेवाला नेता आज हमारे बीच से चला गया है.
प्रा. बी. टी. देशमुख अपने आप में चलते फिरते विद्यापीठ थे. जिन्होंने आनेवाली कई पीढियों को बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई और उन्हें पढने व अध्ययन करने हेतु प्रेरित किया. बी.टी. सर की कथनी और करनी सहित जीवन जीने की शैली में एक तरह की सुसंगति थी. आज के दौर में राजनेताओं की प्रतिमा झूठ बोलनेवाले अथवा अपने कथन का पालन नहीं करनेवाले लोगों के तौर पर मानी जाती है. लेकिन ऐसे समय भी बी.टी. देशमुख का नाम लेते ही आंखों के सामने नीतिमत्ता के साथ रहनेवाले व्यक्ति की प्रतिमा खडी हो जाती है. जिसके चलते आज बी.टी. सर के निधन पर समाज के प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति शोकमग्न है.
प्रा. बी. टी. देशमुख ने पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधि करते समय जिस पध्दति से प्रश्नों को उपस्थित किया. उसे देखते हुए सुशिक्षित वर्ग का राजनीति की ओर देखने का दृष्टिकोण बदल गया. उनकी प्रत्येक गतिविधि में हमेशा ही पारदर्शकता रहा करती थी और वे जिस पद पर थे, उन्होंने वहां एक नई परंपरा शुरू की. आज उनके चले जाने से राजनीति का एक घवल व्यक्तित्व चला गया है. लेकिन उनके द्बारा स्थापित मूल्य हम सभी के मन में स्थायी तौर पर जीवित रहेंगे. जब-जब विदर्भ के विकास, सिंचाई अनुशेष एवं संसदीय नीतिमत्ता का विषय निकलेगा. तब – तब प्रा. बी. टी. देशमुख का नाम बेहद आदर से लिया जायेगा. एक शिक्षक, एक अध्ययनशील विधायक और एक संवेदनशील व्यक्ति के तौर पर उन्होंने समाज को जो कुछ भी दिया. उसकी व्याख्या शब्दों में करना बेहद कठिन है. परंतु यह तय है कि उन्होंने अपने कर्तुत्व से सामान्य जनों के मन में जो स्थान निर्मित किया है, वह स्थान अटल है. उनका साधापन, नीतिमत्ता व जनहितकारी काम सभी को हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे. ऐसे महान व्यक्ति को केवल शब्दों से श्रध्दाजंलि देना काफी रहेगा. बल्कि उनके द्बारा दिखाए गये मार्ग पर चलना ही उनके लिए सच्ची श्रध्दाजंलि होगी.

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