शांतिदेवी जाजू को महिलाओं ने दिया कांधा

आजादी आंदोलन के साक्षी रहे वर्धा का एक गौरवशाली अध्याय समाप्त हो गया

वर्धा/दि.13- महात्मा गांधी की भूमि आज मौन है पर, स्वतंत्रता आंदोलन के साक्षी रहे वर्धा का एक गौरवशाली अध्याय आज समाप्त हो गया. स्वतंत्रता संग्राम की जीवंत गाथा, त्याग, सेवा और मातृत्व की प्रतिमूर्ति स्वतंत्रता सेनानी शांतिदेवी दामोदरजी जाजू (102) पंचतत्व में विलीन हो गई.
शांतिदेवी जाजू के अंतिम संस्कार में जाजू परिवार ने सामाजिक रूढियों से परे जाकर एक भावपूर्ण और प्रेरणादायी मिसाल पेश की. परिवार की महिलाओं ने परिवार की दीपस्तंभ रहीं शांतिदेवी की अर्थी को कंधा दिया. इस दृश्य ने समाज के सामने यह संदेश रखा कि परंपराओं का सम्मान करते हुए समय के साथ सकारात्मक बदलाव भी स्वीकार किए जा सकते है. अंतिम संस्कार से पूर्व शासन की ओर से तहसीलदार सुशील फुंडलकर ने अंतिम दर्शन कर शांतिदेवी जाजू के पार्थिव पर पुष्पचक्र अर्पित कर श्रध्दांजलि दी. उनके पुत्र सुनील एवं राहुल जाजू ने मुखाग्नि दी. सन 1924 में शांतिदेवी का जन्म जोधपुर राजस्थान में हुआ था. लगभग 1940 में उनका विवाह महात्मा गांधीजी के निटकवर्ती तपोधन स्व. कृष्णदास के सुपुत्र दामोदरजी से हुआ. देशभक्ति की यह विरासत उन्हें ससूर कृष्णदासजी और पति दामोदर से मिली थी. वर्ष 1942 में जब अंग्रेजों भारत छोडो का नारा देशभर में गूंज रहा था. तब शांतिदेवी ने भी राष्ट्रभक्ति को अपने जीवन का ध्येय बना लिया था. स्वतंत्रता आंदोलन सक्रिय सहभागिता के चलते अंग्रेजी हुकुमत ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया. और पांच माह तक कारावास में रखा. इस समय वे गर्भवती थी. एक ओर गर्भावस्था की पीडा और दूसरी ओर जेल की यातनाएं दोनों का सामना उन्होंने एक साथ किया. शांतीदेवी जाजू गांधीजी के विचारों से प्रेरित आदर्श गृहिणी थी. 12 अगस्त को शांतिदेवी जाजू की अंतिम यात्रा में बडी संख्या में समाजबंधु, गांधीवादी कार्यकर्ता शामिल हुए. विदर्भ प्रादेशिक माहेश्वरी संगठन के पूर्व अध्यक्ष सीए दामोदर सारडा(चंद्रपुर) वर्तमान अध्यक्ष प्रा. रमन हेडा(अकोला) उन्हें अंतिम श्रध्दांजलि अर्पित की.

Back to top button