पार्षद अनिल अग्रवाल द्बारा दी गई अनशन की धमकी आयी काम
आष्टीकर के भ्रष्टाचारों की जांच हेतु समिति गठित

* सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुदाम देशमुख की जांच अधिकारी के तौर पर नियुक्ति
* 8 सप्ताह में जांच पूरी कर समिति को देनी होगी अपनी विस्तृत रिपोर्ट
* पूर्व आयुक्त व प्रशासक प्रवीण आष्टीकर पर हैं 100 करोड के कथित घोटालों का आरोप
* पूरे शहर की निगाहें अब समिति की जांच और रिपोर्ट पर टिकी हुई
अमरावती /दि.1- अमरावती महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त डॉ. प्रवीण आष्टीकर के कार्यकाल में कथित रूप से हुए करीब 100 करोड़ रुपये के वित्तीय अनियमितता प्रकरण की जांच को आखिरकार औपचारिक मंजूरी मिल गई है. पिछले कई महीनों से मनपा की राजनीति में भूचाल मचाने वाले इस मामले में महानगरपालिका प्रशासन ने जिला एवं सत्र न्यायालय के सेवानिवृत्त प्रमुख श्री सुदाम पी. देशमुख को एकसदस्यीय जांच समिति का प्राथमिक जांच अधिकारी नियुक्त किया है. नियुक्ति पत्र जारी होने के साथ ही अब बहुचर्चित प्रकरण की जांच प्रक्रिया शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है. बता दें कि पूर्व आयुक्त प्रवीण आष्टीकर के कार्यकाल दौरान हुए भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने हेतु उच्चस्तरीय जांच समिति गठित किए जाने की मांग को लेकर मनपा पार्षद अनिल अग्रवाल ने आमसभा में मांग उठाने के साथ साथ मनपा आयुक्त वर्षा लढ्ढा को आमरण अनशन करने की चेतावनी भी दी थी. जिसके चलते मनपा प्रशासन हडबडाकर नींद से जागा और अब कहीं जाकर इस मामले की जांच हेतु सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता के तहत एक सदस्यीय समिति गठित की गई. जिसे पार्षद अनिल अग्रवाल की सबसे बडी सफलता माना जा रहा है.
ज्ञात रहे कि मनपा के तत्कालीन आयुक्त रहे पूर्व प्रशासक डॉ. प्रवीण आष्टीकर द्बारा अपने कार्यकाल के दौरान मनमाने ढंग से काम करते हुए कई कामों में बडे पैमाने पर अनियमितताए की गई थी. जिसके चलते उनके खिलाफ आर्थिक गडबडी करने के आरोप भी लगे थे तथा मनपा द्बारा प्राथमिक स्तर पर की गई जांच पडताल में ऐसे कुछ आरोपों को पुष्टि भी हुई थी. यही वजह रही कि इस मुद्दे को लेकर मनपा की लगातार दो आमसभाओं में अभूतपूर्व हंगामा हुआ था और जिसके कारण सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के जनप्रतिनिधियों के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली थी. आमसभा में कई पार्षदों ने तत्कालीन प्रशासनिक कार्यकाल में हुए विकास कार्यों, निविदा प्रक्रियाओं और भुगतान मामलों पर गंभीर सवाल उठाए थे तथा करोड़ों रुपये के वित्तीय घोटाले की आशंका व्यक्त की थी. जिसके बाद मनपा की 20 अप्रैल 2026 को हुई आमसभा में सर्वसम्मति के साथ इस मामले की जांच करने हेतु सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता के तहत जांच समिति गठित किए जाने का निर्णय लिया गया था. परंतु यह निर्णय होने के बाद दो माह का समय बीत जाने के बावजूद मामला अधर में लटका हुआ था.
* पार्षद अनिल अग्रवाल ने खोला था मोर्चा, अनशन की दी थी चेतावनी
ज्ञात रहे कि मनपा पार्षद अनिल अग्रवाल इस मामले को लगातार प्रमुखता से उठाते रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन प्रशासक आष्टीकर के कार्यकाल में कई विकास कार्यो में नियमों की अनदेखी कर आर्थिक अनियमितताएं की गईं और इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है. जांच में हो रही देरी को लेकर उन्होंने मनपा आयुक्त वर्षा लड्ढा को आमरण अनशन शुरू करने की चेतावनी भी दी थी. अग्रवाल का कहना था कि जब तक पूरे मामले की स्वतंत्र जांच नहीं होगी, तब तक शहरवासियों के मन में उठ रहे सवालों के जवाब नहीं मिल सकेंगे.
* कोणार्क कंपनी के भुगतान पर भी उठा था विवाद
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पिछली दो आमसभाओं में इस मामले को लेकर सबसे अधिक चर्चा कोणार्क कंपनी से संबंधित भुगतान को लेकर हुई थी. कई जनप्रतिनिधियों ने मांग की थी कि कथित अनियमितताओं की जांच पूरी होने तक कंपनी के लंबित देयकों का भुगतान रोका जाए. उनका तर्क था कि यदि जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होती है तो बाद में आर्थिक नुकसान की भरपाई करना कठिन हो सकता है. इस मांग को लेकर सभागृह में तीखी बहस हुई और कई बार स्थिति तनावपूर्ण भी बनी.
* आमसभा के प्रस्ताव के बाद हुई कार्रवाई
बता दें कि 20 अप्रैल 2026 को आयोजित महानगरपालिका की सर्वसाधारण सभा में ठराव क्रमांक 33 एवं 35 पारित कर मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच कराने का निर्णय लिया गया था. इसके बाद प्रशासन पर जांच समिति गठित करने का दबाव लगातार बढ़ता गया. अब मुख्य विधि अधिकारी श्रीकीतसिंह चौहान द्वारा जारी आदेश के माध्यम से सेवानिवृत्त प्रमुख जिला व सत्र न्यायाधीश सुदाम देशमुख को जांच का दायित्व सौंपा गया है.
* इन मुद्दों की होगी विस्तृत जांच
जांच समिति को जिन मामलों की पड़ताल करनी है, उनमें निर्माण विभाग द्वारा जारी निविदाओं में जियो-टैगिंग की शर्तों का उपयोग, विभिन्न विकास कार्यों का क्लबिंग, बायोमाइनिंग परियोजना की निविदा प्रक्रिया, 10 लाख रुपये से अधिक लागत वाले कार्यों में ई-टेंडर प्रक्रिया का पालन न करना, केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन, सार्वजनिक निर्माण विभाग द्वारा किए गए कार्यों को मनपा स्तर पर दर्शाना तथा ई-टेंडर प्रक्रिया से बचने के लिए कार्यों की अनुमानित लागत को कृत्रिम रूप से कम दर्शाने जैसे मुद्दे शामिल हैं.
* पार्षदों एवं अधिकारियों के दर्ज होंगे बयान, दस्तावेजों की होगी जांच
जांच अधिकारी को संबंधित फाइलों, निविदा दस्तावेजों, भुगतान अभिलेखों और प्रशासनिक रिकॉर्ड की जांच करने का अधिकार दिया गया है. आवश्यकता पड़ने पर संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों, ठेकेदारों तथा अन्य संबंधित पक्षों के बयान भी दर्ज किए जाएंगे. साथ ही नगरसेवकों, जनप्रतिनिधियों और नागरिकों द्वारा प्रस्तुत शिकायतों, सुझावों और दस्तावेजों को भी जांच का हिस्सा बनाया जाएगा.
* आठ सप्ताह में रिपोर्ट, बढ़ीं राजनीतिक धड़कनें
महानगरपालिका प्रशासन ने जांच समिति को आठ सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट, निष्कर्ष और सिफारिशें प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं. इस जांच के आदेश के बाद शहर के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है. जनप्रतिनिधियों का मानना है कि जांच रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि तत्कालीन प्रशासनिक कार्यकाल में हुए विकास कार्यों में वास्तव में अनियमितताएं हुई थीं या नहीं. वहीं यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा रहा है. अब पूरे शहर की निगाहें आगामी आठ सप्ताह में आने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो अमरावती महानगरपालिका के सबसे चर्चित और विवादास्पद वित्तीय प्रकरणों में से एक का सच सामने ला सकती है.





