छात्रावास प्रवेश की 30 वर्ष की आयु सीमा रद्द
आदिवासी छात्र आंदोलन को बड़ी सफलता

* 13 दिन के आंदोलन के बाद सरकार ने लिया फैसला, लेकिन अन्य मांगों को लेकर आंदोलन जारी
* विशेष भर्ती, सेंट्रल किचन बंद करने और सर्पदंश पीड़ित परिवारों को सहायता की मांग पर छात्र अड़े
पुणे/मुंबई/दि.25- आदिवासी विद्यार्थियों के 13 दिनों से जारी आंदोलन के दबाव और बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा निर्णय लेते हुए आदिवासी विकास विभाग के शासकीय छात्रावासों में प्रवेश के लिए निर्धारित 30 वर्ष की आयु सीमा को रद्द कर दिया है. आदिवासी विकास मंत्री डॉ. अशोक उईके ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि सभी दलों के आदिवासी विधायकों और सांसदों के साथ हुई चर्चा के बाद 14 अगस्त 2026 के शासन निर्णय (जीआर) में लागू की गई आयु सीमा को स्थगित करने का निर्णय लिया गया है. हालांकि आंदोलनकारी विद्यार्थियों ने स्पष्ट किया है कि उनकी एक प्रमुख मांग पूरी होने के बावजूद आंदोलन समाप्त नहीं होगा. विशेष पदभरती, आश्रमशालाओं में सेंट्रल किचन व्यवस्था समाप्त करने और गडचिरोली की सर्पदंश घटना में मृत छात्राओं के परिवारों को आर्थिक सहायता देने जैसी अन्य मांगों पर सरकार के ठोस निर्णय तक आंदोलन जारी रहेगा.
बता दे कि, राज्य सरकार ने 14 अगस्त 2026 को जारी शासन निर्णय के तहत आदिवासी विकास विभाग के छात्रावासों में प्रवेश के लिए अधिकतम आयु 30 वर्ष निर्धारित की थी. इस निर्णय का राज्यभर में विरोध शुरू हो गया था. पुणे में आदिवासी विद्यार्थियों ने आमरण अनशन शुरू किया और इसे व्यापक समर्थन मिलने लगा. मंत्री अशोक उईके ने कहा कि जनप्रतिनिधियों और विद्यार्थियों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने आयु सीमा संबंधी निर्णय को स्थगित कर दिया है. अब छात्रावास प्रवेश के लिए किसी प्रकार की आयु सीमा लागू नहीं रहेगी.
आंदोलन कर रहे विद्यार्थियों का कहना है कि पिछले 13 दिनों से वे अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे, लेकिन प्रशासन उनकी ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दे रहा था. इस बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर हस्तक्षेप किया. इसके बाद मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गति पकड़ी. विद्यार्थियों ने कहा कि राहुल गांधी के पुणे दौरे के दौरान उन्हें अपनी समस्याएं सीधे रखने का अवसर मिला, जिसके बाद यह मुद्दा राज्यव्यापी चर्चा का विषय बना और सरकार को निर्णय लेना पड़ा.
आंदोलनकारी छात्रों ने कहा कि आयु सीमा हटाने का निर्णय स्वागतयोग्य है, लेकिन उनकी अन्य महत्वपूर्ण मांगें अभी भी लंबित हैं. विद्यार्थियों ने स्पष्ट किया कि जब तक इन मांगों पर सरकार ठोस निर्णय नहीं लेती, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा.
* गडचिरोली की घटना को लेकर भी उठी आवाज
आंदोलन के दौरान विद्यार्थियों ने गडचिरोली जिले की एक आश्रमशाला में सर्पदंश से हुई छात्राओं की मौत का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया. आंदोलनकारियों का कहना है कि यह घटना प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है और मृत छात्राओं के परिवारों को सम्मानजनक आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए. उन्होंने मांग की कि प्रभावित परिवारों को कम से कम एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए तथा आश्रमशालाओं में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए.
* राहुल गांधी को लेकर उईके का पलटवार
पत्रकारों से बातचीत में मंत्री अशोक उईके ने राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों पर भी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि गडचिरोली की जिस आश्रमशाला का उल्लेख किया जा रहा है, वह एक अनुदानित संस्था है जिसे वर्ष 1992 से सरकारी सहायता मिल रही है. उईके ने दावा किया कि संबंधित संस्था का संबंध एक पूर्व सांसद, पूर्व मंत्री और तीन बार विधायक रह चुके व्यक्ति से है. उन्होंने कहा कि पूरे मामले की तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए.
* संवेदनशील मुद्दों पर संयम बरतने की अपील
पत्रकार परिषद के दौरान आदिवासी छात्राओं से जुड़े कुछ आरोपों पर पूछे गए सवालों के जवाब में मंत्री उईके ने कहा कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर अनावश्यक चर्चा नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की बेटियों और छात्राओं के सम्मान का ध्यान रखा जाना चाहिए तथा तथ्यों के बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए.
* आंदोलन का अगला चरण महत्वपूर्ण
आंदोलन के 13वें दिन सरकार द्वारा आयु सीमा हटाने का निर्णय आंदोलनकारियों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है. हालांकि विद्यार्थी संगठनों का कहना है कि यह संघर्ष का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है. अब उनकी नजर विशेष भर्ती, आश्रमशालाओं की व्यवस्थाओं में सुधार और अन्य लंबित मांगों पर सरकार के फैसले पर टिकी है. राज्य सरकार द्वारा आयु सीमा हटाने के फैसले से तत्काल राहत तो मिली है, लेकिन आदिवासी विद्यार्थियों का आंदोलन अभी जारी है. ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच होने वाली बातचीत तथा अन्य मांगों पर लिए जाने वाले निर्णयों पर पूरे राज्य की नजरें टिकी रहेंगी.





