17 बाय 2 सेंटीमीटर हड्डी खुली, हीमोग्लोबिन सिर्फ 4 ग्राम
फिर भी बचा लिया युवक का पैर, अन्य केंद्रों में पैर काटने की दी गई थी सलाह

सुपर स्पेशालिटी अस्पताल में किफायती और चरणबद्ध उपचार से सफल ‘लिंब साल्वेज’
अमरावती/दि.7 – बेहद गंभीर स्थिति, संक्रमित घाव, अत्यधिक कमजोरी, कुपोषण और महज 4 ग्राम/डेसीलीटर हीमोग्लोबिन के बावजूद अमरावती के सुपर स्पेशालिटी अस्पताल के प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने 30 वर्षीय युवक का पैर काटने से बचा लिया. युवक के बाएं पैर में घुटने के नीचे से लेकर पंजे तक बेहद गंभीर और व्यापक घाव था तथा करीब 17÷2 सेंटीमीटर टिबिया की हड्डी पूरी तरह खुली हुई थी. अन्य उपचार केंद्रों में उसे पैर काटने यानी अम्प्युटेशन की सलाह दी गई थी.
प्लास्टिक सर्जन डॉ. आनंद अग्रवाल के नेतृत्व में चिकित्सकीय टीम ने मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल अम्प्युटेशन के बजाय चरणबद्ध उपचार का निर्णय लिया. उपचार के बाद जख्म में संतोषजनक सुधार हुआ और मरीज अब चलने में सक्षम है.
* सेप्सिस और सेप्टिक शॉक का था गंभीर खतरा
अस्पताल में भर्ती किए जाने के समय मरीज बेहद कमजोर और कुपोषित था. उसका हीमोग्लोबिन केवल 4 ग्राम था. इसके अलावा पैर में बड़ा संक्रमित घाव होने के कारण संक्रमण पूरे शरीर में फैलने यानी सेप्सिस और सेप्टिक शॉक का गंभीर खतरा था. चिकित्सकों ने पहले मरीज की सामान्य स्थिति सुधारने पर ध्यान दिया. उसे कई बार रक्त चढ़ाया गया. इसके साथ ही इंट्रावेनस एल्ब्यूमिन और पोषण संबंधी उपचार दिया गया. स्वास्थ्य में सुधार आने के बाद संक्रमित और मृत ऊतकों को हटाने के लिए चरणबद्ध तरीके से कई बार डिब्राइडमेंट किया गया.
* खुली हड्डी पर तैयार किया स्वस्थ टिश्यू
उपचार के दौरान खुली हुई टिबिया की हड्डी में कॉर्टिकल फेनेस्ट्रेशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया. इसके तहत हड्डी में छोटे-छोटे छेद किए गए और नियमित ड्रेसिंग जारी रखी गई. धीरे-धीरे पूरी खुली हड्डी के ऊपर स्वस्थ एवं रक्तसंचार वाला ग्रैन्युलेशन टिश्यू विकसित हुआ. इसके बाद स्प्लिट-थिकनेस स्किन ग्राफ्टिंग की गई और जख्म को सफलतापूर्वक ढक दिया गया. इस तरह बिना पैर काटे उपचार पूरा करने में सफलता मिली.
* महंगी और जटिल सर्जरी के बजाय किफायती तकनीक
मरीज बेहद कृश था और पेशे से ड्राइवर है. ऐसे में पैर की कार्यक्षमता बचाना उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण था. चिकित्सकों के अनुसार टिबियालिस एंटेरियर मसल फ्लैप करने पर पैर के महत्वपूर्ण कार्यशील मांसपेशी का त्याग करना पड़ सकता था. वहीं क्रॉस-लेग फ्लैप में दोनों पैरों को लंबे समय तक एक ही स्थिति में रखना पड़ता है. मरीज की गंभीर कुपोषण और अत्यंत कम हीमोग्लोबिन की स्थिति को देखते हुए लंबे समय तक चलने वाली फ्री-फ्लैप माइक्रोवैस्कुलर सर्जरी भी अधिक जोखिम वाली हो सकती थी. महंगे स्किन सब्स्टिट्यूट और आधुनिक घाव उपचार भी मरीज के लिए आर्थिक रूप से कठिन थे. इसलिए चिकित्सकों ने कॉर्टिकल फेनेस्ट्रेशन, नियमित ड्रेसिंग और बाद में स्किन ग्राफ्टिंग जैसी सरल, प्रभावी और किफायती उपचार पद्धति अपनाई.
* एनेस्थीसिया टीम ने भी निभाई अहम भूमिका
मरीज का हीमोग्लोबिन बेहद कम होने के कारण ऑपरेशन का समय, रक्तस्राव और शरीर पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को न्यूनतम रखना जरूरी था. एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. सपना अग्रवाल और डॉ. कपिल अग्रवाल ने मरीज की स्थिति को ध्यान में रखते हुए एनेस्थीसिया और पेरीऑपरेटिव प्रबंधन सावधानीपूर्वक किया. अंतिम स्किन ग्राफ्टिंग में प्लास्टिक सर्जन डॉ. मकरंद ठाकरे ने सहयोग किया, जिससे प्रक्रिया कम समय में पूरी करने में मदद मिली.
* दो बच्चों के पिता की रोजी-रोटी भी बची
उपचार के बाद मरीज का पैर बचाने में सफलता मिली है. जख्म में लगातार सुधार हो रहा है और मरीज अब चलने में सक्षम है. दो बच्चों के पिता और ड्राइवर के लिए यह सिर्फ एक चिकित्सकीय सफलता नहीं, बल्कि उसकी चलने-फिरने की क्षमता और आजीविका बचाने वाली उपलब्धि भी है.
* आयुष्मान योजना के तहत हुआ नि:शुल्क उपचार
इस पूरे उपचार की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी रही कि मरीज की सर्जरी और उपचार आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत नि:शुल्क किया गया. यह उपचार मेडिकल अधीक्षक डॉ. अमोल नरोटे और विशेष कार्य अधिकारी डॉ. मंगेश मेंढे के मार्गदर्शन में तथा प्लास्टिक सर्जन डॉ. आनंद अग्रवाल के नेतृत्व में किया गया. उपचार में डॉ. मकरंद ठाकरे, डॉ. सपना अग्रवाल, डॉ. कपिल अग्रवाल, डॉ. जयश्री पुसदेकर, अधिसेविका चंदा खोडके, मालती प्रधान और इंचार्ज सिस्टर विद्या चुडे सहित नर्सिंग एवं सहयोगी टीम का महत्वपूर्ण योगदान रहा. इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि अत्यंत गंभीर जख्म, संक्रमण, कुपोषण और कम हीमोग्लोबिन जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी यदि पोषण, एनेस्थीसिया, संक्रमण नियंत्रण, घाव की देखभाल और पुनर्निर्माण उपचार का उचित समन्वय किया जाए, तो कई मामलों में अम्प्युटेशन से बचाते हुए प्रभावित अंग की कार्यक्षमता को सुरक्षित रखा जा सकता है.
* जटिल परिस्थितियों में भी अंग बचाना संभव
रोगी के पैर में गंभीर संक्रमण के बाद 17÷2 सेंटीमीटर टिबिया की हड्डी पूरी तरह खुली हुई थी. हीमोग्लोबिन केवल 4 ग्राम था और सेप्सिस व सेप्टिक शॉक का खतरा भी बना हुआ था. ऐसे में अम्प्युटेशन से बचाते हुए पैर को सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती थी. कॉर्टिकल फेनेस्ट्रेशन, नियमित ड्रेसिंग और उसके बाद स्किन ग्राफ्टिंग के माध्यम से खुली हुई पूरी हड्डी पर स्वस्थ ग्रैन्युलेशन टिश्यू विकसित किया गया और पैर बचाने में सफलता मिली. मरीज की कार्यक्षमता और आजीविका को ध्यान में रखते हुए फ्लैप अथवा फ्री-फ्लैप सर्जरी के बजाय सरल, समय-परीक्षित और किफायती उपचार पद्धति अपनाई गई. यह मामला दर्शाता है कि उचित मरीज चयन, लगातार निगरानी और सावधानीपूर्वक उपचार प्रबंधन के माध्यम से जटिल घावों में भी लिंब साल्वेज संभव है.
डॉ. आनंद अग्रवाल, प्लास्टिक सर्जन





